हमारे संस्कार

Updated: May 3, 2020

भारतीय मनीषियों का मत है कि नवजात शिशु का मस्तिष्क कोरे कागज के समान नहीं है, जिस पर मनचाही नई लिखावट लिख दी जाय। वस्तुत: उस मस्तिष्क पर पूर्वजन्मों के अनेक संस्कार अंकित हैं। हाँ, इन संस्कारों की निश्चित स्मृति नवजात शिशु को नहीं होती। किन्तु इन संस्कारों में संशोधन, परिवर्धन एवं परिवर्तन किया जा सकता है, जिससे उसके व्यक्तित्व का सर्वाड्भरीण विकास हो सके। समय-समय पर इसके लिए को जाने वाली प्रक्रिया को संस्कार करते हैं, जिनके माध्यम से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक , नैतिक एवं आध्यात्मिक क्षमता का विकास होता है और इस माध्यम से व्यक्ति के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास किया जाता है।


संस्कार कया है?

हिन्दुओं के घोडश संस्कार केवल धार्मिक या सामाजिक आउम्बर नहीं हैं। हाँ, इनका महत्व एवं इनको उपादेयता की जानकारी न होने के कारण हमने इन पर रीति-रिवाज, लेन-देन एवं दिखाने का आडम्बर खड़ा कर दिया है। विवाह-संस्कार एक अपरिचित युगल को भावना की डोरी से बाँधकर उनमें एक-दूसरे के प्रति अटूट विश्वास और तादात्म्य स्थापित करने का महत्वपूर्ण संस्कार है, जो दम्पत्ति में इच्छा , विचार, निर्णय एवं आचार के स्तर पर नैसर्गिक ताल-मेल बनाने का सरल एवं सक्षम तरीका है। किन्तु आज विवाह में जो आडम्बर है-क्या यह शास्त्र की देन है ? या अपने अहंकार की तुष्टि के लिए हमारे द्वारा स्वयं तैयार किया गया एक प्रदर्शन मात्र है-इस विषय पर कुछ अधिक कहने की आउञ्श्यकता नहीं है | प्राच्य विधाओं में 'संस्कार' शब्द का प्रयोग विभिन्न अर्थों में किया गया है। कौषीतकि, छान्दोग्य तथा बृहदारण्यक उपनिषदों में इसका अर्थ-संस्कारोति अर्थात्‌ उन्नति करना-माना गया है। पाणिनि ने इसका अर्थ उत्कर्ष साधन संस्कार अर्थात्‌ उत्कर्ष करने वाला माना है। बौद्ध त्रिपिटकों में इसको प्रकृति, कर्म एवं निष्ठा में एकता की आध्यात्मिक प्रक्रिया माना गया है। अदट्ठित वेदान्त में यह आत्मा के ऊपर स्मृतियों का अध्यारोप है, तो वैशेषिक में यह चौबीस गुणों में से एक । संस्कृत साहित्य में संस्कार शब्द बड़े ही व्यापक अर्थ में व्यवहृत हुआ है। वस्तुत: संस्कार में अनेक प्रकार के भावों अर्थों का समावेश है। वस्तुत: यह वैदिक विधाओं की वह विधा है, जिससे व्यक्ति की क्षमताओं का विकास कर. उसके व्यक्तित्व को उन्नत स्तर तक ले जाने का पूरा प्रयास किया जाता है। हिन्दू समाज में संस्कारों की सहायता से मनुष्य का चरित्र-निर्माण और उसके व्यक्तित्व का विकास किया जाता है। प्राचीन ऋषियों ने इस बात का अनुभव किया था, कि मनुष्य को निरुद्देश्य इधर-उधर भटकने देने के बजाय उसे निश्चित दिशा देकर एक साँचे में ढालना चाहिए । ताकि वह जीवन की चुनौती को सकारात्मक रूप में स्वीकार कर उसका मकाबला करते हुए अपने जीवन में प्रगति की ओर अग्रसर हो । संस्कारों को अनिवार्य बनाकर हिन्दू समाजशास्त्रियों ने समान आदर्श , विचार, आचार एवं संस्कृतिवाले लोगों का एक विराट समाज बनाने की चेष्टा की है और इस काम में उनको काफी सफलता भी मिली है। हिन्दुओं के संस्कार उनकी संस्कृति के मूलाधार है और इनकी जड़ें इतनी मजबूत है कि अनेक राजनैतिक एवं सामाजिक क्रान्तियों के बार-बार होने पर भी इनका अस्तित्व अभी भी विद्यमान है। आज भी जीवन के दृष्टिकोण तथा आचार-व्यवहार का देखकर आसानी से कहा जा सकता है कि अमुक व्यक्ति हिन्दू है।

संस्कारों के नाम

वैदिक संस्कति में गर्भाधान से लेकर मृत्यु पर्यन्त 16 संस्कार का विधान बतलाया गया है। इनके नाम हैं-1. गर्भाधान 2. पुंसवन 3. सीमन्तोन्नयन 4. जातकर्म 5. नामकरण 6. निष्कमण 7. अन्नप्राशन 8. चूड़ाकरण (मुण्डन) 9. कर्णवेध 10. विद्यारम्भ 11. उपनयन 12. वेदारम्भ 13. केशान्त 14. समावर्तन 15. विवाह 16. अन्त्येष्टि | ये मानव- जीवन को मुसस्कृत बनाते है। अत: संस्कार कहलाते हैं ।

संस्कारों का महत्व

संस्कार आत्मा और शरीर इन दोनों पर पड़ी मल की परतों का प्रश्षालन हैं । अत: यह भौतिकवाद एवं अध्यात्मवाद के बीच का मार्ग है। भौतिकवादी शरीर को ही मानवजीवन का सर्वस्व समझतें है और इससे आगे या ऊपर की किसी चीज पर उनका विश्वास नही है । इसलिए आत्मा के नैसर्गिक आनन्द से वे वंचित रह जाते हैं। अध्यात्मवादी आत्मा के दर्शन में प्रयत्तशील रहने के साथ शरीर का पूरा-पूरा तिरस्कार करते हैं, जो मानव जीवन की सबसे बड़ी विड॒म्बना है, क्योंकि शरीर की उपेक्षाकर कोई भी साधक आवदध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता। संस्कार शास्त्रियों का यह सिद्धांत है कि जीवन और जगत में शरीर कोई निष्प्रयोजन पिण्ड नहीं है। यह आत्मा का वाहक और जीवन का केन्द्र-बिन्दु है। अत : शरीर को सक्षम एवं योग्यतम बनाना चाहिए। वस्तुत: जैसे अनेक रंगों के भरने से चित्र में सुन्दरता बढ़ती है, वैसे ही अनेक संस्कारों से जीवन का सौन्दर्य निखरता है ।

गर्भाधान-संस्कार

गर्भाधान पहला संस्कार है। वैसे तो समस्त जीवों में कामवासना एवं परस्पर आकर्षण के कारण नर और नारी में सहवास होता है, जिसका परिणाम सन्तानोत्पत्ति है। किन्तु सहवास से सन्तानोत्पत्ति मनुष्येतर जीव-जन्तुओं के लिए उचित होते हुए भी मनुष्य के लिए उचित नहीं है। क्योंकि अन्य जीवों की अपेक्षा मानव पर अधिक उत्तरदायित्व है और इन दायित्वों को निभाने के लिए उसका शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक दृष्टि से सक्षम होना आवश्यक है। इस क्षमता को बढ़ाने के लिए सहवास भी सुसंस्कृत होना चाहिए। सहवास एक भावना-व्यापार है। यदि वह दिव्य एवं उन्नत भावना से सम्पुटित हो, तो सन््ता।न का तन एवं मन भी दिव्य और उन्नत होगा। इस दिव्य एवं उन्नत भावना को संक्रमित करने के लिए 'सहवास काल में यह संस्कार किया जाता है।

पुंसवन एवं सीमन्तोन्नयन

गर्भकाल में गर्भिणी के दो संस्कार होते हैं -1. पुंसवन एवं 2. सीमन्तोन्नयन । शिशु के तन एवं मन का संगठन जन्म के बाद नहीं अपितु गर्भावस्था1 में ही होता है। अत: रज-वीर्य के दोषों की निवृत्ति तथा तन-मन की पुष्टि के लिए ये दोनों संस्कार किये जाते हैं। वस्तुत: जीवन की गाड़ी दो पहियों पर चलती है, जिनमें से एक है, तन और दूसरा है मन। यदि इन दोनों में से एक भी कमजोर रहे, तो जीवन की गाड़ी का लड़खड़ाना स्वाभाविक है। इससे बचने के लिए तथा तन और मन को पुष्ट करने के लिए ये दोनों संस्कार होते हैं।

जातकर्म एवं नामकरण

जन्म के तुरन्त बाद होने वाला संस्कार जातकर्म कहलाता है। जन्म से मृत्युपर्यन्त के. जीवनकाल में पग-पग पर और क्षण-क्षण में समस्याओं का सिलसिला लगा रहता है, . जिनके समाधान के लिए तीक्ष्ण एवं सन्तुलित बुद्धि चाहिए। एतदर्थ जातकर्म-संस्कार किया जाता है। इस संस्कार में पिता प्रार्थना करता है, कि सन्तान की बुद्धि-वज् के समान. दृढ़, परशु के समान तीक्ष्ण और सुवर्ण के समान दिव्य आभा वाली हो। (अश्मा, परशुर्गत हिरण्यमस्रुतंभव - पारस्करगृहासूत्र 1.16.14 )       नाम व्यक्ति की समग्र चेतना एवं उसके व्यक्तित्व से सदैव जुड़ा रहता है। अत: वह सरल, सार्थक, आकर्षक एवं किसी उन्नत भाव का वाचक होना चाहिए न कि रिन्की, पिन्की, गोलू एवं भोलू जैसा बेतुका। यह समाज में व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति की दृष्टि से पहला महत्वपूर्ण संस्कार है। जीवन का समस्त व्यवहार नाम पर आधारित (नामाखिलस्य व्यवहार हेतु-ब॒हस्पति ) होने के कारण इसका महत्व स्वयंसिद्ध है।

निष्क्रमण , अन्नप्राशन , मुण्डन एवं कर्णवेध

जगत का स्वभाव गतिशीलता है और प्रगति के लिए सदेव गतिशील रहना आवश्यक है। संसार एवं समाज में गतिशीलता का प्रारम्भ शिशु के निष्क्रमण संस्कार से होता है। क्योंकि गतिशीलता ही जीवन है। (गतिशील हि जीवनम्‌-याज्ञवल्क्य ) दाँत निकलते ही शरीर की पुष्टि एवं विकास के लिए ठोस आहार आवश्यक है। आहार ठोस होने के साथ-साथ सुपाच्य , परिमित एवं पोषक होना चाहिए। इस प्रकार के अन्न को खिलाने की शुरुआत अन्नप्राशन संस्कार से होती है। वस्तुतः अन्न ही प्राण है। (अन्न वै प्राणा:-ऋग्वेद) अत: अन्न खाने का प्रारम्भ जीवन का महत्वपूर्ण संस्कार है। शिशु की दीर्घायु एवं सुन्दरता के लिए चूड़ाकरण या मुण्डन किया जाता है। (तेन ते आयुषे वपामि सुश्लोकाम्‌ स्वस्तये-आश्वलायन गृहयसूत्र 1.17.12) और शिशु को रोगों से बचाने तथा आभूषण धारण करने के लिए कर्णबेध संस्कार होता है।

विद्यारम्भ, उपनयन, वेदारम्भ , केशान्त एवं समावर्तन

शैशवकाल की समाप्ति के साथ-साथ शिक्षण काल शुरू हो जाता है। इस समय में संस्कार शास्त्रियों ने विद्यारम्भ उपनयन, वेदारम्भ, केशान्त एवं समावर्तन का विधान बतलाया है।       विद्यारम्भ में अक्षर ज्ञान कराया जाता है। इसमें साक्षरता के साथ-साथ शील और विनय को शिक्षा दी जाती है। (आश्वलायन गृहत्यसूत्र 1.18.5) उपनयन तो मनुष्य का दूसरा जन्म है। इसलिए उपनीत व्यक्ति को द्विज कहते हैं। जिस प्रकार खनिज सोना भट्टी की आग में तपाकर शुद्ध सोना बनता है, उसी प्रकार त्रह्मचारी विद्या एवं ब्रत की अग्नि से तपकर प्रखर बनता है। . इसके बाद वेद का अध्ययन शुरू होता है, जिसे वेदारम्भ संस्कार कहते हैं।       केशान्त उस समय किया जाता है, जब ब्रह्मचारी के दाढ़ी और मूँछठनिकलती है और वह यौवन में प्रवेश करता है। इस वय:सन्धि के समय जो मनोवैज्ञानिक दृष्टि से क्रान्तिकारी समय होता है-ब्रह्मचारी को उपनयन के समय धारण किये हुए व्रत का एक बार, पुन: स्मरण कराया जाता है। ताकि वह विषय एवं भोगों से प्रभावित या विचलित न हो। अध्ययन को समाप्ति पर समावर्तन संस्कार होता है। यह ब्रह्मचारी की शिक्षा की पूर्णता का सूचक है। इसमे ब्रह्मचर्य व्रत की समाप्ति एवं गृहस्थ में पुनः लौटने का प्रावधान होता है।

विवाह संस्कार

विवाह-संस्कार सबसे प्रधान माना गया है, क्योंकि इसका सम्बन्ध न केवल पति और पत्नी है, अपितु भावी सन््तागन भी इस पर ही आधारित है। विवाह ऐसी घटना है, जिस पर पारिवारिक एवं सामाजिक सुख और सम्बन्ध टिके हुए हैं।       विवाह शारीरिक आकर्षण, नर-नारी के राग एवं कामेच्छा का परिपाक नहीं है। वस्तुत: यह दो अपरिचित युवाओं के आपसी विश्वास और दायित्वों के निर्वाह की शुरुआत है। इस संस्कार के माध्यम से दो युवावस्था की देहली पर खड़े अल्हड़ व्यक्तियों में पाँच बातों का संचार किया जाता है - (अ) एक-दूसरे का पूरा-पूरा विश्वास, (ब) भावनात्मक लगाव, (स) मिलजुल कर निर्णय एवं कार्य करने की वृत्ति, (द) देव ऋण एवं पितृ से उन्मुक्त होने का संकल्प (य) पारिवारिक तथा सामाजिक दायित्वों का निर्वाह ।       इस संस्कार में पति-पत्नी को केवल आमोद-प्रमोद और सुख-सम्पत्ति का अधिकार ही नहीं मिलता; अपितु इनको पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों को मिलजुल कर निभाने औ जिम्मेदारी भी मिलती है। इस प्रकार यह संस्कार युवाओं को परिवार एवं समाज के प्रति उत्तरदायी नागरिक बनाता है। सुखमय दाम्पत्य जीवन और उत्तरदायी व्यक्तित्व के. निर्माण के लिए इस संस्कार में सप्तपदी का विधान है। यह एक ऐसा अनुबंध है, जिसमें पुरुष सात वचनों से एवं स्त्री पाँच वचनों से बँधकर एक आदर्श आचार संहिता को स्वीकार करके तीन पीढ़ियों को (स्वयं, अपने माता-पिता एवं अपनी सनन््ताीन।) सुख-सुविधा पदचाने का दायित्व लेते हैं। यही कारण है कि विवाह का महत्व संस्कारों में सर्वोपरि है।

अन्त्येष्टि

जीवन का अवसान मृत्यु है और उस समय किया जाने वाला संस्कार अन्त्येष्टि है। अन्त्येष्टि का अर्थ है-अन्तिम यज्ञ। वस्तुतः प्रत्येक संस्कार एक यज्ञ है और यह संस्कार अन्तिम है। इसीलिए इसको अन्त्येष्टि कहते हैं।       जीवन में इच्छाओं का अतृप्त रहना सम्भव है। पुनर्जन्म के सिद्धांतानुसार अतृप्तवासना आत्मा के भटकाव का कारण है।अत: इस संस्कार में आत्मा के महाप्रस्थान को सुखमय एवं शान्तिमय बनाने की चेष्टा की जाती है। बौधायन के अनुसार जातकर्म से मनुष्य इस लोक को जीतता है और अन्त्येष्टि से परलोक की विजय करता है। (जातसंस्कारेम॑ लोकमभिजयति मृतसंस्कारेणामुं लोकम्‌। - बौधायन, पितृमेधसूत्र 3.1.4 )       कर्मवाद, पुनर्जन्मवाद और अध्यात्मवाद का प्रतिपादन करने वाले वैदिक ऋषियों ने मानव जीवन की सफलता के लिए षोडश संस्कारों का विधान बतलाया है। इन संस्कारों से उसकी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक क्षमता का विकास होता है। जीवन गतिशीलता एवं दायित्वों के निर्वाह की समुचित वृत्ति का विकास होता है और मनुष्य संसार के क्षुद्र प्रपल्चों से ऊपर उठकर अपने पारिवारिक , सामाजिक एवं आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करता है। आज समाज में जो आपा-धापी, धींगा-मस्ती , अव्यवस्था एवं अशान्ति का वातावरण है-यह संस्कारहीनता के कारण है। इस प्रसंग में यह बात स्मरणीय है, कि संस्कार हमारी संस्कृति के मूलाधार हैं इनके कारण ही आर्यजाति सुसंस्कृति जाति थी और दपनी इस संस्कृति के कारण ही उसे विश्व गुरु का पद प्राप्तहुआ था ।


हमारे संस्कारों की वैज्ञानिक सार्थकता

(संस्कार परिष्कारोन्युख प्रक्रिया हैं। बह अच्छे को उत्तरोतर अच्छा बनने की प्रेरणा है। एक प्रकार का अभेद कवच जो हमें अछवांनीय वाह्य सुलभ दुष्प्रभाव से बचाता है | भौतिक जीवन की सफलता में इनका आति महत्वपूर्ण स्थान है।)

सार संक्षेप में गर्भाधान, संस्कार बीज और क्षेत्र दोनों को पवित्र करता है। पुंसवन पुत्रोत्पति हेतु है, शुद्धिकारक भी है। सीमन्तोननयन भी गर्भ शुद्धि ही है। जातकर्म जननी के खान-पान सम्बन्धी त्रुटियों का निवारण है। नामकरण लोक प्रसिद्धि अर्थात व्यक्तिरूप में पहचान, आयु-तेज-बल-वृद्धि करता है। इसी से पृथक अस्तित्व स्थापित होता है। निष्क्रमण बालक को समन्त्रक जगत्प्राण भगवान सूर्य का दर्शन कराता है, इससे आयु वद्धि एवं लक्ष्मी कृपा प्राप्त होती है। अन्नप्राशन मातृगर्भ की मलीनता से मुक्त करता है। चूड़ाकर्म शिशु की बल-आयु एवं तेज वृद्धि करता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह अति उपयोगी है।


उपनयन संस्कार से बालक द्विज की श्रेणी में आ जाता है। यहीं से उसे वेदाघ्ययन (शिक्षा ग्रहण) का अधिकार प्राप्त होता है। विवाह जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है जो सपत्नीक यजन-याजन द्वारा जीवन को स्वर्गोपम बनाता है अनन्तर स्वर्गलाभ कराता है। ब्राह्मादि उत्तम विवाह के सुफल से सुपुत्र उत्पन्न होकर जीवित पूर्वजों की सेवा तथा मृत पितरों के हेतु श्राद्ध-तर्पणादि द्वारा लोकोत्तर उद्धार करता है। हमारा परम कर्त्तव्य है कि अपनी तरुण, युवा पीढ़ी को इस दिशा में सुदृढ़, निष्ठाशील बनाएं जिससे हमारी आगामी पोड़ियों का उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित हो सके |

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