उपनयन संस्कार

Updated: Jun 13, 2020


पंडित जी के महूर्त अनुसार जनेऊ करना चाहिए। लड़का अगर बड़ी बददी पहनता है तो माता मइया के मंदिर में बेड़ी बददी उतरवानी चाहिए। दूसरे दिन माता जी का बसोडीा करना चाहिए। जनेऊ के 1-2 दिन पहले लड़के की नानी के एकताइ बुताई जाती है। दर्जी को नानी के घर पर बुलवाकर बच्चे के कपड़े, नापे जाते हैं कैंची की पूजा नानी मामी करती है। समाज की 2 औरतें जो कि एकताई के गीत गाती है उन्हें बुलाकर गीत गवाते है । दजी को दक्षिणा मिठाई देकर उसे खुश करके भेजते हैं। नानी की घर पर नाच गाना होती है |


डाला :-

अन्यत्र इसे ' भात' कहते है जो केवल लड़की के विदाह में अथवा हलक संतान होने धर 'छोछक ' दिया जाता है।

डाला सात फरेई का गर्वधान संस्कार में उल्लिखित है ।

  1. जोरा-धोती - 10 धोती रिश्तेदारों की होती है लेकिन समय डानुसार रीति बढ़ गई है ये यथा शक्ति की बात है।

  2. जमाई के कपड़े - उसकी इच्छानुसार या यथाशक्ति

  3. 4 दुपट्टा - चार बड़े प्रमुखों ससुर, ददीया चाचा ससुर नाना। यह छत्र तानने के काम में आते हैं।

  4. बतासे - सवा किलो


डाला :-

  1. घाट:- घाट की साड़ी जिसे पहन कर माँ घोड़ी पूजती है।

  2. लड़के की अचकन:- लड़के के कपड़े जिन्हें पहनकर घोड़े पर बैठकर घूरेडेल ( क्षेत्रपाल पूजन) में निकलता है।

  3. चावल, वरी, पापड़:- 5 किलो. चावल, 250 ग्राम. बरी एक पैकिट पापड़ का ।

  4. दंड कमण्डल:- लड़का जब काशी पड़ने जाता है तब विद्यालय की तैयारी में वह बरी पापड़ कमण्डल में रख कर ले जाता है।

  5. मठठे:- 50 मठठे होते है जिन्हें वटुक ब्राह्मण रास्ते में खाने को ले जाता है, वैसे लेकर तो एक ही जाता है पर रीति इस प्रकार की है।

  6. पीरी परजनी:- वटुक की अचला गाती पीले कपड़े की बनती है इन्हीं कपड़ों से वह काशी पढ़ने जाता है।

  7. जमाई के कपड़े :- उसकी इच्छानुसार या यथाशक्ति

  8. सास ससुर जी के कपड़े :- 10 धोती जोड़ा, आज समय अनुसार जो भी हो यथाशक्ति

  9. 4 किलो बतासे

भीख :- परात, चावल, नारियल और दक्षिणा ये इसलिये दी जाती है कि इससे वह अपनी विद्या पूरकर सके लेकिन आजकल दिखावे में कुछ भी सोना चांदी देते है। सही मायने में बच्चे की विद्या शुल्क खर्चे के हिसाब से भेंट देते हैं वह गुरु की होती थी जिससे वह गुरु जी. अध्ययन कराते हैं।उपनयन के बाद बटु सात घर भिक्षा माँगता है। इनमें भूआ के घर का प्रमुख स्थान है। यह संख्या पाँच भी हो सकती है और अधिक रिश्तेदार होने पर बढ़ भी सकती है।


जनेऊ वाला दिन - सबसे पहले दिन धराया जाता है पुस्तक में लिखा है उसी प्रकार नाईन के नौतें लगते है।. बहन बेटी से माँय रखवाई जाती है जो हल्दी की रखी जाती है, चूने की दीवार पर। आजकल धर्मशालाओं में दीवार पर नहीं रखते सफेद कपड़े पर भी रख सकते हैं। कपड़े पर रखें तो हल्दी में थोड़ा चूना मिला लेना चाहिए। माँय के बीच के भाग में घी की 7 माँय रखें, नीचे 7 गोवर की। पंडित जी का सामग्री-पर्चा आलेख के साथ संलग्न है। मालिन से बंदरवार मंगवाकर अपने घर के साथ देवर जेठी के दरवाजों पर लगवा देने चाहिए। “माँय पूजा के बाद माता मईया के तेल चढ़ाने जाते हैं। सबसे पहले शीतला माता, मानिक चौक की माता, नगला पाइसे की माता इनके तेल चढ़वायें और छत्ते की माता के जनेऊ वाले लड़के से जनेऊ चढ़वायें। अगर मथुरा से बाहर हो तो वहां किसी शीतला माता के मंदिर में चढ़वा दें। माता के तेल चढ़ जायें तब जनेऊ वाले लड़के को नानी के यहां से डाला जाता है। डाला घर में आये तब दरवाजे पर बहन बेटी अर्ध्य बढ़ायें । इसे माइके वालों का स्वागत करना कहते हैं। डाला आँगन में रखें, जितने भी भाई आयें सबके नाम के पटा विछायें, सामने बहन अपना पटा बिछाये। दोनों पटाओं के बीच में आटे से सतिया काढ़ें बहन भाई को टीका करती है। भाई बहन को सब डाले की वस्तु प्रदान करता है। इसके बाद बहन भाई गले मिलते हैं। बहन भाई को अच्छे सुन्दर कपड़े , रुपये व नारियल रखकर देती है। ये भेंट है जो भाई को दी जाती है। यह अपनी शक्ति अनुसार होती है। नारियल वा रुपये अवश्य होता है। इस कार्य के बाद जनेऊ वाले लड़के के तेल चढ़ाते # बहन भाई का आरता उतारती है। आरता उतारने की रीति व गाना आगे है।

तेल चढ़ाना - आँगन में पटा बिछाकर लड़के को बैठाते हैं। पंडित जी कलश-'गणपति' की पूजा कराते हैं। 50 पूड़ी व रुपये यथाशक्ति रखकर सिल छिड़कवाई जाती है। आजकल बर्तन व मिठाई चल गई है, जैसी सामर्थ हो। सात सरइया होती हैं उन पर चार चार पूड़ी रखी जाती है। सात सुहागिन औरत बाँयें हाथ में रोरी का कंगन का निशान पंडित जी सै लगवाकर लड़के को तेल चढ़ाती है। सातौ औरतें तेल चढ़ाकर खल्ल मूसरी में सावत 'डाह कर कूटती है और गाना गाती हैं और हास्य व्यंग्य करती हैं। सात सरइया जिनमें 4-4 पूड़ी रखी हैं व एक सरइया जनेऊ वाले लड़के को दूसरी पंडित जी को तीसरी बहन बेटी तेल चढ़ाने वाली औरतों को बांट देनी चाहिए। जनेऊ वाले लड़के से सिल छिड़कवानी चाहिए। इसके बाद बहन बेटी को लड़के का आरता उतारना चाहिए आरता उतारने समय गीत गाना चाहिये। पहले दिन धूराडेल, दूसरे दिन उपनयन संस्कार, तीसरे दिन माँय सिराया होता है। भीख डलने के बाद लड़का काशी पड़ने आस-पास के किसी देवालय में प्रतीक रुप में जाता है वहां से बाबा व घर के प्रमुख लड़के को मनाकर अच्छी भेंट या उपहार देकर लाते हैं। उसके बाद लड़का भेरों नाथ को जनेऊ चढ़ाने व खप्पर भरने (दूध चावल व शक्कर ) से जाता है। जनेऊ के बाद ब्राह्मण भोज होता है जिसे अपने यहाँ अठवरक कहते है। ब्राह्मण भोजन से पहले माँय देवता जिमाने और अन्नपूर्णा रख कर पूजा करनी चाहिये फिर बहन भानजों को खिलाना चाहिए उसके पश्चात आदर पूर्वक सभी ब्राह्मण, रिश्तेदारों को खिलाना चाहिए।


माय उठाना - काय सम्पूर्ण होने के बाद माँव टेवता जो आये है उन्हें विदा किया जाता है। उस समय सात घर का बह यानी देवर जेटानी माँय के आगे लाइन से बैठती हैं सबसे पहले घर की प्रमुख बढ उसके बाद अन्य वेटती हैं। घर की प्रमुख बहू या माँ माँय के आगे की सब वस्तु सय डल्लिया में समेट कर भर लेती है। माँच के आगे की जगह को धो कर सतीया आटे का ग्खती हे उस पर दिया जलाती हैं कुछ प्रसाद रखती है। माँय के आगे के सामान को जो कि डललिया या सूप में रखा उसे अपने सिर पर रखती है फिर अपने दोनों हाथों से उस डलिया को अपने पीछे वाली औरत को फिर वह अपने पीछे वाली औरतों को देती है इस प्रकार सातों औरतों के सिर पर सात वार ले जाती ह व ले आती है। साथ ही गाना गाती हैं। इसका तात्पर्य थे कि सकुशल संस्कार पूरा हुआ इसलिये बधाई देती हैं। सभी घर के सदस्य व देवर जेटियो के नाम लेते है ।

इस प्रकार सात वार करके डलिया को कपड़े में बांधकर अपने देवता जहाँ भी विराजमान हों वहाँ सिरा देने चाहिए, घर पर आकर खाना पीना यथाशक्ति करें बहन भानजें थे आये हुए मेहमानों को सत्कार पूर्वक कपड़े भेंट देकर विदा करें ।

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