मूर्ति पूजा की परम्परा और हमारा समाज

हमारे पूर्वज स्वधर्म एवं संस्कृति के विश्वकोष थे। उन्हें अपने जीवन अनुभव और ज्ञानार्जन के साथ कई-कई पीढ़ी पूर्व की प्रमाण-पुष्ट कथा कण्ठस्थ होती थी। ऐसे ही परम विश्वस्त-विज्ञ वयोव॒द्धों के मुख से सुना है कि वैदिक काल के आरम्भकाल से ही समाज के ऋषि-मुनि यज्ञ-संस्कृति के आरम्भ-कर्ता और प्रबल पुरोधा थे। वे गृहस्थ थे, ऋषिकुलों के सूत्रधार और संचालक थे। उनके आश्रमों (घरों) में, उनके वैयक्ति उपासना ग्रहों में, आदि नारायण (विष्णु) कष्ण-गोपाल की प्राण प्रतिष्ठित श्री विग्रह ( मूर्ति) विराजमान और विधिवत सुपूजित थे। निर्गुण परब्रह्म परमात्मा-यज्ञ भगवान के उपासकों की उपासना का यह नितान्त व्यक्तिगत पक्ष था जो शेष विश्व की द्रष्टि से ओझल था। कहते हैं कि, पाटलिपत्र में मौर्यवंश के सम्राटों का शासन था, सम्राट वृहद्रथ, जो अपने वंश का अन्तिम सम्राट सिद्ध हुआ, बौद्धों के प्रभाव में ब्राह्यपग- धर्म का बिरोधी बन गया। शासन क्लीव और पंगु बन गया। हमारे शिक्षा केन्द्रों को, गुरुकुलों को प्राचीनकाल से प्राप्त राजकीय सहायता और सामाजिक सम्मान स्थविरों ने बलातू बन्द करा दिए। सेना में भी भिक्षुओं के गुप्तचर घुसपैंठ करने लगे। जन-जन के मन में आक्रोश उमड़ उठा। सप्त महापुरियों में यह मुखरित हुआ। मगध सम्राट के ब्राह्मण महाबलाधिकृत पुष्यमित्र मन ही मन आशंकित थे। वे माथुरों के कृपा पात्र शिष्य थे। गुरु भाई होने के नाते माथुर मुनीशों के एक अन्य शक्तिशाली शिष्य, देश के विख्यात आभीर नायक वीरसेन से उनकी घनिष्ठ मित्रता थी। वीरसेन अपने समय का महान शक्तिशाली पशुपालक था जिसका परिवार और रिश्तेदारी गंगा-यमुना के दोआव में ही नहीं देशभर में फैले थे, विशेष रूप से पंचनद प्रदेश से जगननाथपुरी तक। यहाँ के तत्कालीन राजपथों के इर्द-गिर्द सर्वत्र उसके खिरकों की कठिन श्रृंखला थी जो एक प्रकार के सेना केन्द्र और शस्त्रागार थे। वीरसेन ने गुरुजनों सेमित्र के मनकी बात कह डाली। सुप्रसिद्ध वैयाकरण आचार्य पतञ्ललि और माथुर विप्रों की मंत्रणा के उपरान्त वीरसेन और पुष्यमित्र की संयुक्त सेना ने अचानक पाटलिपुत्र घेर लिया। सम्राट को अपदस्थ कर पुष्यमित्र शुड़ को सम्राट घोषित कर दिया। महावीर वीरसेन के अनुरोध पर उसके कुलदेवता गोवर्धनधारी को (अपने घरों में सुपूजित गोपाल को) यज्ञ नारायण का स्वरूप स्वीकार कर घर की सेवा को लोक समर्पित कर दिया। बौड्ठों का दमन हुआ और वैष्णव ( भागवत धर्म) लोकधर्म के रूप में सर्वमान्य हुआ |


उपासना के नौ भेदों में श्रवण, कीर्तन, स्मरण एवं पादसेवन ये चार पहले आते हैं। तदन्तर अर्चन (मूर्तिपूजा) वंदन, दास्य, सख्य और आत्म निवेदन आते हैं। इस प्रकार मूर्ति-पूजा उपासना का सनातन माध्यम है। जैसे चक्र की नाभि में ही (पहिये के ) सब अरे लगे रहते हैं और वह एक धुरी में घूमता है उसी प्रकार ईश्वर की धुरी में घूमने वाले चक्र की नाभि मूर्ति पूजा है। यह चश्चल मन की एकाग्रता का मूलाधार है।


मूर्ति पूजा के वैदिक स्वरूप की विवेचना में (तैत्तरीय प्रपा. अनु. 5) के अनुसार 'हे महावीर तुम ईश्वर की प्रतिमा हो, (ऋग्वेद अष्टक 6, अ.5, सू.58 मंत्र 8) के अनुसार 'हे बुद्धिमान मनुष्यो उस प्रतिमा का भलीभाँति पूजन करो ', ( अथर्व 11/2/5-6) के अनुसार 'है पशुपते! आप के मुख, तीन नेत्रों, त्वचा को, रूप और अंगों को नमस्कार हैं, ( अथर्व 2/13/4) के अनुसार ' हे परमात्मन! तुम आकर इस पाषाण में विराजमान हो, यह आपका शरीर बन जाए और सब देवता सैकड़ों वर्ष पर्यन्त इसमें आप की विभूति को स्थिर करें।' इसी प्रकार ( अथर्व 5/60/12) के अनुसार ' इस प्रतिमा में प्राग-मन-नेत्र और बल आयें।' पुनश्च ( अथर्व 16/2/6) के अनुसार 'हे प्रतिमा! तू ऋषियों का पाषाण है। इस दिव्य पाषाण को नमस्कार है।' भगवती श्रुति माता के अतिरिक्त उपनिषदों एवं ब्राह्मण ग्रन्थों में इस सन्दर्भ-प्रसंग में अनेकानेक सूत्र उपलब्ध है।


जैसा कि पहले कहा, हमारे यहाँ अनादिकाल से प्रतिमा पूजन की परम्परा रही है। बालक ध्रुव ने देवर्षि नारद के उपदेश से प्रतिमा पूजन कर मधुवन में भगवान का दर्शन प्राप्त किया था। भगवान श्रीराम ने 'रामेश्वर' की स्थापना की जो अध्यावधि वर्तमान है। शिवोपासक रावण यात्रा में भी भगवान शिव की सुवर्णमयी प्रतिमा साथ रखता था। दोनों ब!तों का आदि कवि ने अपनी रामायण में उल्लेख किया है।


        महाभारत के आदि पर्व (133) में वर्णित एकलव्य की कथा विख्यात है जिसने गुरु द्रोणाचार्य की माटी की प्रतिमा बनाकर गुरु भाव से पूजा की और बाण-विद्या में इतनी निपुणता प्राप्त की कि धनुर्धर अर्जुन तक आश्चर्यचकित हो गया। यह जड़ वस्तु के आश्रय से चेतन की उपासना है, ' भूपादी यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्रसूर्यो च नेत्रे' के अनुसार (हम) मूर्ति में समस्त ब्रह्माण्ड के दर्शन करते हैं और ब्रह्माण्ड व्यापक चेतन प्रभु की बाँकी झाँकी का अवलोकन करते हैं।


        मन को स्थिर करने का प्रधान साधन मूर्ति पूजा है। महाकवि सूरदास ने कहा है -

        अवगति गति कछ कहत न आवै।

        ज्यों गुँगहि मीठे फल को रस अंतरगति ही भावै ॥

        परम स्वाद सबही जु निरंतर अमित तोष उपजावै ।

        रूप-रेख-गुन-जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धाबे ।

        सबविधि अगम बिचारहि ता ते 'सूर 'सगुन लीला पद गाबै ।


        साधक का सौन्दर्याभिलाषी मन भुवन मोहन भगवान की रुप माधुरी का सुधापान कर स्थिर-एकाग्र चित्त हो जाता है। ध्यानावस्थित होकर वह उपासना की ओर अग्रसर हो यह परम स्वाभाविक है। मन 'सुन्दरता कहूँ सुन्दर' करने वाली छवि सुधासागर कौ तरंग से तरंगायिक हो उठता है। योग दर्शन के अनुसार मन को निर्विषय बनाना ही ध्यान है। यथाभिमतध्यानाद्वा (योगदर्शन) जिसको जो अभिभत हो उसका ध्यान करने से मन शांत हो जाता है। अत: मन को स्थिर करने के लिए भौतिक साधन को प्रतीक बनाने की आवश्यकता होती है। क्योंकि ' अव्यक्ता हि गतिर्दु:खम' (गीता)। यहाँ सूर्योपासकों की प्रतीकात्मकता द्रष्टव्य है-


        ध्येय: सदा सवितमण्डल मध्यवर्ती ।

        नारायण सरसिजासन सन्निविष्ट: ॥


        साधक को इसी प्रतीक में 'बयं तु ताप संतप्ता नीराकार मुपास्महे' रूप में भगवान की उपालना करमी चाहिए। इसी प्रकार ' आचार्यो ब्रह्मणो मूर्ति: पिता मूर्ति : प्रजापते:' न्यायेन गुरु-माता पिता को भी परमात्मा का प्रतीक मानकर उपासना की जाती है। यह प्रतिमा पूजन ही है। शास्त्रकारों ने शैली , दारुमयी , लौही, लेखा, लेप्या, सैकती , मनोमयी और मणिमयी नामक मूर्तियों में पाषाणमयी प्रतिमा को प्रशस्त माना है क्योंकि यह सर्वत्र सर्व सुलभ है।


        शास्त्र ने इस विषय में साधक को स्वतंत्रता प्रदान की है कि चाहे 'दोर्भ्याँ दोर्भ्या ब्रजन्तम ' चाहे ' अड्रनामड्रनामन्तरे माधव: ' को अथवा 'करधृतराधापयोधर : पातु ' को चाहे ' मलल्‍लानाम्‌शनि:' को और चाहे 'धृत रथ चरण; श्रमवार्यलंकृताश्च' की पूजा की जा सकती है। इसीलिए महर्षि ने स्पष्ट निदेश दिया है कि साधक 'यथाभिमत ' का ध्यान करने को स्वतंत्र है।


        शास्त्रोक्त विधि के अनुसार यथोक्‍त दिशा में मुख करके 'समकांय शिणोग्रीवम्‌, यथोक्‍त माला लेकर इष्ट प्रतिमा के सानिध्य में गुरुपदिष्ट मंत्र का अर्थ चिन्तनपूर्वक जाप करे। देव विग्रह का ज्यों का त्यों हृदय प्रदेश के भ्रू मध्य प्रदेश में ध्यान से देखने का प्रयत्न करे। नेत्र बन्द होने पर भी इस दिव्य स्वरुप का दर्शन होगा। अभ्यास और विरक्ति इसके साधन हैं जो गुरु गम्य विद्या हैं। तब चित्र-प्रतिमा-प्रतीक भावना विलुप्त होकर इष्टदेव का ताद्रश दर्शन प्राप्त होगा। कालान्तर में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इष्टदेव का विराट रुप दौीखने लगेगा। 'सियाराम मय सब जग जानी। करहूँ प्रनाम जोरि जुग पानी।' यह एक मनोवैज्ञानिक-आध्यात्मिक अनुष्ठान है। इत्यलम्‌।

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