श्री राधादामोदर स्तोत्र

कार्तिक पूजा

(“भोर के आवाहन” जैसा धार्मिक अनुष्ठान “राधा-दामोदर” माथुरी महिला संस्कृति की वाचिक परम्परा का अमूल्य रत है। कार्तिक के महीने में अल-सुबह, पुण्यप्रद नदी तट, मंदिर प्रांगण या स्वकीय आवास पर आयोजित यह आध्यात्मिक-मांगलिक आयोजन समूह गायन-पूर्वक तुलसी-शालिग्राम पूजन के साथ-साथ प्रकृति पूजा है। सर्वमंगल की कामना से. ऋतु पूजा भी है। शरद पूर्णिमा (इदली पूनों) से कार्तिक पूर्णिमा (रास पूनों) तक चलने वाली यह पूजा “माथुर मधुपावलि” नामक प्राचीन ग्रन्थ में महिलाओं के हेतु सौभाग्य-सुख, सम॒द्धिदाता कही गयी है जो रासोत्सव को प्रतीक पूजा है। स्वर्गीया श्रीमती शशी चतुर्वेदी का परम प्रिय यह अनुष्ठान आलेख रूप में उनकी पुण्यस्मृति को समर्पित है। )


पौरिया पौर जगाओ रे भाई ।

मैं मुख देखोंगी जादौ राई, सदामुख देखोंगी जादौं राई ॥

पीरौ पीताम्बर मेरे तन सो है।

तुलसी की माला मेरे गल सो है।

उठौ किशन जी रैन है थोरी,

राधा दामोदर की सेज बिछी और अंचल जोरी ।

काहे को ईट काहे कौ गारौ ? श्री राधा दामोदर को चिनिए चौवारौ ।

पाँचों पंडन चिनिए चौबारौ , छटे नरायन को चिनिए चौवारो ।

गंगा यमुना चिनिएँ चौबारो, लफिया तफिया चिनिएँ चौवारो ।

तुलसी शालिग्राम चिनिएँ चौबारो, तेतीस कोटि देवतन को चिनिए चौवारो |

हरे-हरे गोबर अंगन लिपाऔ, श्री राधा दामोदर को चौका दीजै ।

इसी प्रकार (पांचों पंडन, हरे नरायन, गंगा-यमुना, लफिया तफिया, तुलसी सालिग्राम के लिए कहना है)

हरे-हरे पेड़ों की डार कटाओऔ, श्री राधा दामोदर को दांतुन दीजै ।

(इसी प्रकार सभी को दांतुन कराना है)

गीले-अलगीले चंदन कटाओऔ, श्री राधा दामोदर कौ चौकी दीजे ।

सोने की झारी गंगाजल पानी, श्री राधा दामोदर कौं उबट न्हवाऔ।

(इसी प्रकार सभी को नहलाना है)

घिस-घिस चंदन भरी है कटोरी, श्री राधा दामोदर कौं तिलक लगाऔ।

(इसी प्रकार सभी को तिलक लगाना है)

फूल गुलाब के हार मंगाओ, श्री राधा दामोदर को हार पहनाऔ।

(इसी प्रकार सभी को हार पहनाना है)

छप्पन भोग छत्तीसौ व्यंजन, श्री राधा दामोदर कों भोजन कराऔ।

(इसी प्रकार सभी को भोग लगाना है)

सोने की झारी गंगाजल पानी, श्री राधा दामोदर कौं आचमन कराऔ ।

(इसी प्रकार सभी को आचमन कराना है)

--.--

उगन्त सूरज मिलहि चकई मिलहि चकबा, गऊअ बंधन छोरियै ।

तेरी सर्व सुंदर करहि सेवा तिरिया जनम पलौटियै ।

एक धन्य मथुरा धन्य गोकुल धन्य यदुकुल औतरे।

एक धन्य सीतल नीर जमुना ग्वाल-बाल सखा तरे ॥

मथुरा में केशौराय विराजें गोकुल बाल मुक्‌न्द हैं।

श्री व॒न्दावन में मदन मोंहन गोपीनाथ गोविन्द हैं॥

कछु आज कर कछु काल कर मन सुमिर प्रभु दिन रैंन को ।

एक भक्ति अपनी देउ माधव भव सागर के तरन को ॥


शालिग्राम

शालिग्राम सुनों विनती, मेरी यै वरदान दया कर पाऊँ ।

प्रात काल मुख मंजन करके, प्रेम सहित प्रभु तुम्हें जगाऊँ।

नहाय धोय झारी भर लाऊ प्रेम सहित स्नान कराऊँ ।

पीरो पटंबर और पीतांबर केसरिया बागौ पहनाऊँ ।

फूल गुलाब के हार मंगाऊं, प्रेम सहित प्रभो हार पहराऊ ।

छप्पन भोग छत्तीसौ व्यंजन, प्रेम सहित प्रभो भोग लगाऊँ।

सोने की झारी गंगाजल पानी, प्रेम सहित आचमन करवाऊँ ।

नागर बेली के पान मंगारऊँ, प्रेम सहित प्रभुबीरी लगाऊँ।

आप बिराजौ रतन सिंहासन, झालर घंटा शंख बजाऊँ ।

जो कुछ पाप किये दुनिया में, परिक्रमा के संग बहाऊं।

जो कुछ पुण्य किये दुनिया में, राधा किशन हरि के हेत चढ़ाऊं।

एक मनोरथ है मेरे मन में, जम के द्वारे कभी न जाऊ।

भव सागर से पार उतारौ, सब देवन के दर्शन पाऊ।

तीन बूँद चरणामृत लेकर, कुटुंब सहित बैकुठहि जाऊ।


तुलसी

कहाँ से आई रानी तुलसा , कहाँ तुम जाइयो ।

कहाँ री लियौ विश्राम कहाँ तेरौ सासरौ ॥१॥

गढ़गोकुल सोंआई, वन्दावन जाइये |

मथुरा में लियो विश्राम द्वारका में सासरी ॥२॥

में तुम्हें पूछी रानी तुलसा कहा जप-तप किये, कहा रे किये निरहार कहा वर पाइये ॥३ ॥

नहाई हों कार्तिक मास , शीतल जल सेइये |

ब्रत किये निरहार कृष्ण वर पाइये ॥४॥

में तेरी पकड़्‌गी बांह, भुजनतल लै चलूँ।

राखों प्राण अधार कृष्ण मेरो कहा करे ॥५॥

जो मेरी पकड़ौगे बांह, भुजतल ना चलूँ ॥ मोती सी

ढुरि जाऊँ कृष्ण बिन ना रहूँ ॥६ ॥

आई महादेव को बरात शहर खल-बल मची ॥

तुलसी भई हैं अलोप शहर दूँढन चलौ ॥७॥

आई श्री कृष्ण की बरात शहर बाजे बजे ॥

तुलसी कौ रचौ है विवाह शहर मंगल गवे ॥८॥

जो या तुलसाये गाव गाय, सुनाइये ,

कटें जनम के पाप सदा फल पाइये ॥९ ॥

क्वारी गाबें तो घर वर पाइये ॥

तरूणी पत्र खिलामें बुढ़िया बैकुण्ठ पाइये ॥१०॥


राजभोग

भोजन कर लै नंद दुलारे ।

पूड़ी कचौरी और इमरती बरफी अधिक निराली ।

लड॒डू पेड़ा और रसगुल्ला बालूशाही अधिक निराली ।

आलू रतालू और जिमीकन्द मैथी की भुजिया न्यारी

पापड़ फैनी और मिरचौनी, सेब सलौनी न्यारी ।

आमी अचारी और मुरब्बा नीबू टेंटी न्यारी ।

मूंग भात और कढ़ी पकौरी ऊपर फुलका न्यारे ।

औटो दूध, दूध में मेवा ऊपर, सरस मलाई ।

छप्पन भोग छत्तीसौ व्यंजन, ऊपर तुलसा न्यारी ।

कर भोजन सिंहासन बैठे काटी फंद हमारे ।

सोने कौ लोटा गंगाजल पानी नारद मुनि पगधारे ।

सौरे सफेदी और गेंदुआ लक्ष्मी संग सिधारे ।

भोजन करले नन्द दुलारे ।


बीड़ा

गोविन्दा बीरी देंठगी नागर पान की रे ।

समलिया बीरी देंठगी नागर पान की रे ।

राधे श्याम की रं, सीताराम की रे ।

औरों की बीरी लाला ऐसी रे वैसी , मेरी लगी है

राधे श्याम की रे, सीताराम की रे ।

कत्था चूनों और इलायची बीरी लगी है राधेश्याम की रे गुरूज्ञान की रे ।

आओ चतुर्भुज चौपड़ खेलें बाजी लगी है।

राधेश्याम की रे, सीतारामकी रे, श्यामा-श्याम की रै ॥

हार तो मैं दासी तुम्हारी , जीतूँ तो बेटी वृषभान की रे बड़े गोप की रे ।

वृन्दावन की कुन्ज गलिन में जोरी बनी है

राधेश्याम की रे श्यामा श्याम की रे।

तेनें ती बंशी वारे सब जग मोह्यौ बेटी तो मोही

वृषभान को रे। राधे श्याम की रे। श्यामा श्याम की रे।

तैने तो मारी मेरे फुल भर छड़ियाँ ।

मैंने ती मारी नैना बान की रे गुरूज्ञान कीरे ।


आरती

काहे को दिवला काहे की बाती ? काहे को घिरत जरै सारी राती ?

सोने को दिवला कपूर की बाती सुरई को घिरत जरै सारी राती ।

जो या आरति को सवेरे ही गाबै, अपने किशन हरि के दर्शन पाबै ।

जो या आरति को दोपहर में गावै , छप्पन भोग रसोई में पाबै ।

जो या आरति को सई-सनजा गाबै, अपने किशन हरि की सेज ।

बिछावैे। जो जा आरति को आधी रात गावै अपने किशन हरि के चरण दबांवै ।

जो या तुलसा में सीचैगी पानी, अपने किशन हरि की होवै पटरानी ।

जो या तुलसा में सीचैगी रोली, अपने किशन हरि के आंचल जोरी ।

जो या तुलसा पै पुष्प चढ़ावै, अपने किशन हरि के लाढ़-लढ़ावै।

जो या तुलसा के भोग लगावै, छप्पन भोग रसोई में पावै ।

जो या तुलसा में जोरैगी दीओ जोरै सुहागिनी पाबैगी कीयो

तेरी आरति लइये उतार दीन दयाल हरी तेरी आरति पै बलिहार गोविंद हरी ,

गोपाल हरी हम दीन हरी, तुम दयाल रही ।


सैन

सौर सुफेदी और गैंदुआ श्री राधा दमोदर की सेज बिछाऔ

पांचो पंडन की सेज बिछाऔ छटे नरायन की सेज बिछाऔ |

बिछिए सेज पौडे बनवारी , चरणों में लोटेंगी

राधा प्यारी। कार्तिक बारी और घरबारी |

बार-बार मैं बरजों बनवारी तिरिया जनम मत देऔ हमारौ, तिरिया

जनम राधे हीन हमारी ! कैसे तौ परसेंगी ठाक्‌र द्वारौ ।

तिरिया जनम राधे सुफल तुम्हारी, नित उठ परसौगी

ठाक्र द्वारा - सदाँ उठपरसौगी ठाक्‌र द्वारौ ॥

तुलसी की माला मेरे गल सोहै, चंदन हार राधे जी को सोहे

गोबिन्द हरी गोपाल हरी हम दीन हरी तुम दयाल हरी

--.--

पथवारी मेरी पंथ की रानी भूलेनें राह बताइये |

छबीली जो विरन घर आईयो सपूती जो पुत्र घर आईयो |

गौरा दे जो महादेव घर , सीता दे जो राम घर आईये |

पथवारी पूजी पंथ सिराऊ घी कौ दिवला जोरों ।

राई कौ बल्ल भ आयी संसार कौ प्यारी आयौ।

आओ घरा स्वामी आओ घरा मेरे मस्तक ऊपर पैर धरौ।

मेरी राम रसोई में भोजन करौ, मेरी लाल पलेंगिया पै शयन करौ |

गोविन्द हरी गोपाल हरी हम दीन हरी तुम दयाल हरी |

--.--

तुमसे मनुआ लाग रहौ तुम जागौ मोहन प्यारे।

गंगा जागी, जमना जागी, जागे न्हाइबे बारे |

गौरी जागी महादेव जागे जागेपूजन हारे ।

तुलसा जागी शालिग्राम जागे जागे सींचन हारे ।

भोर भई चिड़िया चहचहाईं घर घर खुले किबारे।

गैया जागी बछड़ा जागे, जागे दोहन हारे |

मात यशोदा दही बिलोबै कंगन के झनकारे |

मात यशोदा लाई कलेवा लड्डू सकल पारे |

तुमसे मनुआ लाग रहौ तुम जागौ मोहन प्यारे ।

श्री राधादामोदर आरतौ हो माय

यशोदा मैया श्री नारायण कौ आरतौ हो माय

नारायण के आरते में कहा कहा फल होय, सम्पत्ति होवे,

धन बढ़े कोई और मुक्त गत होय

नारायण के आरते में चार जनी रखवार, सीता, माता द्रोपदी कोई और कोशल्या, माय ।

गंगा सों जमुना बड़ी तीरथ बड़े प्रयाग व्रतन में एकादशी कोई और बड़ी हरी को नाम ॥

चंदनभर लेऔ चौकडा गले मुतियन भर लेऔ मांग करो किशन कौ आरतौ कोई हियरा

सो हेत लगाय ॥


अरग

अरग दै री अरग दे, मात पिता कौ, साई के दरबार कौ, अपनी सुमिरन काया कौ,

अपने कार्तिक नहाये कौ , अपने पाँच महात्तम को ,

कूकरिया चौराई काई गई किशन के सासरें, जोर दिवाली दिवला,

हमनें जोरी दिवला, हमने काढ़ौ गऊ ग्रास,

हमनें पायो भोग विलास, बालापन सों करती आई तब पायौ वन्दावन बास,

हरी को धूनी हरी कपाट, जाय खो ले प्रीतम के द्वार, प्रीतम प्यारे ने बात चलाई,

संग सहेली कार्तिक नहाई, भर नहाई भरेले नहाई नाराइन केलेखें नहाई अंतकाल

चौबीसौ नहाई जाकौ नहायोौ कबू न जाय ।

सोचन देव न हारे सोचन जा, राधा दामोदर पौंचन जा,

कौड़ी-कौड़ी आमरौ, राई दामोदर सामरौ, ठाकुर आगें झाँझ , बजावे

जम के द्वारे कबू न जावे ।


पलना

काहे को तेरी अलना री पलना, काहे की लागी है डोर। झुलाय मेरी सजनी ।

अगर चंदन को अलना री पलना रेशम लागी है डोर | झुलाय मेरी सजनी ।

राम झूलें कौशल्या झुलावै दशरथ झोंटा देंय। झुलाय मेरी सजनी ।

कृष्ण झूलें यशोदा जी झुलावें नन्दबाबा झोटा देय । झुलाय मेरी सजनी।

हाथन हरि के कडूला सोहें, पांयन में झनकार। झुलाय मेरी सजनी ।

हरि दरियाई को फैटा चतुर्भुज, पीताम्बर धोती रे। झुलाय मेरी सजनी।

एक दिनां हरि मैदा खाई दरद उठी ललना

एक दिना हरि ब्रज रजखाई तीन लोक रचना, झुलाय मेरी सजनी ।

ठुमक-ठुमकहरि अंगना में डोलें , हरस रही है माय। झुलाय मेरी सजनी ।

एक सखी मेरे आँच कों आई, नजर लगाई ललना। झुलाय मेरी सजनी |

नाक सकोड़ै मेरी भीं मसकौड़े, हुलर-हुलर दुध डारे। झुलाय मेरी सजनी ।

वा गौपीय पकर बुलाऔ, राई नौंन उतारै यशोदा मैया, खेल उठी ललना

रश्यो देखो री यशोदा मैया तेरो ललना, झूलै पलना, खेलै अंगना, मांगे झुंझना ।

इत मथुरा उत गोकुल नगरी बीच बहै शीतल यमुना निरमल यमुना ।

देखौ - देखौ । बाहर देखौ तौ बारह री बरस कौ घर देखो झूलै पलना ।

देखौ - देखौ । मथुरा में हरि जनम लियौ है गोकुल जाय झूलौ पलना ।

देखौ देखौ। राम-राम कहि सेतु बंधायौ नख ऊपर गिरिवर धरना ।

देखौ - देखौ। गौतम नारि अहिल्या तारी तौ इत गोपिन संग कियौ रमना ।

देखौ - देखौ। रावन के दस शीश उतारे, कसा मार बहायौ जमुना पधरायो जमुना ।

देखौ - देखौ............................


परिक्रमा

दीजे मेरे या ठाकुर की फेरी, दीजै मेरे राधा दामोदर की फेरी,

फेरी देत कहा फल पायौ, तौ कट जाय जम की बेरी ।

इन पायन परिक्रमा दीजे, मथुरा वन्दावन की,

गोकुल महावन की राधाक्‌ण्ड गोवर्धन दाऊजी की,

चिंता कब जाइगी मेरे मन की, जब मेरे प्राण मुक्त है जाँगे तो तब जाइगी मेरे मन की

आओ री मेरी संग सहेली तो हिल-मिल कार्तिक नहइये ।

ऐसी जुगत सों कार्तिक नहइयै धुरै बैकुण्ठ को जइये ।

साठी के चावल मूँग मनोहर घी सुरई को खइये।

राधा दामोदर बलि जइये ।

दीपक जोर धरो मन्दिर में , तौ धरती में सेज बिछहये ।

राधा दामोदर बलि जइये ।

सासननद को चुनी भुसी के, तौ अपनों ही पेट मलहियै |

राधा दामोदर बलि जइये |

बंसी कौ बजइया मेरे प्रान लियें जाइ। रथ ठाड़ौ रहियो रे ।

उश गई गोपी, कहाँ गये ग्वाल, कहाँ गये बंसी के बजइया नन्दलाल ।

घर गईं गोपी , बन गये ग्वाल, बंसी के बजइया लाल गये ससुराल ।


रथ ठाड़ौ रहियो रे

कहा खामें गोपी, कहा खामें ग्वाल , काहे के खबइया मेरे मदनगुपाल ।

लड॒डू खामें गोपी, पेड़ा खामें ग्वाल, माखन के खबइया मेरे मदनगुपाल

रथ ठाड़ौ रहियो रे ...............

कहा पीवे गोषी , कहा पीवें ग्वाल , काहे के पिवइया मेरे मदनगुपाल ।

पानी पीवें गोपी , शरबत पीवें ग्वाल, दूध के पिवइया मेरे मदनगुपाल ॥

रथ ठाड़ौ रहियो रे ...............

कहा पेरें गोपी, कहा पेरें ग्वाल, काहे के पिरैया मेरे मदनगुपाल ।

सारी पैरें गोपी, कूर्त्ता पैरें ग्वाल, पीताम्बर के पिरैया मेरे मदनगुपाल |

रथ ठाड़ौ रहियो रे ...............

कहा देंगी गोपी, कहा देंगे ग्वाल, काहे के दिवइया मेरे मदनगुपाल ।

शक्ति देंगी गोपी, भक्ति देंगे ग्वाल, मुक्ति के दिवइया मेरे मदनगुपाल ॥

रथ ठाड़ौ रहियो रे .............

राधा दामोदर बलि जइये। कार्तिक पूजा प्रेम लियौ है ताकौ नेंमनिभइयै

पीढ़ा खाट त्याग कें सजनी भूमि पै आसन सजइये ॥

साठी के चामर मूँग मनोहर घृत सुरई कौ खइये

कार्तिक मास नौंमी उजियारी आमरे तन जइयै ।

पूनों जुगल जोड़ा जिमाइकें इच्छा भोजन पइयै ।

क्वारी करें सुघरु बरु पामें तरुनी लाल खिलइयै ।

बद्धान्हाइ विष्णु पद पावे तरि बैकुण्ठै जइये ॥

राधा दामोदर बलि जइयै॥

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