माथुरी संस्कृति का दिशा बोध

हमारे समाज में स्त्री-पुरूष सभी दिशा-विवेक के विषय में प्राचीन काल से ही विज्ञ और व्यवहारशील रहे हैं। वेदों के महत्वपूर्ण आदेश-निर्देशों का जीवन-शैली में सनातन समावेश है। प्राची के मुख की अरूण ज्योति के हम ही सर्वप्रथम दर्शन करते है। हमारा देश अरूणोदय का देश है फलत: हमारी संस्कृति की, आचार-विचार-आहार-विहार की , हमारी जीवन शैली की मूल द्रष्टि पूर्वाभिमुख है। इसीलिए हम प्रात: संध्या पूर्व की ओर मुख (सूर्य की ओर मुख) करते हैं। सांय कालीन संध्या पश्चिम मुख करते हैं क्योंकि भास्कर देव तब पश्चिम में होते हैं। सभी देव कर्म पूर्वाभिमुख, ऋषि कर्म उत्तर मुख और पितृ कर्म दक्षिण मुख पूर्वक करने चाहिए ।


पूर्व दिशा के अधिपति अग्निदेव, दक्षिण के इन्द्र, पश्चिम के वरूण और उत्तर के सोम हैं। पूर्व दिशा देवताओं की, दक्षिण पितरों की है। धर्म एवं शास्त्रों का दिशा-विवेचन परम वैज्ञानिक है। पठन-पाठन, लेखन, स्वाध्याय, जप-तप-योग आदि (ऋषि कर्मों) में उत्तर मुख होने से यह हमें नगाधिराज हिमालय और इसकी देव संस्कृति की दिव्यता से वैज्ञानिक रूप में मन-मस्तिष्क सहित सम्बद्ध करता है, जहाँ से हमारी जीवन रेखा-संस्कृति मूल पवित्र नदियाँ हमारी जिंदगी में उतरती हैं। हमारी सम्पूर्ण ज्ञान-राशि, हमारी चतुर्दश विद्याओं के अधिपति भगवान सदाशिव उत्तर में कैलाश पर ही विराजते हैं। मनोवैज्ञानिक रूप में हर अनुष्ठान में (दैनिक-नैमित्तिक दोनों में ) कर्त्ता के सम्मुख उच्चतम, उदात्त आदर्श उपस्थित होते हैं। समस्त विद्याओं की अधिष्ठात्री भगवती जगदम्बा का निवास भी इसी दिशा में है। अतः पठन-पाठन, स्वाध्याय एवं सृजनात्मकता के हेतु उत्तर दिशा सर्वथा अनुकूल है। यात्रा मुहूर्त में भी दिशा बोध का व्यावहारिक महत्व अपरिहार्य है यह हमें गन्तव्य दिशा अनुकूलता एवं दिशा शूल का निदेश प्रदान करता है।

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