संध्यावंदन

Updated: May 3, 2020


ब्राह्वणों के ब्राह्मण होने की मुख्य मूल वस्तु संध्या है -         विप्रो वृक्षो मूलकान्यत्र सन्ध्या, वेदा: शाखा कर्म कर्माणिं पत्रम्‌।         तस्मान्मूल यत्रतो रक्षणीयं, छिन्न मूले नैव पत्र न शाखा: ॥         ब्रिप रूपी वृक्ष का मूल तो सन्ध्या है और डालियां वेद हैं। धर्म कर्म आदि उस वक्ष के पत्ते हैं। मूल की रक्षा बड़े यत्न से करनी चाहिये । मूल (जड़) के नष्ट हो जाने से न फिर पत्ते रह जाते हैं न डाली आदि; इससे जो मनुष्य अपने ब्राह्मणत्व की रक्षा चाहे वह अवश्य ब्राह्मणत्व रूपी वृक्ष की जड़ तो संध्या है उसकी रक्षा करें अर्थात्‌ विधि जतन कर भलीभांति सन्ध्या की उपासना करें।         जो संध्या को नहीं जानता जो सन्ध्या, की उपासना नहीं करता वह जीते हुए भी शूद्र के तुल्य होता है और मरने पर कुयोनि होता है इसलिये उत्तम सन्ध्योपासन कर्म को नित करें| इसके बिना किये और कामों के करने का अधिकार नहीं होता ।         जैसा व्यास स्मृति में लिखा है। यथा- सन्ध्यायेन न विज्ञाता सन्ध्या येनानुपासिता। जीवंद्धिजो भवेच्छाद्रों मृत श्वाचैव जायते ॥ तस्मान्नित्य प्रकर्तेक संध्योपासन मुत्तमम्‌ | तद्भवादं॑न्य कर्मादावधिकारी भवेन्नहि ॥         मनुजी महाराज ने तो यहाँ तक कहा है कि जो मनुष्य प्रात: सन्ध्या और सायं संध्या की उपासना नहीं करता उसे ब्राह्मण, क्षत्रीय, वेश्य के योग्य कामों से जैसे शुद्र को निकाल देते हैं वैसे द्विजों के सब कामों से अलग कर देना चाहिए। इसलिये सन्ध्या को अवश्य जानना चाहिये और सन्ध्या करना चाहिये। अस्तु।         वैसे इस भारत देश में किसी भी व्यक्ति को शुभ कार्य करने की इच्छा (यानी समन्ध्या) नहीं करती है चूंकि उसके पास समय नहीं है। प्राणी अनेक गोरखधंधों में फंसा रहता है। चतुर्वेदी बालक या जवान 30 मिनट तक आसन पर बैठकर सन्ध्या करे उसके पास इतना पमय ही पहीं है;         मैंने अपनी बुद्धि-विवेक से संक्षिप्त सन्ध्या करनी सोची है तथा बताता भी रहता हूँ यदि चतुर्वेदी बन्धु उचित समझें तो अवश्य करें जिससे शूद्र योनी से बच सके ।

अल्पकालिक संध्यावंदन

        1. प्रात: मंजन करने के उपरान्त आप बाथरूम में गये। नल के नीचे आपने स्नान किया। स्नान के बाद नल के जल से द्वार आचमन करें। प्राणायाम करें श्वास ऊपर नीचे ले जावें तथा नल के जल से सूर्य भगवान को अर्ध्य दें उस जल को बाथरूम को दीवाल पर डाल दें। फिर शरीर पोंछना शुरू कर दें और गायत्री मंत्र बोलते रहें। गायत्री मंत्र अपने में बोलें जब तक आप अपने कच्छा, बनियान पहिने मंत्र बोलते रहें। फिर बाथरूम के बाहर आकर आपने तेल लगाया, बाल संभाले, वस्त्र पहिने तब तक मंत्र बोलते रहें। इस प्रकार अपने 21 बार, 51 बार, 108 बार मंत्र बोल लिये होंगे जो कलिकाल में पर्याप्त है।         इस प्रकार से आपकी प्रात: सन्ध्या हो सकती है। ऐसा उचित समझें तो अवश्य करें| इस प्रकार करने से आपके समय की बचत हो सकती है वैसे आपको अवकाश ही नहीं है।         षोडश संस्कार में कुछ संस्कार आप अपने आप किसी गुरुजी की सहायता के बिना भी कर सकते हैं। यथा गर्भाधान, जातकर्म, नामकरण, अन्न प्रासन, मुण्डन है जिसकी विधि इस प्रकार से है। पहले हाथ में जल, अक्षत, गंध, पुष्प लेकर पूर्ववत संकल्प करें। अमुक कर्म करिस्ये।         जल को पात्र में छोड़ दें। मातृका पूजन करें। चिरंजीव बच्चे को बांस के सूप या बांस की पलरिया में लाल कपड़ें से लपेटकर बहूजी श्रीमान्‌ जी को दें। वे उसका मुख खोलकर चांदी की तस्तरी या कटोरी में घी शहद मिलाकर सोने की सलाई से बच्चे की जीभ पर लगा _ दें और बच्चे का माथा सूँघ लें। ये जातकर्म हुआ। सूतकी कंघनी वगैरह पिरा दें। चांदी को तस्तरी में सोने की सलाई से राशि का नाम जन्मपत्री में से लिखें। “ओं नामदेवताभ्यो नम: कहकर पीपल के पत्ते को हाथ में लेकर उसके दाहिने कान में दोनों नाम राशि वाला ओए बोलने का जो रखना चाहें उसे सुना दें। फिर आरती करवाकर न्यौछावर करके हाथ पर लड्,मिठाई रखकर रक्षाबंधन बांधकर उठा दें ।         फिर आंगन या बरामदा में ही चौक लगाकर पूर्व मुहानी बच्चे के सिर को घुटवा दें । कच्ची पूड़ी पर भुआ जडूली ले तथा मातृका के सामने रख दें फिर चून (आटा) की लोई में घी लगाकर चांद पर फिरवाकर रोली से स्वास्तिक लगाकर आरती कराकर हाथ पर मिठाई रखवाकर न्यौछावर कराके उठा दें। ये मुण्डन हुआ।         यज्ञोपवीत, विवाह, सीमंत संस्कार में तो गुरुजी आते ही हैं। शुभकर्म हो या अशुभकर्म हो ठाकुर जी के भोग के लिये पकवान तैयार होते हैं। सबसे पहले अन्नपूर्णा रखने के लिये सभी तैयार पकवान रखे जाते हैं तथा दीपक जलाया जाता है। पास में देव की छवि, बाबा-दादी की छबि रखें। उसके उपरान्त अछूता निकाला जाता है। अकछूता से तात्पर्य है कि पहली थाली मातृका के सामने रखें। दूसरी थाली अपने पूर्वजों के नाम की रखें। शुद्धता पवित्रता होनी चाहिये। इन थालियों में रखा हुआ प्रसाद घर की बहिन-बेटी को हाथ जोड़कर दे दें तथा ब्राह्मण भोजन से पहले बहिन-बेटी उस प्रसाद का भक्षण कर लें।         अन्नपूर्णा से तात्पर्य है कि आपका भंडार भरा रहेगा। पकवान व वस्तु कम नहीं पड़ेगी। छुआ-छूत नहीं होनी चाहिये इसी को अछूता कहते हैं। यही शब्द मृतक के नाम पर वर्ष पर्यन्त एक मान्य परिजन को खिलाने के लिए भी प्रयुक्त है और इसी में विशेष रूढ़ हो गया है।

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