विवाह संस्कार

Updated: May 3, 2020


संस्क्रियतेऽनेन इति संस्कार अर्थात जिससे मानव का विकास हो उसे संस्कार कहते हैं। भूषणार्थ द्योतक ' सम ' उपसर्ग पूर्वक करणार्थक डुकज्‌ धातु से संस्क्रियते उनेन इस विग्रह से । “संपरिभ्यां करोंती भूषणे '-1-137 अकर्तरि च कारके संज्ञायां 4-4 27 घ ञ” प्रत्यय होकर संस्कार शब्द बनता है। अत; संस्कार से मनुष्य में उसी प्रकार चमक आ जाती है जिस प्रकार शान पर चढ़ाने से मणि में। ब्रह्मचर्याश्रम के बाद समावर्तन स्नान करके द्विज गुरू से आज्ञा लेकर सवर्ण कन्या से विवाह करें । “उद्वहेतृद्विजो भार्या” विशिष्ट वहती विवाह-विशिष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये चिरसंगिनी के पाणिग्रहण का नाम विवाह है। चारों आश्रमों में गहस्थाश्रम को धन्य कहा गया है यथा “धन्योगहस्थाश्रम" सर्वेषामणिचेतेषां वेदस्मृति विद्यान्त: गृहस्थ उच्चतेश्रेष्ठ सत्री नेतान विभतिर्हिं । भार्यत्रिवर्कररणं शुभशीलयुक्ता शीलंशुभ भवहि लग्नवशेनतस्या : ।। तस्या विवाह समये परिचिन्तयेत हि तन्निध्नतामुपगता सुतशोल धर्मा: ।। (मुहुर्त चिंतामणि विवाह) भावार्थ: भार्या से तीनों वर्ग जैसे धर्म, अर्थ, काम की प्राप्ति होती है। मोक्ष में भी सहायता देती है अत: श्रेष्ठ लग्न में विवाह करें। सोलह संस्कारों में विवाह संस्कार एक प्रधान संस्कार है। विवाह के बिना व्यक्ति का जीवन अधूरा है। इससे ही पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। विवाह संस्कार के द्वारा ही पत्नी को साथ लेकर पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूर्ण करना है। इसके अभाव में पुरूष के जीवन का आनन्द समाप्त. हो जाता है। नीरसता आ जाती है। विवाह संस्कार गहस्थाश्रम में प्रवेश दिलाता है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ , संन्यास इन चारों आश्रमों में गहस्थाश्रम को सबसे बड़ा माना गया है। तीनों आश्रमियों को जन्म एवं पालनकर्ता गृहस्थाश्रम ही है। विवाह के द्वारा दो भिन्नन परिवार अभिन्न हो जाते हैं। दोनों कुलों की मान प्रतिष्ठा एवं श्री की वृद्धि होती है, शक्ति भी बढ़ जाती है। शास्त्रों में अनेक प्रकार के विवाहों का वर्णन ' मिलता है। श्लोकः ब्रह्मों देव स्तथौ चार्ष: प्राजापत्य तथा ऽऽ स्‌र। गन्धर्वो राक्षसचेव पैशाच चा सृमोऽधम ॥ अर्थ- ब्रह्म विवाह, देवविवाह, आर्ष विवाह, प्रजापत्य विवाह, आसुरविवाह, गंधर्व विवाह, राक्षस विवाह, पैशाच विवाह ब्राह्मानादि चार विवाहों को श्रेष्ठ माना गया है। (मनुस्मृति 3/3) हमारे श्री माथुर चतुर्वेद समाज में प्राचीन समय से एक नंबर वाला ब्राह्मविवाह ही होता रहा है! “उद्वहेत द्विजो भार्या सवर्गा लक्षणान्विताम" अर्थात वर अपने वर्ण की ही सुन्दर लक्षणवाली भार्या से ही विवाह करें, यह श्रेष्ठ सवर्णविवाह है। ब्राह्म विवाह अपनी जाति कुलगोत्र का विचार करें, ज्योतिष शास्त्र से सम्मति ले अर्थात गुण अधिक हो नाड़ी गण आदि सब सही हो । अपनी कुलरीति के अनुसार गौरी गणेश आदि देवताओं की पूजा श्री मातृका हवनचरा करें। अग्नि के 7 फेरे सप्तपदी आदि करने की हवन कूड में प्रज्ज्जलित अग्नि सभी पापों को नष्ट कर देती है सभी पारिवारिक लोगों का शुभ समय शुभाशीर्वाद मिलता है। शीघ्रता में बने गन्धर्व प्रेम विवाह कच्चे धागे की तरह टूट जाते हैं। उसमें सामाजिक दबाव नहीं बनता। अतः माथुर चतुर्वेदियों में ब्राह्मतविवाह ही जो परम्पराओं में आ रहा है श्रेष्ठ है | विवाह में सप्तपदी का विशेष महत्व       वर-वधू जब मंडप में आते हैं तब मधुपर्क विधि कन्यादान पाणिग्रहण, होम सात फेरे हो जाने पर भी विवाह तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक सप्तपदी नहीं होती। तभी कन्या वामांग में आती है। शास्त्र से एवं कानून से विवाह पूर्ण माना जाता है। अतः सप्तपदी का विशेष महत्व है।

  1. विवाह में दिये गये वचनों का पालन करें।

  2. वधू का ससुराल में आगमन-सास सुरक्षा करें । वधू लरकिनी पर घर आईं। राखेउ पलक नयन की नाई ॥ (रामचरित मानस)

  3. यत्रनार्य॑स्तु पृूज्यन्तेरमन्ते तत्र देवता।

  4. घरमेंकलहन ही होवे।

  5. सास-ससुर का सम्मान परमावश्यक है।

  6. दहेजका लालच नहीं करें।

  7. सभी लोग कम बोलें।

  8. घर की बात बाहर न जाये।

  9. वधू के सहित-सभी स्वास्थ्य का ध्यान रखें।

  10. श्रंगार केवल पति के लिए।

  11. पत्नी की हँसी न उड़ावे | टूटते परिवारों को बचावें ।


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