तिलक: एक सनातन अभिज्ञान

Updated: May 3, 2020


(हिन्दू शास्त्रों में तिलक का इतना महत्व रहा है कि राज्याभिषेक का नाम ही राजतिलक प्रसिद्ध हुआ। माथुर चतुर्वेदी विप्र समाज में शिखा-सूत्र के ही समान तिलक का शास्त्रोक्‍त महत्व पूर्ववत स्वीकृत है।)


हमारे अवतारों, देवताओं एवं महापुरूषों की मूर्तियाँ या चित्र उन्हें तिलकांकित प्रदर्शित करते है। यह तिलक की प्राचीन परम्परा का प्रमाण है। यह हमारी गौरवपूर्व पहचान है। तिलक लगाने में रोली-अक्षत, गोपी चंदन, ब्रज रज आदि का प्रयोग होता है। ठाकुर जी की प्रसादी का केशरिया चंदन, यजन-भस्मि एवं तीर्थों की मृतिका, चित्रकूटी प्रभृति भी प्रचलन में हैं। हिन्दू शास्त्रों में तिलक का इतना महत्व रहा है कि राज्याभिषेक समारोह का नाम ही राजतिलक प्रसिद्ध हुआ। रक्षाबंधन एवं यमद्वितीया पर बहन भाई की मंगलकामना हेतु मस्तक पर तिलक लगाती हैं। यात्रा पर प्रस्थान करने से पूर्व तिलक लगाने की प्रथा हैं| सभी मांगलिक संस्कारों में भी तिलक लगाया जाता है। नित्यकर्म तर्पण आदि से पूर्व तिलक लगाना चाहिए।


अपनी-अपनी सम्प्रदाय विशेष एवं गुरू दरबार परम्परानुसार ऊर्ध्व पुण्ड, त्रिपुण्ड, आनासिका एवं बिन्दु रूप में तिलकांकन होता है जो अत्याधुनिक पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव स्वरूप अति संक्षिप्त और अदर्शनीय होता जा रहा है किन्तु प्रसन्‍नता की बात है कि हमारे समाज के लोग आज भी महानगरों और विदेश में रहते हुए भी इसका सूक्ष्मातिसूक्ष्म ही सही, प्रयोग करने के अभ्यस्त हैं। माथुर चतुर्वेदी विप्र समाज में शिखा-सूत्र के ही समान तिलक का शास्त्रोक्त महत्व पूर्ववत स्वीकृत है। यवन कालीन आक्रमणों से जूझने हुए शिखा-सूत्र और तिलक की रक्षा हेतु समाज ने दीर्घकालीन संघर्ष किया। यह बलिदान की वीर गाथा आज भी हमारे वरू-चारण मांगलिक अवसरों पर गाते हैं। “गुरू गोविन्द सिंह ने अपने विचित्र नाटक में लिखा है-


तिलक जंज राखा प्रभु ताका। कीन्हा बड़ा कलू में साका । ।

वीर रस के विख्यात कवि ' भूषण ' ने लिखा है-


'राखी हिदुबानी हिंदुबान को तिलक राख्यो।'

यह द्वादश तिलक की महिमा है।


ऊर्ध्व पुण्ड मृदा धार्य्य , भस्मना तु त्रिपुण्ड्कम्‌ ।

उभयं चन्दने नेव हयम्यड्रोत्सव रात्रिषु । ।


हमारे यहाँ सदैव त्रजरज का महत्व रहा है। तिलक का वैज्ञानिक प्रभाव वातावरण जनित संक्रमण का निवारण करता है। मनोवैज्ञानिक रूप में यह सात्विकता का संचार है। सुषुम्ना नाड़ी के केन्द्र बिन्दु (मस्तक) पर तिलकाकन आयुर्वेद की दृष्टि से मनोविकारों का नियामक कहा गया है। मस्तिष्क में उठनेवाली विचार तरंगों में सदू-असद विवेक जाग्रत करना तिलक का ही उत्तरदायित्व है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार-


स्नानं दान तपोहोमो देवतापितृकर्म्म च ।

तत्सर्वनिष्फलंयाति ललाटे तिलक बिना।

बाह्मणस्तिलक कृत्वा कुर्य्यात्संघ्याउ्च तर्पणम्‌ ।।

9 views0 comments

Recent Posts

See All

Hinduism: A Science

Hinduism is an Atheism(Science) and a theism at the same time How? "Long story short " Universe (Brahmand) consists of 4 things 1. Param atma (Energy) 2. Param tatva (Matter) 3. Maha kal (Time ) 4. K