संकल्प क्यों ?

Updated: May 3, 2020


(मूलत: यह उत्सवपूर्वक, समाज साक्षी रूप में गायत्री मंत्र का उपदेश है............यह बटु का गुरू से प्रथम साक्षात्कार है जहाँ देवगुरू वृहस्पति बालक को गुरू से संयुक्त करते हैं।) प्रस्तुत संस्कार का महत्वपूर्ण बिन्दु वे शिक्षाएँ हैं जो इस अवसर पर ब्रह्मचर्याश्रम के निर्वाह हेतु बालक को दी जाती हैं। वे जीवन के दिव्य-भव्य प्रासाद निर्माण हेतु सुदृढ़ आधार-शिला एवं स्तम्भ सिद्ध होती हैं।)


        उपनयन संस्कार द्विजातियों के लिए आचार्य और वेद माता गायत्री की कृपा से पुर्जन्‍्म जैसा है जो हमें वेदाध्ययन (विद्यार्ज)) सहित समस्त श्रौत-स्मार्त देव, पित एवं ऋषि कर्मो के प्रतिपादन हेतु अधिकृत करता है। अथर्व 11/5/7 के अनुसार “आचार्य बटु (ब्रह्मचारी बालक) का उपनयन संस्कार कर ब्रह्मचर्य व्रत का आदेश देकर मानों गर्भ में रखता है। वह तीनरात्रि गुरू के समीप रहता है, तदन्तर वह द्विज स्वरूप दूसरा जन्म ग्रहण कर उत्पन्न होता है तो उसे देखने के लिए देवता भी एकत्रित होते हैं। माथुर चतुर्वेद ब्राह्मण समाज में वैदिक काल से ही इसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।


        सृष्टि के आदि से ही जनेऊ आर्य शरीर की शोभावर्धन करता रहा है। महर्षि मनु के मतानुसार यज्ञोपवीत संस्कार बिना द्विज किसी कर्म का अधिकारी नहीं। मौजी बंधन (यज्ञोपवीत) ब्रह्मत्वाधायक जन्म है, यहाँ गायत्री माता और पुरोहित प्रवर पिता हैं।


        तक यज्ञोपवीत संस्कार होना चाहिए। यज्ञोपवीत 'यज्ञ' व 'उपवीत ' इन दो शब्दों के योग से बना है। आशय है यजन को प्राप्त कराने वाला। 'शतपथ' में 'यज्ञो वै विष्णु: ' कहकर समस्त सचराचर में व्याप्त सगुण परमात्मा को यज्ञ शब्द से स्मरण किया है। अत: यह परमात्मा को प्राप्त कराने वाला है। यह यज्ञ से पवित्र उपवीत अर्थात्‌ सूत्र है। ब्राह्मण व४ लिए सदेव यज्ञोपवीत धारण और शिखाबंधन का विधान है। यह संस्कार यज्ञोपवीत के गरीयान ब्रह्मद :पिता ' कहकर महर्षि मनु ने आचार्य अभिनंदन किया है। स्मृतियों के आदेशानुसार ब्राह्मण बालक का सात वर्ष, क्षत्रिय ग्यारह और वैश्य का बारह वर्ष की उम्र अतिरिक्त उपनयन, ब्रतबृन्ध, मौजीबन्धन, जनेऊ आदि शब्दों से वर्णित है। अब उसे गुरूदेव की सेवा में विद्यार्जन हेतु समर्पित करना . है। अपने यहाँ दण्डकमण्डल पीत चीर धारण कर "काशी पढ़ने जाना' इसी परम्परा का प्रतीक है। मूलतः: यह उत्सवपूर्वक समाज साक्षी रूप में गायत्री मंत्र उपदेश है। यह वट का गुरू से प्रथम साक्षात्कार है जहाँ देवगुरू वहस्पति बालक को गुरू से संयुक्त करते हैं।


        इस प्रसंग में द्रष्टव्य है कि समाज में प्रचलित भिक्षा (भीख) की प्रथा भी परम प्राचीन एवं शास्त्रोक्त है। मनोवैज्ञानिक महर्षियों ने आचार्य द्वारा दीक्षा ग्रहण के उपरान्त विद्यार्थी द्वारा भिक्षाटन . का विधान किया जो समाज का दाय-देय और शरूकूलों, ऋषिकुलों की स्वचालित अर्थ व्यवस्था थी। यह विद्यार्थी का विद्यालय को समाज से अर्जित योगदान था।


        प्रस्तुत संस्कार का महत्वपूर्ण बिन्दु वे शिक्षाएँ हैं जो इस अवसर पर ब्रह्मचर्याश्रम के निर्वाह हेतु बालक को दी जाती हैं। वे केवल विद्यार्थी जीवन हेतु मार्गदर्शन ही नहीं कराती अपितु भावी जीवन के दिव्य- भव्य प्रासाद निर्माण हेतु सुदृढ़ आधार-शिला एवं स्तम्भ सिद्ध होती हैं। यह सदाचार की शालीन सात्विक शिक्षा है।


        यज्ञोपवीत धारण पूर्व वैदिक काल से प्रचलन में परम्परा सिद्ध है। जनेऊ धारण के पवित्र मंत्र में इसकी उत्पत्ति का स्पष्ट वर्णन है:-

                यज्ञोपवीतं परम पतविंत्रं प्रजापतेय॑त्सहज पुरस्तात्‌ ।

                आयुष्यमग्रयं प्रतिमुड्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेज: ॥

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