पञ्चदेवोपासना ('पद्चभूतमयोदेहीं)

Updated: Jul 7, 2020

प्राचीन काल से सनातन धर्माबलम्बी हमारा समाज अपनी पारम्परिक गुरु-सम्प्रदाय के साथ पञ्चदेवोपासक रहा है। प्रधानतया विष्णु, सूर्य, शक्ति, शिव और गणेश की अनन्य उपासना का विधान है। अनन्यता का आशय अन्य का निषेध नहीं। विभिन्‍न सम्प्रदाय भेद सूचक नहीं। द्रश्य भेद मानव प्रकृति के स्वाभाविक भेद पर ही सुस्थिर किया गया है। हमारा समन्वय वाद सर्वत्र सार्थक और सकारात्मक है, क्योंकि वह मानव मन की मनोरम-उच्चतम भूमि विश्वराग पर अवस्थित है। श्री राम के अनन्य भक्त गो. तुलसीदास की विनय पत्रिका का आदि पद्य 'गाइये गणपति जग वंदन' से प्रारम्भ होता है। फिर क्रमश: सभी देवताओं के प्रति विनयपूर्ण प्रार्थना है। अनन्यता इतनी कि वे गणेश जी से भी यही माँगते हैं कि श्री सीताराम उनके मानस में निवास करें। यह आदर्श उदाहरण है।


संसार तीन गुण वाली माया का प्रपंच है इनका व्यास ही पंच महाभूत हैं। पाँच ही 'मलतत्व है, 'आकाशस्य पतिर्विष्णु एनेश्चैव महेश्वरी। वायोसूर्य क्षितेरीशो जीवनस्य गणाधिप:॥ अग्नि की दुर्गा, जल का गणेश और पृथ्वी का शिव है, अत: प्रधानतया मनुष्यों की पश्चविध प्रकृति होने के कारण ही प्राकृतिक उपासना पद्धति भी पश्चदेवोपासना के रुप में मानव मनोविज्ञान के अनुसार सुनिश्चित हुई है।


ईश्वर की आराधना में सघ्या-तर्पण, यज्ञ , हवन, जाप-वेद पाठ, भगवत्‌ कथा श्रवण, भगवन्‍्नाम संकीर्तन, यम नियमादि सेवनपूर्वक ध्यान समाधि उपासना के अंग हैं। सभी धार्मिक अनुष्ठान क्रमश: कर्म-उपासना और ज्ञान रुप में विभक्त हैं। यह अन्तःकरण अर्थात्‌ मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इन चार सूक्ष्म तत्वों का आध्यात्मिक संघात है।

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