सूतक और शास्त्र

Updated: May 3, 2020

भीष्म अपने पिता शान्तनु को पिण्डदान कर रहे थे। जैसे ही पिण्ड हाथ मैं लेकर बेदी पर चढ़ाने को तैयार हुये कि पास ही पिता के दोनों हाथ प्रत्यक्ष दिखलाई पड़े। शब्द हुआ “बेटा! पिण्ड वेदी पर न चढ़ा कर मेरे हाथों में ही दे दो।” भीष्म दुविधा में पड़ गये। पुरोहित जी से पूछा कि मुझे क्या करना चाहिये ?” उत्तर मिला कि शास्त्र की आज्ञा पिण्ड को वेदी पर चढ़ाने की है।” भीष्म ने पिता से निवेदन किया “पिताजी मैं इस समय सर्वथा शास्त्र के अधीन हूँ आप कृपया वेदी पर दिये गये पिण्ड को ही ग्रहण करें।” भीष्म की शास्त्र निर्भरता को देख पितृत्मा को बड़ा आनन्द हुआ बोले, “पुत्र तुम शास्त्र के अधीन हो, मेरा यह आशीर्वाद है कि मृत्यु तुम्हारे अधीन रहेगी। यों उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। जीवमात्र यद्यपि स्वतन्त्रता का प्रेमी है तथापि मनुष्य को शास्त्रों के आधीन रहना चाहिये। इससे समाज में उच्छुंखलता नहीं आती । शास्त्र पर मानवों का अधिकार है, पशुओं का नहीं। हितोपदेश करना ही शास्त्रों की शास्त्रता है। यह सज्जनों की विद्या है। सुखी रहने का नुस्खा भी शास्त्र आधीन है। जिन निन्धों, ग्रन्थों द्वारा मनुष्यों को निवृत्ति और प्रवृत्ति यानी कि निषेध और विधि का उपदेश किया जाता है उसे शास्त्र कहते हैं। शास्त्रों में अशौच का भी विस्तृत वर्णन मिलता है। इसमें मृत्यु अशौच की वृत्ति रक्तसे सम्बन्धित वर्णन की गयी है। रक्त सम्बन्ध से, देखा गया है कि कीटाणुओं का संकूमण स्वतः: ही होता रहता है। मरण अशौच की शुद्धि केश मुण्डन से बतलाई गयी है। मिट्टी के वर्तन, शंख, सागपात आदि मात्र धोने से शुद्ध माने गये हैं, ताँबा खटाई और जल से, काँसे और लोहे के बर्तन राख से मलने पर, यज्ञ-पात्र दाहिने हाथ से कुशा द्वारा मार्जन करने पर, चिकने पात्र गरम जल से धोने पर, गोंद, गुड़, नमक, ऊन, कपास धूप से, तथा सींग और दाँत के बर्तन पीली मिट्टी लगाने से शुद्ध होते हैं। ऐसे ही मरण अशौच की शुद्धि का विधान केश मुण्डन से माना गया है। स्त्री वर्ग को इससे छूट इसलिए है कि घोड़ा, बकरा और स्त्री मुख सदा शुद्ध माने गये हैं। गाय का प्रत्यंग शुद्ध है, केवल मुख शुद्ध नहीं माना गया। शौच के उपरान्त 10 बार बाँया हाथ फिर 7 बार दोनों हाथ मिट्टी से शुद्ध होते हैं यों शास्त्र में सब की शुद्धि का वर्णन है। मरण-अशौच का वर्णन शास्त्रों में व्यापक वर्णित है:

माता पिता का सपिण्डों को यानी जो सात पीढ़ी के अन्तर्गत हैं 10 रात्रि का, विवाहित _ पुत्री व बहिन को 3 रात्रि का । 3 वर्ष से 10 दिन के पुत्र का पिता को 4 रात्रि का | 10 दिनसे .. 3 वर्ष तक की कन्या का माता पिता को 3 रात्रि का। नाना-नानी को 3 रात्रि का। धेवते यदि जनेऊदार हैं तो 3 रात्रि का, बिना जनेऊदार हैं तो 1 दिन का। भतीजे के में स्नान मात्र से शुद्धि। भुआ मौसी मामा के पुत्र का 1 दिन का। बाप की मौसी का बेटा, बाप की भुआका बेटा, बाप के मामा के बेटा के में 1 दिन का। माता की मौसी, भुआ तथा मामा के बेटा के में 1 दिन का। दत्तक पुत्र का 3 दिन का। भुआ की लड़की (विवाहिता) 1 दिन का अविवाहिता स्नान मात्र से शुद्धि। गुरू आचार्य का 3 रात्रि का। सपिण्ड में 7 पीढ़ी से 14 पीढ़ी तक 3 रात्रि का। विवाहिता कन्या का पितृक्‌ल में स्नान मात्र से। कहीं बाहर सुनने पर शेष दिनों तक यदि सूचना 10 दिन बाद स्नान मात्र से। 1 वर्ष बाद जानकारी मिले तो स्नान मात्र से शुद्धि । मित्र, दामाद, दौहित्र, भानजे, साले और साले के पुत्र का स्नान मात्र से जन्म अशौच की, मृत्यु अशौच के साथ शुद्धि हो जाती है। किन्तु मृत्यु अशौच की शुद्धि जन्म अशौच के साथ नहीं होती। इसी प्रकार गुरू अशौच से लधु अशौच बाध है। यानी कि बडे के साथ छोटे की शुद्धि को जाती है। आत्मधाती का सूतक नहीं लगता। सन्यासी, ब्रती, ब्रह्मचारी, राजा व यज्ञदी क्षितों का भी सूतक नहीं लगता। जिसके दाँत न निकले हों उसका दाह न करें। यदि 10वाँ दिन रवि, मंगल या गुरू पड़ते हों तो 9वें दिन ही शुद्धि करलें। श्राद्ध कर्म में ऊने अयुग्म (1-3-5-7-9) ब्राह्मणों को भोजन दान करे। खीर का भोजन देने से पितरों की एक वर्ष तक तृप्ति बनी रहती है। सूर्य ग्रहण का सूतक 12 घण्टे पूर्व तथा चन्द्रग्रहण का सूतक 9 घण्टे पूर्व से लगता है। संक्षेप में समझना चाहिए कि सूतक आत्मबन्धु-पितृबन्ध तथा मातृबन्धु तीन का ही लगता है। जिसका रक्त सम्बन्ध स्वयं से हो या मातां से हो या फिर पिता से हो। सूतक उन्हीं का तागता है। सूतक लगता है लोग मानें न मानें ये बात अलग है |

25 views0 comments

Recent Posts

See All

Hinduism: A Science

Hinduism is an Atheism(Science) and a theism at the same time How? "Long story short " Universe (Brahmand) consists of 4 things 1. Param atma (Energy) 2. Param tatva (Matter) 3. Maha kal (Time ) 4. K