मांग का सिन्दूर

Updated: May 3, 2020



सुहागिनि स्त्रियाँ मस्तक पर बिंदी के ही समान माँग में सिन्दूर-ईगुर आदि अरूण द्रव्य लगाती हैं। विवाह संस्कार के समय वर वधु के सीमन्त में इसे लगाता है। यह धार्मिक प्रथा हमारे देश और समाज में प्राचीन काल से प्रचलित है। हमारे पुराण-इतिहास काव्य एवं मूर्ति कला इसके साक्षी है। अद्भुत रामायण की एक कथा के अनुसार श्री हनुमान जी महाराज ने माता जानकी के सीमन्त में सिंदूर लगा देखकर उनसे इसके प्रयोग का कारण पूछा और उत्तर में यह सुनकर कि इसका उपयोग स्वामी की दीर्घायु कामना में किया जाता है, अपने सारे शरीर में सिन्दूर पोत लिया। कहते हैं श्री हनुमान जी की इस उदात-उत्कृष्ट स्वामी- भक्ति के कारण ही चोला चढ़ाना प्रारम्भ हुआ ।


मस्तक में सिन्दुर लगाने की यह सामाजिक परिपाटी एक शास्त्रोक्त धार्मिक विधि तो है ही आकर्षक सौन्दर्य प्रसाधन भी है इसे दकियानूसी व ग्रामीण परिवेश का प्रतीक समझ कर या अत्याधुनिकता के प्रभाव की झोंक में कदापि उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखना चाहिये। यह सुहागिनी महिला का मंगल चिन्ह है। अनिवार्य कर्तव्य है।


वैदिक विज्ञान के अनुसार सीमन्त स्त्री के ब्रह्मरन्श्र एंव अधिप जैसे मर्म स्थल के ठीक ऊपर का भाग है। स्त्री के इस अति कोमल भाग की सुरक्षा-संरक्षा हेतु शास्त्रकारों ने यह विधान किया है। सिन्दूर में पारे की उपस्थिति वैद्युतिक उत्तेजना नियंत्रण के अतिरिक्त बाह्य दुष्प्रभावों से भी बचाता है। सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार सीमन्त का सिन्दूर मस्तक या भ्रकूटि केन्द्र में “नागिनी रेखा” आवर्त ( भैवरी ) आदि का आच्छादन कर उनका दोष निवारण करता है ।

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