'माथुरी संस्कति' के वृत-पर्वोत्तव-विहंगावलोकन

हमारे यहाँ एक कहावत प्रचलित है, 'सात वार और नौ त्यौहार ।' वीरेन्द्र मिश्र का एक गीत इसे ही यों कहता है:

त्यौहारों को धूम दीवाली के दीये, होली के रंगों बिन कोई क्यास जीये?

यह सब मेरी दुनियाँ की आवाज है, इस पर ही तो होता मुझको नाज है।

लो फिर गाता हूँ, कोई अधंकार की चादर मेरी ओर बढ़ाये नां !

पेरा देश है ये, इससे प्यार मुझको ॥


गीत में देश की उत्सव प्रियता के प्रति व्यक्त भावना मुझे मथुरा "ब्रज गण्डल' और समाज की बाबत भी बेहद मौजूँ लगती है। स्वयं के माध्यम से स्वजाति और संसार गंगल को शुभकामना के सद्‌ प्रयास के साथ-साथ लोकवार्ता की वाचिक परम्परा के अनेक मुृद् गुह्य सूत्र हमारे इन व्रत पर्वोत्सवों के मूल में विलुप्त प्राय से सुस॒ुप्त हैं। महिलाओं के लिए ये गृह सूत्र जागरण के मंगल गीत जैसे हैं। हर ब्रत-पर्व और उत्सव का अपना कथा साहित्य है। में आगे इनकी संक्षिप्त चर्चा का प्रयास कर रही हँ। यज्ञोपवीत-बियाह आदि मांगलिक संस्कारों के अतिरिक्त इन अनुष्ठानों में ही हमारी सामूहिक चेतना एवं निष्ठा का लोक मन परिलक्षित होता है। प्रतिपदा चैत्र शु. पक्ष नया संबत (संवत्सर) भारतीय काल गणना पद्धति के अनुसार हमारा कालदर्शक पंचाग चैत्र शु. प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है। यह शुभ दिवस नवसंवत्सर है, साल का पहला दिन। यह हमारे पर्वोत्सव महल का प्रवेश द्वार है। इसी दिन वासंतिक नवरात्रि की घट स्थापना पूर्वक नव दुर्गा की उपासना प्रारम्भ होती है, जौ बोये जाते हैं। दुर्गा सप्तसती का पाठ प्रारम्भ होता है। इस दिन के महत्व के विषय में पुराण इतिहास और लोक साहित्य में अनेक प्रमाणिक कथायें प्रचलित है। यह विक्रम संवत का शुभारम्भ भी है। मथुरा में इस दिन बगीची अखाड़ों देवालयों में फूल डोल उत्सव मनाया जाता है। कोतवाली से सौंख अड्डे तक मेला लगता है। इसी दिन नवरात्रि ब्रत शुरू होता है।


चैत्र शु0 तीज सौभाग्यदायक व्रत। गणगौर। बेसन के मीठे-नमकीन गुना छिड़के जाते हैं। शाम को सेठ हवेली में गणगौर दर्शन होता है।

श्री यमुना छठ - ये यमुना जी का जन्मोत्सव है। यमुना पुत्र चतुर्वेदियों में इस उत्सव का विशेष महत्व है। विश्राम घाट पर मध्यान्ह में पंचामृत अभिषेक और सांय को फूल बँगला सजाया जाता है। घाट किनारे के सभी मंदिरों में इसी दिन फूल डोल होता है और मेला लगता है। परिषद द्वारा यमुना जी की शोभा यात्रा निकाली जाती है|

चैत्र सुदी अष्टमी-देवी अष्टमी, (दुर्गा अष्टमी) जनपद के सभी देवी मंदिरों पर दुर्गा पूजा होती है। फूल डोल होता है, कन्या लाँगुरा जिमाये जाते हैं। इसी दिन या नवमी को दुर्गा सप्तसती पाठ एवं नवरात्र ब्रत का समापन होता है।

रामनवमी - भगवान श्रीराम का जन्म दिवस, महामहोत्सव एवं ब्रत। मथुरा में घीया मंडी मंदिर से शोभा यात्रा और छत्ता बाजार रामजी द्वारा मंदिर में मेला लगता है। शाम को फूल बँगला का दर्शन होता है। कहा जाता है कि यहीं भगवान कृष्ण ने गो. तुलसीदास को रामरूप में दर्शन दिया था।

चैत्र पूर्णिमा - पूनों व्रत, सत्यनारायण व्रत कथा के मासिक अनष्ठान की प्रथम पूर्णिमा, श्री हनुमान जयंती उत्सव। कहते हैं रास पूनों (कार्तिक की पूनो ) से प्रारम्भ छह महीने को रात्रि का, रास का यह समापन है महारास की रात्रि। इसे चैती पूनों कहते हैं। यही कन्दर्प विजय का दिन है जब रमणरेती में भगवान कष्ण ने काम देव को जीता था।

वैसाख - वैसाख स्नान चैती पूनों से वैसाख पूनों तक । शीतला अष्टमी, बसौड़ा, फाल्गुन कृष्णा पंचमी को बसोड़ा न हो सका तो इस दिन किया जाता है। यह चेचक प्रकोप से बालकों की रक्षा करता है ऐसी मान्यता है। वरूथनी एकादशी - वैसाख वदी का एकादशी ब्रत सुख सौभाग्य का फलदायक है।

अक्षय तृतीया - बोलचाल की भाषा में इसे अखे तीज कहते हैं। इस दिन पुण्य कार्य अक्षय होता है। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भाव से शीतल जल-पात्र, ऋतु फल, सतुआ, पंखा दक्षिणा सहित दान किया जाता है। इसी दिन त्रेता युग का आरम्भ हुआ. था। परशुराम जयंती होने के कारण विप्र वर्ग में धूम-धाम से मनाया जाता है। बद्रीनाथ के कपाट खुलते है।

गंगा सप्तमी - माँ गंगा की पूजा एवं ब्रत। धर्मार्थ प्याऊ पर घड़ा व सतुआ दान किया जाता है।

नृसिंह जयंती ब्रत - नृसिंह जयंती ब्रत - भक्त प्रहलाद की रक्षा हेतु खम्बा फाड़ कर अवतार लिया था । शाम को चोंबच्चा, क्‌आँ गली, मानिक चौक, सतघड़ा में ' चेहरा मोहरा नाम से ' नृसिंह जी का दर्शन होता है। द्वारकाधीश में शयन के समय नृसिंह लीला का प्रदर्शन। अन्य स्थानों पर रात्रि में वाराह लीला और सुबह में नृसिंह लीला यह प्राचीन काल से चला आ रहा नृत्य नाटक है जो आज भी दर्शनीय होता है।

वैसाखी पूर्णिमा - इसे सत्य विनायक पूर्णिमा भी कहते हैं। बैसाख स्नान का समापन। इस ब्रत ने सुदामा का दरिद्र हरण किया था।

अमावस्या - वट मावस ' वट सावित्री ब्रत एवं पूजन। सत्यवान सावित्री व यमराज के निमित्त बरगद तले पूजा की जाती है। अखण्ड सौभाग्य की कामना से सौभाग्यवती यह पूजा एवं ब्रत करती है।

गंगा दशहरा - गंगावतरण का दिन, गंगा-यमुना स्नान का महात्म दस पाप नाशक , अनेक स्थानों पर सर्बत की प्याऊ लगती हैं, पतंगे उड़ती हैं और दंगल होता है। खरबूजा, तरबूज, चीनी दान करते हैं ।

निर्जला एकादशी - भीमसेनी एकादशी भी कहते है। वेद व्यास जी की आज्ञा से भीमसेन ने यह व्रत किया था। दीर्घ आयु, यश एवं मोक्षदाता यह व्रत चौबीस एकादशी का फल देनेवाला है। द्वादश अक्षर मंत्र जाप, गो, स्वर्ण, वस्त्र, छत्र एवंफलदान का महाफल है ।

आषाढ़ - शु. प्रतिपदा श्री जगन्नाथ रथ यात्रा महोत्सव घरों और सभी मंदिरों में मनाया जाता है। आम का व मिठाई का प्रसाद भीगी मूंग की दाल के साथ चढ़ाया जाता है।

भडरिया नवमी - आठ महीने के सहालग का आखिरी दिन | यह बिना सुधा विवाह मुहूर्त है।

देवशयनी एकादशी- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन से देवोत्थान एकादशी तक अनन्त शैया पर हरि शयन। चातुरमास। महिलाओं द्वारा विभिन्नप व्रत अनुष्ठानों का शुभारम्भ। तारायण, पारायण, इकैत, अनेक प्रिय वस्तुओं का चार महीने को परित्याग और दान। शुभ कार्य निषेध। समस्तदेव गण ब्रज में निवास करते हैं। अत ब्रज यात्रा का महत्व, मथुरा एवं तीन वन परिक्रमा की प्राचीन परम्परा।

अषाढ़ी पूनों - गुरू पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा, गुरू पूजा पर्व । नागटीला, आकाशवाणी के निकट ' सुलखन आदि स्थानों पर पूर्वज पूजन, अषाढ़ी का दगंल होता है। चातुरमास ब्रत पव त्यौहार शुभारम्भ ।

श्रावण - ब्रज मण्डल के मंदिरों में झूलनोत्सव ' हिडोला ' प्रारम्भ। द्वारका धीश में सोने चांदी के हिडोले का दर्शन। विभिन्नस रंगों की घटा एवं फूल बंगला बनाये जाते है। यह उत्सव ब्रज मण्डल के सभी मंदिरों में मनाया जाता है।              महीने के सभी सोमवार को शिवजी का ब्रत एवं पूजन, गणेश जी शिव पार्वती नंदीस्त्रर को पूजा, जल, दूध, दही घी, चीनी, शहद, रोली-चंदन, बेलपत्र, भांग-धतूरा, धृष, दीप, फल व दक्षिणा सहित की जाती है। सोलह सोमवार ब्रत की कथा सुनी जाती है।

मंगला गौरी - बहर मंगलवार को ब्रत एवं मंगला गौरी की पूजा होती है। यह ब्रत कुवारी कन्याओं को श्रेष्ठ वर प्रदान करता है।

हरियाली तीज - महिलायें नवीन वस्त्र पहनती है, मेंहदी लगाती हैं, लड़कियों को फल मिठाई सिदारे ' सिन्दोरा ' देते हैं। महिलाओं के अनेक सांस्कृतिक आयोजन होते हैं ।

नाग पंचमी - नाग पूजा की जाती है। कारे नाग तिवारियो में दीवार पर नाग बनाकर पूजा करते हैं। दूध घर की सामग्री का सेवन। सर्पों की 'बिल' पर भी दूध फल चढ़ाते हैं। इसे बारी पाँचे भी कहते हैं। इस दिन लड़कियाँ गुड़ियों का विसर्जन करती हैं ।

रक्षा बंधन - श्रावणी पूर्णिमा इसे ही सनूनो या रक्षा बंधन की पर्णिमा कहते हैं : चतुर्वेदी ब्राह्मणों की श्रावणी उपाकर्म दिवस। बहनें भाई के माथे पर तिलक लगाकर गम्द्ी बाँधती है। राजा बलि को महालक्ष्मी द्वारा राखी बाँधकर विष्णु भगवान को मुक्त करने की कथा। द्रौपदी द्वारा अपना आचल फाड़ कर पट्टी बाँधने और ऋणी कृष्ण द्वार दुशासन प्रसंग में चीर बढ़ाने की कथा प्रचलित है। वृन्दावन के रंग मंदिर की पुस्करणी में गज-ग्राह लड़ाई की लीला होती है।

भाद्रपद - ' भादों ' वदी तीज या वृढी तीज कहलाती है। इस ब्रत में गो पूजन होता है । सात आटे की लोई बनाकर गऊ माता को खिलाते है। बहुऐं सास को चीनी या मिठाई और रूपया छिड़क कर देती हैं।

बहुला चौथ - पुत्रवती स्त्रियाँ बछड़े वाली गाय का पूजन एवं व्रत करती हैं। बहुला गऊ की कहानी सुनी जाती है। आज स्त्रियाँ चाकू से कोई फल या सब्जी नहीं काटती । सत नजा दान किया जाता है।

हरि छठ - हलधर षष्ठी भी कहते हैं। बलराम जी का जन्म दिवस। पुत्रवती स्त्रियाँ ही यह व्रत करती हैं। अन्न नहीं खाती। कोदों समा आदि की खीर का प्रयोग होता है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी - ब्रज मण्डल का विशिष्ट पर्व महान उत्सव। रात्रि 12 बाद प्रसाद गृहण करते हैं। जन्मस्थान व द्वारकाधीश में विशेष दर्शन। श्री गोपाल मंदिर में महाआरती एवं वृहद भण्डारा।

नंद महोत्सव - नंद के आनंद भये जय कन्हैया लाल की। मंदिरों में दधिकाँदा दर्शन । पालने में बालकृष्ण। भक्तों पर हल्दी मिश्रित दही छिड़का जाता है। गोपाल मंदिर में महिलाओं को भण्डारे का प्रसाद वितरण। इसे गूँगा नवमी भी कहते हैं। वृन्दावन के रंग मंदिर में लट॒ठा का मेला होता है।

अमावस्या - सती पूजा को प्राचीन परम्परा। सुलखन पर सती माँ को हरा नारियल और बर्फी का प्रसाद चढ़ाते हैं, जिसे बहन भांजे लेते हैं ।

हरितालिका तीज -सौभाग्यवती स्त्रियाँ सुहाग भाग हेतु यह निर्जल ब्रतकरती हैं। शिव पार्वती पूजा, रात्रि जागरण, भोर में स्नान कर अर्घ्य दिया जाता है। जो आगे लिपिबद्ध है। यह अखण्ड सौभाग्यदाता ब्रत के रूप में विख्यात हैं।

गणेश चौथ - मोदक प्रसाद के साथ गणेश जी का षोडसो प्रचार पूजन, 21 दुर्वाकुर चढ़ाकर कहें - गणाधिप गौरी सुवन , अधनासक एक दंत। ईस पुत्र सर्वसिद्धि प्रद: विनायक भगवंत। कुमार गुरु वकत्राय मूषक वाहन संत । करहुकृपा मोपे वरद श्री गणेश वर दंत ॥  शिवा, शान्ता और सुखा तीन प्रसिद्ध चौथ में से एक । यह ब्रत सकल कामना सिद्ध करता है।

ऋषि पंचमी -भादों सुदी पंचमी - चतुर्वेद समाज को महिलाओं में इस व्रत को वैसी ही मान्यता प्राप्त है जैसी पुरूषों में श्रवणी की। ओंघा की दातुन प्रयोग की जाती है। स्नान के उपरांत आँगन में गोबर से लीपकर आठगाँठ का स्वस्तिक बनाकर अरून्धती सति सहित सप्तऋषियों की पूजा होती है। सायं सप्तऋषी मंदिर पर दर्शन होता है। प्रसाद में अन्न के स्थान पर कोदों-समा का प्रयोग होता है।

भादों वदी अष्टमी -राधाष्टमी - श्रीराधा जी का जन्मदितस। रावल अरसाना में मेला जैसा उत्सव। व॒न्दावन में भी श्री टटिया स्थान पर उत्सव। इसी दिन सहालभमी बरस आरम्भ। यह सोलह दिन तक चलता है।

भादों सुदी द्वादशी -वामन द्वादशी - वामन अवतार के स्वरूप को पूजा। इसे औक द्वादशी भी कहते है। यह व्रत समृद्धि दाता है।

भादों की चौदश -अनन्त चतुर्दशी - क्षीर सागर में शेषशायी विष्णु भगवान को पृजा होती है। कृष्णरूप विष्णु और काल रूप शेष नाग की संयुक्त पूजा। अनन्त चौदश की कथा सुनी जाती है, दाहिने हाथ में हरे रंग का सूती अनन्त धारण करते है अलोना मधुर भोजन किया जाता है।

भाद्रपद्र पूर्णिमा - आज से पितृ पक्ष माना जाता है। पूर्णिमा क्षाद्ध आज ही होते है। आज से पितर मावस्या तक कुँआरी लड़कियाँ दीवार पर गोबर से सांझी बनाती है। (संझा , आरती व साझी कोट संलग्न रेखा चित्रों में देखें । )

क्वार - कृष्णपक्ष पितृपक्ष कहलाता है। विशेष यह कि हमारे समाज में मृतक का श्राद्ध मृत्यु तिथि के दिन तो होता ही है, पितरों के पक्ष में उसी दिन श्रद्धापूर्वक उनका श्राद्ध किया जाता है।

क्वार कृष्णा नवमी - मातृ नवमी - दिवंगता माता व सास की आत्म शांति के लिये विशेष श्राद्ध व दान। वास्तव में शास्त्र में इसी दिन माँ के श्राद्ध का विधान है। पुत्रवती स्त्री. को भोजन कराना पुण्यप्रद कहा है।

क्वार कृष्णा एकादशी - इन्द्रिरा एकादशी - व्रत के साथ सालिग्राम व तुलसी पूजा | यह व्रत पितरों का उद्धार करता है।

क्वार कृष्णा अमावस्या - पितृ विसर्जन अमावस्या - पितृ पक्ष का अन्तिम दिन। शाम को पूड़ी पकवान खाद्य पदार्थ दरवाजे पर रखकर दीपक जलाया जाता है। ताकि पितर तृप्त होकर जायें। दीपक उनका मार्ग आलोकित करें। चार कचौड़ी ऊपर बड़ा, जाओं पितर देव अपने घरा ।

क्वार शुक्ला प्रतिपदा - शारदीय नवरात्रि प्रारम्भ - घट स्थापन, स्त्रियों का गौर एजन। रामलीला महोत्सव प्रारम्भ। इन दिनों कुल देवी की पूजा की जाती है।

क्वार शुक्ला अष्टमी - दुर्गा अष्टमी - भगवती दुर्गा की पूजा, उबले चने, पूडी हलुआ का प्रसाद लगाकर कन्या लाँगुरा जिमाये जाते हैं। आज ही पाठ का हवन होता है।

क्वार शुदी नवमी - घट विसर्जन - सिद्धिदात्री पूजा। टैसू झांझी खेल आज से ही शुरू होता है।

क्वार शुदी दशमी - विजया दशमी - इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण वध कर लंका युद्ध में विजय प्राप्त की थी। महाविद्या देवी का दर्शन और मैदान की रामलीला, मैदान का रावण दहन और आतिशबाजी के साथ समापन। तारा उदय होने से यह विजयकाल होता है।

क्वार शुदी एकादशी - भरत मिलाप एकादशी - चौक बाजार में भरत मिलाप का मेला । एकादशी ब्रत।

क्वार शुक्ला पूर्णिमा - शरद पूर्णिमा - इदली पूनों। कोजागरी ब्रत। इसे कौमुदी ब्रतोत्सव भी कहते हैं। भाई के हितार्थ बहन द्वारा ब्रत। स्त्रीयों द्वारा मायके में चद्रमा को अध्यंदान वहीं रबड़ी के साथ सुरचि प्रसाद पाते हैं। रासोत्सव की शरद रात्रि में शशी किरणों से अमृत वर्षा होती है। घी, मेवा और मिश्री चूर्ण को अनुपात में मिलाकर शरद नामक पौष्टिक पाक चाँदनी में जमाया जाता है। चाँदनी में सुई पिरोने से नेत्र ज्योति बढ़ती ठे। टेसू झाँझी विवाह खेल का समापन।

कार्तिक स्नान - कार्तिक कृष्णा प्रतिपदा से प्रारम्भ - विश्राम घाट पर स्नान का विशेष फल। आज से ही भोर के आव्हान जैसा महिलाओं का मंगल अनुष्ठान सुबह से प्रारम्भ। राधा दामोदर। इसका समापन कार्तिक पूर्णिमा (रासपूर्णिमा) के दिन स॒पात्र पति-पत्नि को भोजन वस्त्रादि प्रदान कर होता है। जिसे राधा दामोदर जिमाना कहते हैं ।

कार्तिक कृष्णा चतुर्थी - करवा चौथ - समाज में सुहागिनी स्त्रियों का प्रमुख त्यौहार माना जाता है। दीवार पर भित्त चित्र बनाकर निर्जल ब्रत किया जाता है। रात शिव, पार्वती, चन्द्रमा, गणेश जी, कार्तिकेय एवं सुहाग की वस्तुओं की पूजा की जाती है। अर्घ्य व मिट्टी चीनी के करूये दान किये जाते है। कहानी सुनकर प्रसाद पाते है।

कार्तिक कृष्णा अष्टमी - अहोई अष्टमी - पुत्रवती स्त्री पुत्र की मंगल कामना में ब्रत करती हैं। झकरी (मिट्टी का जलपात्र ) भरकर रखा जाता है। सेही सहित अहोई देवी की चित्र पूजा होती है। (चित्र संलग्न है।) मिठाई (पूआ) का प्रसाद चढ़ाते हैं। इन्हें ही दान ऊरते हैं, कथा सुनते है तब प्रसाद पाते है। गोवर्धन में (राधाकुण्ड में) आधीरात को स्नान का विधान है। मान्यता है यह स्नान व गुप्तदान सन्तान दाता है।

कार्तिक कृष्णा तयोदशी - धनतेरश - घन्वंतरि जयन्ती। इस दिन घर में लक्ष्मीका आवास मानते हैं। आयुर्वेद के प्रवर्तक धन्वंतरि समुद्र से आज अमृत कलश लेकर प्रकट हुये थे। सोना, चांदी, धातु के नये बर्तन घर लाने की प्रथा। घर की साफ सफाई रँगाई पुताई समाप्त। महालक्ष्मी पूजा की पूर्व पीठिका। यमराज के नाम का दिया निकाला जाता है और पूजा होती है।

कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी - रूप चौदस - इसे नरक चतुर्दशी भी कहते है। बालकों का शिरीष से आझा झारा उतारते हैं। यमराज एवं शिव मंदिर पर दीपदान। भगवान ने आज के ही दिन नरकासुर का संहार किया था। रात्रि में सौन्दर्य स्वरूप श्रीकृष्ण की पूजा।

कार्तिक कृष्णा अमावस्या - दीपावली - प्रमुख पर्व एवं त्यौहार। श्री गणेश महालक्ष्मी पूजा। दीपदान का महात्म महोत्सव के विषय में अनेक लोक कथा ।

कार्तिक शुक्ला प्रतिपदा - गोवर्धन पूजा - अन्नकूट - इसी दिन बलि पूजा तथा गोवर्धन पूजा उत्सव मनाया जाता है। गोबर से गोवर्धन बनाकर इसकी नाभि में कच्चा दूध भरकर पूजा करते हैं। मूँगचावल कढ़ी और मिष्ठान का प्रसाद लगाया जाता है। मंदिरों में अन्नकूट के दर्शन होते है।

कार्तिक शुक्ला पंचमी - गोकुल दाऊजी व॒न्दावन की परिक्रमा ।

कार्तिक शुक्ला षष्ठी - सूर्य षष्ठी - सूर्य देव की पूजा का विशेष महत्व। बिहार झारखण्ड में खास तौर से मान्यता। समृद्धि संतान और सुख संतोष देने वाला ब्रत ।

कार्तिक शुक्ला सप्तमी - संतान सप्तमी - सतोहा में संतान गोपाल मंदिर पर कुण्ड में स्नान और दर्शन, मेला लगता है।

कार्तिक शुक्ला अष्टमी - गोपाष्टमी - गौ पूजा दिवस। मथुरा में गौ चारण लीला को शोभा यात्रा छत्ता बाजार से गोपाल बाग वहाँ से लौट कर छत्ता बाजार में बड़े चौबे जी के रे आरती होती है। सुबह विश्राम घाट पर परिषद के तत्वावधान में गौचारण व रासलीला का आयोजन ।

कार्तिक शुक्ला नवमी - - अक्षय नवमी - आवला नवमी - सतयुग के शुभारम्भ का शुभ दिन। आवला वृक्ष का पूजन, मथुरा की पंचकोषीय परिक्रमा एवं मेला। आज का धर्म काज दान आदि अक्षय पुण्यप्रद होता है।

कार्तिक शुक्ला दशमी - कंस वध मेला विजयोत्सव - साय॑ भगवान की शोभा यात्रा कस वध के उपरान्त विश्राम घाट पर कृष्ण बलराम स्वरूपों की आरती। समाज का विशिष्ट उत्सव आयोजन। आज लाठियों का विशेष प्रदर्शन । समाज का बालक बालक सज धज कर शोभा यात्रा में शामिल होता है। परिषद द्वारा विशाल स्तर पर सजावट एवं जत्सव का आयोजन ।

कार्तिक शुक्ला एकादशी - देवोत्थान एकादशी - शुभ कार्य शुभारम्भ एकादशी ब्रत। श्रीकृष्ण द्वारा आज के दिन शंखासुर वध हुआ था। तुलसी सालिग्रराम विवाह होता है। आज ही तीन वन की पुण्यप्रद परिक्रमा ।

कार्तिक पूर्णिमा - रासपूनो - तृपरी पूनो भी कहते है। कार्तिक स्नान, राधा दामोदर आदि नियमों का समापन। मत्स्यावतार दिवस। पुण्य दिवस भीष्म पंचम, पंच श्रीकम का समाएन। मथुरा में धर्म अर्थ काम मोक्ष दाता व्रत का विशेष महात्तम।

मार्गशीर्ष - (अगहन) - कृष्णा एकादशी - उत्पन्ना एकादशी इस ब्रत में केवल फलों का भोग लगाया जाता है। गीता पाठ का महात्तम ।

अगहन शुक्ला पूर्णिमा - गद्दल पूनों - दाऊजी पर गद्दल चढ़ाया जाता है व जन्मोत्सव मनाया जाता है। भांग एवं माखन मिश्री का भोग। दाऊजी में मेला।

पौष क्र. सफला एकादशी - भगवान अच्युत की पूजा होती है। इस व्रत से समस्त कार्यो में सफलता मिलती है।

पौष शुक्ला एकादशी -(पुत्रदा एकादशी) व्रत - विष्णु भगवान का पूजन। यह ब्रत संतान प्राप्ति का साधन है।

माघ पूर्णिमा - माघ स्नान प्रारम्भ। केशवदेव,दुर्वाषा व गरूड़ गोविन्द मेला ।

माघ कृष्ण चतुर्थी - सकट चौथ - संकष्टी चतुर्थीत्रत - चन्द्र दर्शन एवं अर्ध्य, गणेश जी की कथा सुनी जाती है। तिल से बने मोदकों का प्रसाद लगाया जाता है। गणेश टीला (जयसिंहपुरा) में वृहद महोत्सव ।

माघ कृष्णा अमावस्या - (मौनी मावस) - महर्षि मनु का जन्मदिन। मौन ब्रत एवं गुप्तदान का महात्तम ।

माघ शुक्ला पंचमी - ( श्री पंचमी ) व बसंत पंचमी । ऋतुराज बंसत के आगमन को सूचना। भगवान विष्णु एवं महा सरस्वती पूजा। सरसों के फूल चढ़ाये जाते हैं। होली का डांडा रोपण। ब्रज मण्डल में फाग महोत्सव प्रारम्भ। दुर्वाषा केशव देव पर मेला। शाहजी मंदिर वृन्दावन में बसंती कमरे का दर्शन। गोपाल मंदिर में धमार उत्सव प्रारम्भ होता है।

फागुन कृष्णा चतुर्दशी - महाशिवरात्रि ब्रत - सभी शिव मंदिरों में उत्सव , जागरण, चार फ्रहर को चार शिव आरती । शिव चरित्र का मंचन होता है।

फागुन शुक्ला द्वितीया - (फुलैरा दौज) - विशेष सहालग। फुलैरा चौक बनाकर पूजा की जाती है। (चित्र संलग्न)

फागुन शुक्ला अष्टमी - होलिकाष्टक प्रारम्भ - मंदिरों में अबीर गुलाल के साथ गीले रंगों की शुरूआत। शुभ कार्य विवाह आदि निषेध ।

फागुन शुक्ला एकादशी - (आमल की) - रंग भरनी एकादशी - आवला वृक्ष में शगतान्‌ का निवास मानकर पूजा का विधान। मंदिरों में कुज महोत्सव ।

फागुन शुक्ला पूर्णिमा - होलिका पर्व महोत्सव - चौराहों पर होली की पूजा व दहन, पूर्णिमा ब्रत, होली पर बूट बाल चढ़ाये जाते हैं। चौपाई समारोह का शुभ आरम्भ ।

चैत्र कृष्णा प्रतिपदा - धूलि वंदन - दुल्हैणी पड़वा, भोर में होली की भस्म मॉथे पर लगाते है। सभी परिचितजन परस्पर गले मिलते हैं। सामाजिक सद्भाव का प्रदर्शन-फाग महोत्सव-चौपाई गायन का प्रारम्भ-नवजात शिशु को अखाड़ों की चौपाई में नचवा कर आशीर्वाद लिया जाता है।

चैत्र कष्णा दौज - - नई चौपाई का दिन - बहिनें गोबर की उलटी पुतली बनाकर भाई की मंगल कामना में उसे मूसर से कूटती है।

चैत्र कृष्ण अष्टमी - शीतला अष्टमी - शीतला माता की पूजा व बसोड़ा । यह कोई पत्रा, पचांग या ब्रत पर्वोत्सव दीपिका नहीं। वृद्ध, महिलाओं से साक्षात्कार के आधार पर अपने तीज त्यौहारों पर एक विहंगम दृष्टिपात भर है जो अपने अनेक संकेतों, अन्तर्कथाओं और वाचिक परम्परा के महत्वपूर्ण सूत्रों की ओर इंगित करता है, आगे व्यापक निजुचन हेतु ट्रेक भी प्रस्तुतकरता है।

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कार्तिक पूजा (“भोर के आवाहन” जैसा धार्मिक अनुष्ठान “राधा-दामोदर” माथुरी महिला संस्कृति की वाचिक परम्परा का अमूल्य रत है। कार्तिक के महीने में अल-सुबह, पुण्यप्रद नदी तट, मंदिर प्रांगण या स्वकीय आवास पर