श्री यमुना जी के सुपुत्र माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मण

श्री उद्धवाचार्य देवजू के पुत्ररत्न श्री भगवंतदेव कृत


चाह करी मन में रवि नंदिनी, सप्त ऋषीन के बालक टेरे ।

पुत्र बिना घर सून्यौ अमंगल, बाल विनोद अनंद घनेरे ॥

'भगवंतजू' या विधि पाइ सनेह, कहें सब जै जै महा सुख हेरे |

माथुर बत्स लगाए हिएते, सो आज सों पूत भए तुम मेरे ॥

मो मथुरा करियो सदाँ बास, औ कोजो सदाँ पयपान सुखारी ।

उत्तम भोजन-कंचन बैभव , पाऔ स्दाँ मुद मंगलकारी ॥

'भगवंतजू ' पूजियो मोहि सनेह सों, जोनहिं पूजेसो होइ भिखारी ।

पूत सपूत बने रहौगे तो में, रक्षा करों सब काल तिहारी ॥

द्वार पै नाम जो मेरो लिखे, घर भीतर सेवा मेरी पधराव |

मंत्र जपै नित ध्यान धरै, सिर सादर नाइ मेरे गुनगावे ॥

भगवंत प्रसादी बिना नहि भोजन, पर्व पै उत्सव हर्ष मनावे ।

या विधि मेरी अधार गहें रहै, ऐ सौ सपूत मेरे मन भाव ॥

श्री यमुना कृपा-कटाक्ष का प्रत्यक्ष प्रभाव-

राजा नवै, महाराज गहैंपद , मातु कपा को प्रताप है भारी |

संत महंत आचार्य धनाधिप, आसन दै करें मान अपारी ॥

भगवंत वैभव ठाट लगे हैं, भाव अभाव न होंइ दुखारी ।

ऐसी उदार अपार कृपा, रवि नंदनि की महिमा कछ न्यारी ॥

जप-तप धर्म अधार द्रढ़, सस्कृति के प्रतिपाल।

चार सहस्र सुपुत्र गृह, माथुर चोबे लाल ॥


लोकप्रचलित

माशुर महीप महिमा

सतयुग में मुनि मस्तक भये, त्रेता यज्ञ करावत रहे। द्वापर में हरि माँग्यौ भात, कालियुय में चोबे विख्यात ॥


  • बाबा बालमुकुन्द कृत -

भावुक है भक्त भोगिया हैं भाग्यशाली बड़े, कृष्ण बलराम युग रूप के उपासी हैं।

अच्युत अचित ही को चिंतन करन बारे, नित्य लीला धाम के निरन्तर निवासी हैं।

सुकवि ' मुकुन्द ' अनु भवी अनुरागी विज्ञ, पूर्ण अधिकारी हरि-रस के प्रकासी हैं।

कृष्ण के स्नेही हैं सखा हैं औ सहायक हैं, कृष्ण ही कौ रूप मथुरापुरी के निबासी हैं ॥

दिव्य हैं बली हैं देव पूजित हैं दर्शनीय, अदभुत्‌ आनन्द हैं बिलक्षण बिलासी हैं |

भोगिया हैं साहसीहैं मान अभिलाषी बड़े, स्वस्थ हैं प्रसन्‍न हैं, सगर्व स्पष्ट भाषी हैं ॥

सुकवि ' मुकुन्द ' महाज्ञानी स्वाभिमानी बड़े विज्ञ हैं विलक्षण पराक्रम प्रकासी हैं।

प्रेमी हैं प्रतापी हैं गुनी हैं गुनग्राही हैं, अलभ्य रसरासी मथुरापुरी के निवासी हैं ॥

हौआ जी सी वली सूठा राम जी से द्रढ़ ब्रत बंसा जी से साहसी बढ़ायौ यशभारी है।

उद्धव उजागरसे पंडित प्रतापी भये छीतस्वामी सेवा की सरस रीतिधारी है ॥

सुकवि ' मुकुन्द ' दिव्य गायक गनेश तुल्य काव्य की कला में कवि विदित बिहारी है।

सूदन और खड़ग उरदास से सुकवि ऐसे रतनन की खान मथुरापुरी हमारी है।

नाना मारतंड तीन लोक में प्रकास करें, मामा धर्मराज जग शासनाधिकारी हैं।

मौसी भागीरथी सो अधम उधारनी हैं, ननसाल उत्तम हिमाचल सुखारी हैं॥

मुदित मुकुन्द ' खट वदन गनेस ईस , वरूण कवेर इन्द्र देवतन ते यारी हैं।

माल के चखैया गिरिराज के सखा हैं हम, माथुर मुनीस मात यमुना हमारी हैं।

विप्र रूप मथुरा बसें सप्त रिषिन के बाल। चार वेद सम्पन्न हैं या सों चौबे लाल ॥

यासौ चौबे लाल, माल तुलसी उरधारें। हैं दातन के मित्र सूम गल घोंट पछारें |

राजा राना रावकी तनिक न राखें कान। यों बचनन कर भेद है ज्यों अर्जुन के बान॥


  • कवि इच्छाराम कृत :-

तिलक जनेऊ धारें लसै उर बन माला, कंचन सी देह हूँ विचित्रता में आनिये ॥

साथ हैं त्रिकाल संध्या पूर्ज नित शालिग्राम जप-तप-पाठ-पूजा नीकें कर जानिये ॥

कहैं कवि 'इच्छाराम ' दयालू सन्तोषी बड़े, श्रवन सुनत हरि-जस की कहानिये॥

बिमल बसन षटरस व्यंजन सवाद जानें , ऐसे होंई लक्षण तौ माथुर पहचानिये ॥


  • कवि विराट कृत :-

प्रात उठि मंगला कौ धार्वे मथुरा के लोग, कोऊ रंगेश्वर जाइ बोल उठे बम-बम ।

आचमन करै कोऊ गोता लेइ गिन-गिन कोऊ वुरजन चढि कूट परै धम-धम ॥

करत कलेऊ ये जलेबी कचौरिन के मस्ती में कटें हैं दिन कैसी रंज काकी गम ।

तोको कहा जानें तेरे बाप की न मानें यमुना के पूत हम मामा हमारे यम ॥


श्री यमुना जी के स्वरुप का रहस्य

यमुना जी को महिमा का गुनंगान अनेकों पुराणों और ग्र॑न्थों में किया गया है इन्हीं ग्रन्थों में शाण्डिल्य संहिता के अंन्तर्गत २१वे अध्याय में श्री यमुना जी को भगवान श्री कृष्ण की प्राप्ति और भगवान श्रीकृष्ण के स्वरुप की प्राप्ति की सुन्दर कथा है जिसमें श्री यमुना जी और उनके पिता का संवाद है एवं यमुना जी और भगवान श्रीकृष्ण का संवाद है।

श्री शाण्डिल्य उवाच


        पुरा कुतयुगे रेव: सविता सुषवे सुताम ।

        यमुनेति च विख्यातां देवता च शुचिष्मतीम्‌ ।

    श्री शाण्डिल्य ने कहा पूर्व में जब कृतयुग का काल था उस समय सूर्य देव को पुत्री रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होंने यमुना रखा वह साक्षात्‌ शुचिष्मती देवता थी |


        पप्रच्छ पितरं सा च कः परो वापरो यत: ।

        कथें प्राप्यो भवेदेव ततः प्राह पिता सुताम ॥

     तब श्री यमुना जी ने अपने पिता सूर्य देव जी से पूछा। हे पिता संसार का पर अथवा अपर देव कौन है। कृपया मुझे बतलाये


        तपसा ब्रह्मणा पूर्व जगत्सृष्टमिति श्रुतम्‌ ।

        तप भवती देवं स्थीयं विज्ञातुमरईति ॥

     भगवान सूर्य ने कहा हे पुत्री ब्रह्मा जी ने जिन भगवान श्रीकृष्ण की तपस्या करके संसार की सृष्टि की है उन परम देव श्रीकृष्ण की तुम तपस्या करो।


        सा कलिन्दगिरिं प्राप्प तपश्चक्रे सुदारुणम्‌ ।

        ध्यायन्ती रमणं देवं ब्राह्ममल्पमनीनयत्‌ ॥

        ततः प्रसन्‍नो भगवान श्रीकृष्णो भकक्‍तवत्सल: ।

        प्रादर्भूय गिरी तत्र बेणुनाद चकार सः ॥

     तब श्री यमुना जी ने कलिन्दगिरि पर जाकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण की घोर तपस्या की है इस तपस्या में ब्राह्मकल्प व्यतीत हो गया है। तदनन्तर उनकी तपस्या से प्रसन्न हुये भकतवत्सल भगवान श्रीकृष्ण ने उसी पर्वत पर प्रकट होकर वंशी नाद किया है।


        तस्य नादस्य हर्षेण द्रवीभूता ततो हिसा ।

        दिव्य रूपा ततो जाता जगतां पावनी परा ॥

     उस वंशी निनाद से प्रसन्‍न होकर वह सूर्यसुता द्रवीभूत होकर संसार को पवित्र करने वाली दिव्य स्वरूप सरिता के रूप में यमुना नदी हो गई ।

     भगवान ने श्री यमुना जी पर प्रसन्‍न होकर नवीन कमल की माला और अपना सारुप्य उन्हें प्रदान किया है और कहा है कि यमुने तुम भक्तिपूर्वक मेरी प्रिया वनो ।


        इदं नाम्नां सहस्त्रं में पद्ठयेन विकध्यसे ।

        मम लोके सरिदृपे दिव्य रूपे प्रविश्यताम्‌ ॥

     भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना दिव्य सहस्त्रनाम प्रदान किया है और अपने निज धाम गोलोकधाम में स्थान प्रदान किया है।


        अस्पयि्ज ते द्रवे कान्‍्ते मज्जतां भुक्तिभुक्तय: ।

        भविष्यन्ति वशीभूता भक्तिर्मे नच त्वां बिना ॥

     हे यमने इस मनोहर आपके दिव्य द्रव में भोग और मोक्ष दोनों निरज्जन करें। ये सभी आपके दश में रहेंगे और आपके बिना मेरी भक्ति किसी को प्राप्त नहीं होगी ।

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