श्राद्ध कर्म

Updated: May 3, 2020


(शास्त्रों में मृत्यु का स्वछूप-मृतक के कल्याणार्थ अन्त्येष्टि एवं श्राद्ध-कर्म का विशेष विवेचन उपलब्ध है। म्॒त्यु के उपरान्त औघ्र्व धेहिक संस्कार को, जो अपने नाम के अनुरूप अन्तिम संस्कार है, समाज में आज भी वैदिक विधान के अनुसार निष्ठापूर्वक निष्पादित कराया जाता सक्षिप्त-सारयर्भित विवेचन)


जीवन की परिसमाप्ति मृत्यु से होती है, इस ध्रुव सत्य को सभी ने स्वीकार किया है और यह प्रत्यक्ष भी दिखलायी पड़ता है। 'जीवात्मा इतना सूक्ष्म होता है कि जब वह शरीर से निकलता है, उस समय कोई भी मनुष्य उसे अपने चर्मचक्षुओं से देख नहीं सकता और यही जीवात्मा अपने कर्मों के भोगों को भोगने के लिये एक अंगुष्टपर्वपरिमित आतिवाहिक सूक्ष्म (अतीन्द्रिय) शरीर धारण करता है - ततक्षणात्‌ सो5थ गृह्राति शरीर चातिवाहिकम। अड्डुष्टपर्वमात्र तु स्वप्राणैरेव निर्मितम्‌ ॥ (स्कन्द. 1/2/50/62) जो माता-पिता के शुक्र-शोणितद्वारा बनने वाले शरीर से भिन्नत होता है-वाय्वग्रसारी तद्गुपं देहमन्यत्‌ प्रपद्मयते । तत्कर्मयातनार्थे चन मातृपितृसम्भवम्‌ ॥ (ब्रह्म. 214/46 )       इस अतीन्द्रिय शरीर से ही जीवात्मा अपने द्वारा किये हुए धर्म और अधर्म के परिणामस्वरूप सुख-दु :ख को भोगता है तथा इसी सूक्ष्म शरीर से पाप करने वाले मनुष्य याम्यमार्ग को यातनाएँ भोगते हुए यमराज के पास पहुँचते हैं एवं धार्मिकजन प्रसन्नतापूर्वक सुख-भोग करते हुए धर्मराज के पास जाते हैं। साथ ही यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि केवल मनुष्य ही मृत्यु के पश्चात्‌ एक ' आतिवाहिक ' सूक्ष्म (अतीन्द्रिय) शरीर धारण करते हैं और उसी शरीर को यमपुरुषों के द्वारा यामबपथ के यमराज के पास ले जाया करते है, अन्य प्राणियों को नहीं; क्योंकि अन्य प्राणियों को यह सूक्ष्म शरीर प्राप्त ही नहीं होता, वे तो तत्काल दूसरी योनि में जन्म पा जाते हैं। पश्चु-पक्षी आदि नाना तिर्यक्‌ योनियों के प्राणी मृत्यु के पश्चात वायुरूप में विचरण करते हुए पुन: किसी योनि-विशेष में जन्म ग्रहण हेतु उस योनि के गर्भ में आ जाते हैं। केवल मनुष्य को अपने शुभ और अशुभ कर्मों का अच्छा-बुरा परिणाम उस लोक में भोगना पड़ता है। मनुष्या: प्रतिपद्यन्ते स्वर्ग नरकामेव वा। नेवान्ये प्राणिन: केचित्‌ सर्व ते फलभोगिन: ॥ शुभानामशुभानां वा कर्मणां भूगुनन्दन। सज्चयः क्रियते लोके मनुष्येरेव केवलम ॥ तस्मान्‌ मनुष्यस्तु मृतो यमलोक॑ प्रपद्यते। नान्यः प्राणी महाभाग फलयोनो व्यवस्थित: ॥ (विष्णुधर्मोत्तर 2 /113/4-6) अपने शास्त्रों-पुराणों में मृत्यु का स्वरूप, मरणासन्न व्यक्ति की अवस्था और उसके कल्याण के लिये अन्तिम समय में किये जाने वाले कृत्यों तथा विविध प्रकार के दानों आदि का निरूपण हुआ है, साथ ही मृत्यु के बाद के औरध्व॑देैह्िक संस्कार, पिण्डदान (दशगात्रविधि-निरूपण ), तर्पण, श्राद्ध, एकादशाह, सपिण्डीकरण, अशौचादि निर्णय, कर्मविपाक, पापों के प्रायश्चित का विधान आदि वर्णित है। मनुष्य इस लोक से जाने के बाद अपने पारलौीकिक जीवन को किस प्रकार सुख-समृद्धि एवं शान्तिमय बना सकता है तथा उसकी मृत्यु के बाद उस प्राणी के उद्धार के लिये पुत्र-पौत्रादि के कया कर्तव्य हैं, इसकी जानकारी सबको होनी चाहिये । “पुत्रामनरकात्‌ त्रायते इति पुत्र: नरकसे जो त्राण (रक्षा) करता है, वही पुत्र है। सामान्यतः: जीव से इस जीवन में पाप और पुण्य दोनों होते हैं। पुण्य का फल है स्वर्ग और पाप का फल है नरक। नरक में पापी को धोर यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। स्वर्ग-नरक भोगने के बाद जीव पुन: अपने कर्मों के अनुसार चौरासी लाख योनियों में भटकने लगता है। पुण्यात्मा मनुष्ययोनि अथवा देवयोनि प्राप्त करते हैं, पापात्मा पशु-पक्षी, कौट-पतंग आदि तिर्यक्योनि प्राप्त करते हैं। अतः अपने शास्त्रों के अनुसार पुत्र-पौत्रादिका यह कर्तव्य होता है मदर वे अपने माता-पिता तथा पूर्वजोंके निमित्त श्रद्धापूर्वक कुछ ऐसे शास्त्रोक्त कर्म करें, जिससे उन मृत प्राणियों को परलोक में अथवा अन्य योनियों में भी सुख प्राप्ति हो सकें । इसीलिये भारतीय संस्कृति तथा सनातन धर्म में पितऋण से मुक्त होने के लिये अपने माता-पिता तथा परिवार के मृत प्राणियों के निमित्त श्राद्ध करने की अनिवार्य आवश्यकता बतायी गयी है। श्राद्धकर्म को पितृकर्म भी कहते हैं। पितृकर्म से तात्पर्य पितृ पूजा से है। पितृ कार्य में वाक्य की शुद्धता तथा क्रिया की शुद्धता मुख्य रूप से आवश्यक है-'पितरोवाक्यमिच्छन्ति भावमिच्छन्ति देवता: पितर वाक्य और क्रिया शुद्ध होने पर ही पूजा स्वीकार करते हैं जबकि देवता भावना शुद्ध होने पर। क्रिया तथा वाक्य में कोई त्रुटि हो जाय तो भी वे प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्त की पूजा स्वीकार कर लेते हैं। अतः: पितृ कार्य में देव कार्य की अपेक्षा अधिक सावधानी की आवश्यकता है। वार्षिक तिथि पर ब्राह्मण भोजनात्मक सांकल्पिक श्राद्ध पूर्वाभिमुख हो हाथ में त्रिकुश, तिल, जल लेकर इस प्रकार संकल्प करें-       ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: नमः परमात्मने पुरुषोत्तामास ॐ तत्सत्‌ अद्यैतस्य विष्णोराज्ञया जगत्सृष्टिकर्मणि प्रवर्तमानस्थ ब्रह्मणों द्वितीयपरार्डे श्रीश्वेतवाराहकल्पेवैवस्व॒तमन्वन्तरे अष्टार्विशतितमे कलियुगे तत्प्रथमचरणे जम्बूद्वपे भारतवर्ष भरतखण्डे....... क्षेत्र (यदि काशी हो तो अविमुक्तवाराणसी क्षेत्रे गौरीमुखे त्रिकण्टकविराजिते महाश्मशाने भगवत्या उत्तरवाहिन्या भागीरथ्या वामभागे) बोद्धावतारे.......संवत्सरे उत्तरायणे/दक्षिणायन.......ऋतौ.......मासे...... पक्षे.......तिथौ......वासरे.......गोत्र:......(शर्मा /वर्मा /गुप्तो 5हम) ......गोत्रस्य अस्मत्पितु: क्षुध्यापिपासानिव्‌ त्तिपुर्वकमध्षयत्‌ प्तिसम्पादना था ब्राह्मणभोजनात्मकसाड्डल्पिकश्राद्धं पज्चबलिकर्म च करष्यि। संकल्पजल छोड़ दें ।

पंचबलि विधि

पाँच पत्तों पर अलग-अलग भोजन-सामग्री रखकर नीचे लिखे अनुसार पंचबलि करनी चाहिये- (1) गोबलि (पत्ते पर)-मण्डल के बाहर पश्चिम की ओर निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए सव्य होकर गोबलि पत्ते पर दें- सौरभेय्य: सर्वहिता: पवित्रा: पुण्यराशयः। प्रतिगृहगन्तु में ग्रार्स गावस्त्रेलोक्यमातर: ॥ इदं गोभ्यो न मम। (यदि मन्त्र स्मरण न रहे तो केवल 'गोभ्यो नम: आदि नाम-मन्त्र से बलि-प्रदान कर सकते हैं।) (2) श्वानबलि (पत्ते पर) -जनेऊ को कण्ठीकर निम्नलिखित मन्त्र से कुत्तों को बलि दें । द्वी श्वानाौ श्यामशबलौ वैवस्वंतकुलोद्धवो। ताभ्यामन्न प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ। इदंएवभ्यां न मम। (3) काकबलि (पृथ्वी पर)-अपसव्य होकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर कौओं को ! भूमि पर अन्न दें- ऐन्द्रवारुणवायव्या याम्या वै नैऋतास्तथा। वायसा: प्रतिगृहान्तु भूमौ पिण्ड (मयोज्झितम्‌ ॥ इदंमत्रं वायसेभ्यो न मम । (4) देवादिबलि (पत्ते पर )-सव्य होकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर देवता आदि के ' लिये अन्न दें- देवा मनुष्या पशवो वयांसि सिद्धा: सयक्षोरगदेत्यसङ्पा: । ' प्रेता: पिशाचास्तंरव: समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्‌ ॥ इदंमत्रं देवादिभ्यो न मम । (5) पिपीलिकादिबलि (पत्ते पर)-इसी प्रकार मन्त्रसेचींटी आदि को बलिदें- पिपीलिका: कीटपतड्ढकाद्या बुभुक्षिता: कर्मनिबन्धबद्धा : । तेषां हितृप्त्यर्थमिदं मयात्न तेभ्यो विसृष्ट सिखिनो भवन्तु ॥ इदंमश्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम।


मातका-पूजन एवं नांठीमुरव श्राद्ध

इस अनुष्ठान विधान में सर्वप्रथम गणेश पूजन तत्पश्चात कलश पूजन-पुण्यावाचन-16 मातृका एवं 7 मातृकाओं का पूजन होता है। तदन्तर लक्ष्मी पूजन में रजत मुद्रा चिपकाई जाती है। मातृका पूजन के उपरान्त यह पितरों (पूर्वजों का जो दिवंगत हो चुके हैं) का आवाहन है। (तीन विश्वे देवा-माता-दादी-परदादी, पिता-बाबा-परबाबा, नाना-नानी-बड़नानी ) इनके नाम से 12 सीधे (12 आदमी का आहार) 12 ब्राह्मणों को दिया जाता है। इसे अपने कुल पुरोहित या कर्मकाण्ड के विद्वान ब्राह्मण से कराना चाहिए। यह हर्षसंतोष-समृद्धि का प्रतीक है जो सभी संस्कारों-गृह प्रतिष्ठा-चंड़ी पाठ एवं अन्यान्य अनुष्ठानों में अवश्य करना चाहिए। परिवार का वरिष्ठतम सदस्य जिसके पिता श्री दिवंगत हो चुके , मातृका पूजन का अधिकारी है। उसे मातृका विसर्जन के उपरान्त ही क्षौर कर्म कराना चाहिए। विसर्जन शुभ दिन वार देखकर तीसरे-चौथे या पाँचवे दिन करना चाहिए ।

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