शिखा

(यह संस्कार विकासशील बालक की अनेक अस्वस्थकारी कारणों से रक्षा करता है।........... उपनिषदों एवं ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार शिखा के नीचे बुद्धि चक्र है और उसी के समीप ब्रह्मरंध्र है जिसे योखुर आकार वाली शिखा आच्छादित कर ऊर्ध्वाभिमुखी मेघा की निरन्तर ब्रद्धि का मार्ग प्रश्स्त करती है।)


चूड़ाकरण उपनयनादि संस्कारों का उद्देश्य गुणाधान अर्थात्‌ मानवोचित विशिष्ट गुणों का समावेश है। “चूड़ा क्रियतेउस्मिन' का आशय वह संस्कार जिसमें बालक को चूड़ा अर्थात्‌ शिखा प्रदान की जाए। अमर कोष के 'शिखा चूड़ा शिखण्डस्तु ' का अभिप्राय: शिखा या चोटी है। यह संस्कार विकासशील बालक की अनेक अस्वस्थकारी कारणों से रक्षा करता है। मुण्डन अर्थात चोटी को छोड़कर क्षौर त्वचा रोगों का निवारण करता है। आयुर्वेद के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ चरक संहिता के अनुसार क्षौरादिकर्म, नख कटवाने आदि से बल तेज पुष्टि, वृष्यता, आयु, पवित्रता एवं सौन्दर्य की वृद्धि होती है। इससे मस्तिष्क को शीतलता-कोमलता एवं शक्ति प्राप्त होती है जो आगे चलकर बालक के बौद्धिक विकास में सहायक होती है। शिखा का आकार गोखुर के समान होना चाहिए। 'दीर्घायुष्टवाय वलाय वर्च से शिखाये वषट्‌!' वेद वचन है। स्वस्थ-सफल-दीर्घायु का मुख्य कारक युक्ताहार-विहार और नियमानुकूल दिन-चर्या, उसके हेतु अश्षुण्य ज्ञान शक्ति हैं। इसे ही प्रबल और जागरूक रखने के लिए हमारी संस्कृति के सूत्रधार महर्षियों ने जिन अमोध उपायों का आविष्कार किया उनमें हमारी शिखा को मुख्य स्थान प्राप्त है। हमारे यहाँ शिखा छेदन को महा अपमान और मृत्युसमान माना जाता रहा। उपनिषदों एवं ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार शिखा के नीचे बुद्धि चक्र है और उसी के समीप ब्रह्म रंप्र है जिसे गोखुर आकार वाली शिखा से आच्छादित कर ऊर्ध्वाभिमुखी मेघा को निरन्तर वृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती हैं। यह हमारे अनुष्ठानों में उत्पन्न ऊर्जा-अमृत तत्व सहख्रदल कर्णिका में प्रविष्ट होकर हमारे अंगों में ही रह जाता है अन्यथा वायुवेग इसे पुन: अपने मूल श्रोत सूर्य देव की ओर लौटा देता है। यह हमारी शिखा का धार्मिक-दार्शनिक महत्व अपने वैज्ञानिक उपादेय स्वरूप में है। इसीलिए शिखा बंधन अनिवार्य है। खुली शिखा इस वैज्ञानिक प्रक्रिया के प्रतिपादन में असमर्थ है।


महर्षि मनु के अनुसार -


स्नाने दाने जपे होमे , संध्यायाम्‌ देवतार्चने ।

शिखा ग्रन्थि सदाकुर्यादित्येतन्मनुरब्रबीत ॥



बालों का समुन्नत होना बौद्धिक जीवन से गहन सम्बन्ध रखता है। इसी अमृत तत्व को 'ओरा' शक्ति के नाम से जाना जाता है। 'पाश्चात्य वैज्ञानिक इसे 'मिस्टीरियन फोर्स (MISTIRION FORCE) कहते हैं। चण्डी कवच में 'शिखामुच्द क्षेत' द्वारा माँ जगदम्बा से अपने इसी ऊर्जा केन्द्र की रक्षा हेतु अनुनय करते हैं। सुश्रुतकार के अनुसार “मस्तक के भीतर जहाँ बालों का आवर्त (भँवर) होता है वहाँ सब नाड़ियों का मेल स्थल 'अधिपति मर्म-होता है। शिखा इस अति कोमल संद्योमारक मर्म स्थान का प्रकति प्रदत्त कवच है जो आकस्मिक आघात के अतिरिक्त उग्र शीत-आतप आदि से रक्षा करती है।


शिखा आर्य जाति का (हिन्दुओं का) पवित्र सामाजिक बिन्दु है जो अनेकानेक सम्प्रदायों , जाति-उप जातियों में विभक्त हम सबको एकता अक्षुण्य रखने का सुद्रढ़ आधार प्रदान करती है।

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