मथुरा की पंचकोसी परिक्रिमा

मथुरा की पुण्यप्रद पंचकोसी परिक्रमा पुण्यतीर्थ विश्राम घाट से प्रारम्भ होती है। यहाँ सकल्प के उपरान्त सतीबुर्ज के निकट सिद्धपीठ चर्चिका-पिपलेश्वर महादेव, भेरवनाथ, श्रंगारघाट प्रयागघाट, श्यामघाट-रामघाट, दाऊजी घाट , दण्डी घाट होकर बंगाली घाट तिराहे पर पहुँचते हैं। तदन्तर सूरजघाट पर सूर्य भगवान और ध्रुव टीला स्थित ध्रुवघाट पर भक्त श्रुव एवं भगवान के दर्शन कर महा श्मशान के निकट प्राचीन सप्तर्षि मदिर एवं बलिटीला होकर नगर पालिका चौराहे पर श्रीराम मंदिर है जहाँ भगवान कृष्ण ने गो. तुलसीदास को रामरूप से दर्शन दिया था। यहाँ से अम्बाखार में प्रवेश कर परिक्रमा मार्ग रगभूमि (रंगेश्वर) महादेव मंदिर पहुँचता है। यहाँ से मथुरा-आगरा रोड क्रास कर डैम्पीयर नगर होकर शिवताल पहुँचते हैं। यहाँ से कंकाली देवी, जगन्नाथ बल भद्र सुभद्रा-दाऊजी आदि मंदिरों की झांकी निरखते हुए हम भूतेश्वर महादेव मंदिर होकर विश्व प्रसिद्ध श्रीकृष्ण जन्मभूमि (श्री केशव देव मंदिर) पहुँच जाते हैं। तदनन्तर कूलदेवी महाविद्या और भगवती सरस्वती के सरस्वती कुण्ड स्थित प्राचीन मंदिरों के दर्शन करते हुए ग्थुरा देहली रोड क्रास कर उमापीठ चामुण्डा मंदिर पहुँच जाते हैं। श्मशान घाट से परिक्रमा मार्ग यमुना-तट से दूर हो जाता है किन्तु चामुण्डा देवी से मथुरा-वृन्दावन रोड पर जाते ही यह पुन: यमुना के किनारे-किनारे गुजरता है जिसका अनुगमनकर हम गोकरननाथ महादेव मंदिर-चक्रतीर्थ होकर कंस किला जा निकलते हैं। यहाँ के पंचमुखी महादेव आदि _ निकटस्थ देवालयों के दर्शन करते हुए परिक्रमा मार्ग, गौघाट, कृष्ण गंगा घाट (व्यास _ तीर्थ), स्वामी घाट, संतघाट, असक्‌ ण्डा घाट, मणिकर्णिका होते हुए पुनः विश्राम घाट आ जाता है जहाँ परिक्रमा का समापन होता है।


      संकल्प पूर्ण कर यमुना पान के उपरान्त श्री द्वारकाधीश मंदिर एवं मानिक चौक स्थित श्री आदिवाराह मंदिर में दर्शन अवश्य करना चाहिए। यह प्राचीन मंदिर ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा से पूर्व हो जाने वाली अन्तःगृही परिक्रमा में भी शामिल हैं। मथुरा की पंचकोसी परिक्रमा के द्वारा सभी प्राचीन मंदिरों एवं घाटों का अवलोकन अपने आप में एक आत्मिक सुख है। महाकबि चौबे बिहारी लाल के शब्दों में -

तज तीरथ हरि राधिका तन दुति कर अनुराग।    

जेहिब्नज केलि निकुंज मग पग पग होत प्रयाग ।।


मथुरा परिक्रिमा (गीत)

तेरे मन अभिलाषा होय तौ चल परकम्मा कैरि आमें | विश्रान्त घाट पै न्हाई, छवि निरख््रि * चर्चिका माई, धर पिप्लेश्वर कौ ध्यान कि दरशन भेरव के पामें ॥तेरे मन ॥ दरसन कर सब देवन के, दाऊजी मदन मोहन के, करौ दरसन सूरज घाट, अगारी सप्त ऋषी आमें ॥तेरे मन ॥ छवि निरखौ वलि राजा की, आगें रंग भूमि की झांकी, निरमल नसवारो कूप आऔ चलौ वे जल पी आमें ॥तेरे मन॥ है कुण्ड शिव स्थल भारी, अखाड़ी पीपल वारै, श्री जगन्नाथ जगदीश ककाली भूतेश्वर ध्यावें ॥तेरे मन॥ पुन: कुण्ड पोतरा आयौ, केशव कौ दरसन पायौ, चल महाविद्या के निकट अगारी सरस्वती गामें ॥तेरे मन॥ धन धन चामुण्डा माई, गोकरन सब सुखदाई , चढ़ कंस किले के शीश कृष्ण गंगा के गुन गामें ॥तेरे मन॥ वाराह क्षेत्र महि कुण्डा, विश्रान्त घाट असकृण्डा, वाराह के दर्शन करे द्वारिकाधीश शीश नामें ॥ फिर अपने अपने घर जामें ॥ तेरे मन अभिलाषा होय ॥ (मथुरा के पाँच लोक तीर्थ-1. विश्राम घाट 2. असिक्कुंड तीर्थ 3 बैकुण्ठ तीर्थ 4. कालिंजर तीर्थ 5. चक्र तीर्थ)


मथुरा की "पञ्च कोसी पर्क्रिमा ” का महत्व (प्राच्य दृष्टि: आत्मदर्शन एवं अध्यात्म दर्शन)

( श्री मद आदि शंकराचार्य जी विरचित निर्वाषषटकम”)

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुर्न वा सप्त धातुर्न वा 'पञ्च कोश:”।


पज्चकोश शब्द से प्रभावित होकर, सोचा कि परिक्रमा भी पञ्चकोषि कहलाती है। आखिर ये पञ्च कोश क्या है ?.......... कुछ समय बाद ही, मुंबई में , श्री रणजीत उदेशीजी ( श्री बाबा सेठ) , जिन्हें मैं अपना अध्यात्म गुरु मानता हूँ उनका फोन आया, और पूछा आनंद कभी पंचकोश पर सोचा था ? मथुरा में पंचकोशी परिक्रमा और अपने शरीर में भी पंचकोश है, जैसा कि उपरोक्त श्लोक से ज्ञात होता है।


      बस फिर क्या था, वो बोले जरा सोचना और सोचना शिरू। पहले शरीर में पञजच कोश जाने गए फिर मथुरा परिक्रमा में भी पंचकोश है। शरीर के पंचकोशी का मथुरा परिक्रमा के पंचकोशों से, कुछ सम्बन्ध जरूर होगा। तो पहले शरीर में मनुष्य ५ कोश क्या है यह जाना | जिनका क्रम १. अन्न मय कोश, २. मन मय कोश, ३. ज्ञान मय कोश, ४ विज्ञान मय कोश, ५. आनन्द मय कोश (जिसमें भगवान रहते हैं)


      अब मथुरा की परिक्रमा को हमने ५ हिस्सों (५ कोश) में बांटना शिरू किया। एक-एक हिस्सा शरीर के हिस्से से जोड़ा, फिर उसका अनुभव करने के लिए परिक्रमा लगा कर महसूस किया। तो यह जो एक अनुभव और मंथन करके जो निर्णय निकला व समझा, वो आप सबके सामने रखा जा रहा है, यही उसका सही पचकोश है न कि केवल परिक्रमा के किलोमीटर या मील या कोश या दूरी या मथुरा का परकोटा और लम्बाई नहीं है, कोई नाप नह* है।


परिक्रमा शुरू करते है

१. पहला कोश परिक्रमा का और पहला कोश शरीर का “अन्न मय कोश" परिक्रमा को दूरी, “विश्राम घाट से सूरज घाट” नियम लिया-दर्शन करते हैं श्री यमुना जी, कृष्ण बल्देव जी, श्री चर्चिका देवीजी, पिपलेश्वर महादेव, भेरों बाबा (बटुक भेरव) माँ अश्वारुढ़ा जी, बैनी माधव जी, राम-स्याम-रामेश्वरम रामघाट, वक्रतुंड गणपति, दाऊजी महाराज, मदनमोहन जी, ढाल, तलवार वाले हनुमान जी, छोटे मदन मोहन जी, जगन्नाथ बिहारी जी, सूरज नारायण, सूरज घाट। यहाँ तक सब दर्शन करते हुए कथा का मनन करते हुए चल कर जाने से निश्चित ही अन्न मय कोश अर्थात “अन्न मय कोश के दोष” “दूर हो जाते हैं, जैसे शरीर में आलस्य कुपच दूर होकर स्फूर्ति आ जाती है।


२. “मन मय कोश” अब परिक्रमा की दूसरी दूरी, सूरज घाट से रंगेश्वर महादेव जी तक। इतना चलने व हर जगह की कथा मनन करने से , मन के दोष (विकार) दूर हो जाते है। दर्शन और कथा : ध्रुवजी ( छोटे से बालक भगवान को पा लेते हैं मन की धारणा प्रबल थी) , सप्त ऋषि, राजा बलि जी ( जिन्होंने सब कुछ के साथ अपना मसतक भी भगवान को अरप॑ण कर दिया, शुक्राचार्य द्वारा भी मन नहीं डोला) , मन में मोह नहीं रहे, अक्रूर जी की बगीची , रगेश्वर महादेव। यहाँ तक आने के बाद मन में शांति मिलती है अर्थात मन के दोष दर डो जाते हैं ।


३. “ज्ञान मय कोश” परिक्रमा की तीसरी दूरी। मन जब शांत हो जाता है तब ज्ञान जाग्रत होता है : कंस टीला, अभिमान रूपी कंस को भगवान्‌ ने मार दिया (राजा बलि, कंस जैसों का गरूर नहीं रहा, तो हमारा अभिमान कया ? ज्ञान होना शुरू : शिवताल, माँ कंकाली, भूत भावन भोलेनाथ, पाताली देवी...... ज्ञान लिया, आगे केशव देव, गीता का ज्ञान दिया, गीता ज्ञान के बाद ज्ञान में क्या कमी रह सकती है, लेकिन फिर भी आगे स्वयं श्री महाविद्या जी, और चाहिए तो माता सरस्वती । अब ज्ञान में कहाँ कमी रह गयी है। तो यहाँ तक “ज्ञान मय कोश” के दोष दूर हो जाते हैं। एक विमल विवेक जाग्रत होता है। यह आत्म-दर्शन ने अध्यात्म दर्शन है।


४. “विज्ञान मय कोश” परिक्रमा की चौथी दूरी । विज्ञान की परिभाषा “किसी भी ज्ञान को क्रियात्मक रूप में परिवर्तित करना विज्ञान है। यह ज्ञान योग का कर्म योग से समन्वय है। वहाँ से आगे चले तो माता श्री चामुंडा जी, योनि स्वरूप दर्शन है..... आगे माता गायत्री जी, गोकरन नाथ . वहाँ से गौ घाट, यह दूरी “विज्ञान मय कोश है, जो कि ज्ञान को क्रियात्मक रूप में परिवर्तित करता है, यहाँ तक आने पर विज्ञान मय कोश के दोष दूर हो जाते हैं। यह दर्शन शास्त्र के भौतिक स्वरूप का सूक्ष्मतम संकेत है।


५. “आनन्द मय कोश" परिक्रमा का पांचवा हिस्सा। गौ घाट से श्री राजाधिराज द्वारिकाधीश जी का मंदिर श्री आदि वाराह भगवान जहाँ भगवान स्वयं निवास करते हैं, जो हमारे शरीर में मस्तिष्क के ऊपर है, वहाँ अमृत है, आनंद मय कोश है। भगवान सदा वहाँ रहते हैं , जहाँ आनंद मय कोश के दोष दूर हो जाते हैं।


      इस तरह से मथुरा की पंचकोसी परिक्रमा को जाना है, अभी भी गिरिराज महाराज जी की कृपा होगी तब शायद सात कोस की भी जानकारी मिल जाएगी , अभी मंथन जारी है।


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