गोत्र गाथा

Updated: May 3, 2020



  • भारद्वाज गोत्र-आंगरिस-वार्हस्पत्य- भरद्वाज तीन प्रवर हैं। सामवेद एवं रारायणी शाखा विख्यात है। इस गोत्र में पाँडे-पाठक, रावत, तिवारी, नसवारे, कारेनाग तिवारी, पिलहौली, बीसा, चौपोली, मौमले, अझ्युमियाँ, कोहरे, दियाचाट, सड्डरभेंसरे, गुनार एवं सिकरोरी नामक सोलह अल्ल हैं।

  • भागव गोत्र के भार्गव, च्यवन, आप्नवान , और्व-यमदग्नि ये पाँच प्रवर, आश्वलायन शाखा, ऋग्वेद और दीक्षित, गृहयवार, दरर, गुगौलिया, गोंहजे, कनेरे, तर, घेहरिया, सरवना, चतुरमुर्र, आमरे, मकनियाँ आदि अल्ल हैं।

  • वशिष्ठ गोत्र के वशिष्ठ-शक्ति-पाराशर तीन प्रवर, ऋग्वेद, आश्वलायन शाखानिनावली , काहौ, जौन माने , बट्ठया, डाहरू, डुंडवार, पैठवार , उटौलिया , अल्ल हैं।

  • सौश्रवस के विश्वामित्र, देवराट, औदल ये तीन प्रवर ऋग्वेद, आश्वलायन शाखा एवं प्रोहित, छिरौरा, मिश्र, चकेरी, बुदौआ, तोपजाने , चंदपुरिया, बैसा घर, सुभावली , चन्द से अल्ल हैं।

  • धौम्य गोत्र के काश्यप, आवत्सार नेश्रुव ये तीन प्रवर, ऋग्वेद, आश्वलायन शाखा एवं लाप से, भरतवार, तिलमने, मौरे, धरवारी (गृहवर्य) जोजले, सुकुल, ब्रह्मपुरिया, सोती( श्रोत्रिय) अल्ल हैं।

  • दक्ष गोत्र के आत्रेय , गाविस्थिर, पौर्वातिथि ये तीन प्रवर, ऋग्वेद, आश्वलायन शाखा एवं ककोर, दक्ष, फेंचरे , पुरवेऊ अल्ल हैं ।

  • कुत्स्य गोत्र के आंगरिस, युवनाश्व, कौत्स ये तीन प्रवर, ऋग्वेद, आश्वलाग्नन शाखा एवं शाडिल्य, मिहारी (नगरावार-सरवन) , खलहरे मरोठिया, सन्तैरे अल्ल हैं। पुनश्च: इन चौसठ अल्लों के अतिरिक्त स्व. गोकुल चंद चौबे (चंदकविआर्य) एवं बाबा बालमुकुन्द जी ने कतिपय अन्य ख्यात, आख्या, आस्पद का उल्लेख किया है जो वर्तमान में भी लोक व्यवहार में प्रचलित हैं:- नी से नवासी, छौंका, भारबारे , तिबारी , तखत बारे , महलबारे , कारे नाग सकना, होरी बारे, भरौच, चीबोड़ा, उचाड़ा, भदौरिया, घाटया, दक्‍्ख , नगरावार, मानाराव के, टोपीदास के, देवमन-मंसाराम के, लाल चौबे के, गहनियाँ के , हरसौडा के , पंडिता के, आरती बारे, नौघर बारे, करमफोर के, स्वामी, मुकद्दम, चौधरी, पटवारी निधायेके, हथरौसिया, मुरसानियाँ करोर्या |




हमारे गोत्र प्रवर-शाखाएँ

(वैदिक शिक्षण संस्थाओं की निरन्तर वृद्धि और उत्कर्ष के कारण वंश (शाखा) संस्थापकों से सम्बद्ध अपनी पहचान बनाये रखने की महती आवश्यकता को कारण हीयांत्र-प्रवर-शाखा प्रभृति संकेत ज्ञान की सृष्टि सम्भव है। “यूयते शब्द्यते ड़ति गोत्रमू। ' जो कहा जाता है, पुकारा या गाया जाता है, वह गोत्र है। ' अपने यहाँ यह जन्मगत है,शिक्षा किवा शिष्य परस्परा से उसका कोर्ड़ सम्बन्ध नहीं ।) प्रवर - विस्तार और विभाजन से ही उपजा यह गोत्र के अन्तर्गत ही एक अन्य, अपने वेशिष्ट्य और पूर्व पुरुष का परिचायक प्रतीक है। अल्ल - भाषा की द्रष्टि से यह मातृपक्ष का परिचायक है। प्रचलित नामों को प्राचीनता इतिहास सिद्ध है। यह समूह, जत्था, टोल के सूचक हो सकते है। इनका गोत्र के भीतर ही किसी स्थान विशेष के निवासी होने का संकेत भी हो सकता हैजैसे कृत्स्य गोत्र की मिहारी अल्ल में एक और विभाजन नगरावार | ' साथ ही यह विस्तार वैभव का सुपरिणाम भी है, जन-संख्या बढ़ी और आन्तरिक वर्ग विभाजन होता गया। मसलन, गौड़ों में भी कैसे गौड़ ? वस्तुत: यह हमारा वंश वृक्ष है जो परिवार की (समाज की) वर्तमान पीढ़ी को अपने कूल प्रवर्तक-वंशधर ब्रह्मर्षियों से जोड़ता है। वट्वृक्ष की शाखा-शाखा को, डाल-डाल और पात-पात को, जयाओं तक को मूल से मिलाता है। समाज के जन-जीवन में हमारे गोत्र-प्रवर-अल्ल आदि का महत्वपूर्ण स्थान है। पुराणों महाभारत आदि में भी उललेख है जो ऐतिहासिक महत्व का प्रमाण है। हमारी कुछ अल्ल अन्य ब्राह्मणों में भी प्रचलित मिलती हैं। स्थान विशेष में निवास से परिचय के सम्बन्ध में अलल के अतिरिक्त कुछ _ विशेष शब्द प्रतीक बने जैसे मथुरा से माथुर चतुर्वेदी, कन्नौज से कान्यकुृव्ज अयोध्या के सरयू पारी, मिथला के मेथिल। हमारे गोत्र केवल शाखोच्चार में सुनकर गर्व-रोमांचित होने भरके लिए नहीं वरन इनका उपयोगी प्रयोग भजन में, दान में , संध्या के गुरु अभिवादन मंत्रों में, तीर्थ विधान सहित विविध संकल्पों में, जप-ब्रत-अनुष्ठानों में सर्वत्र सा र्थक है अनिवार्य भी है। प्राचीनता की गरिमा के द्योतक हमारे गोत्र-प्रवर-शाखा रक्त- विशुद्धता के विशिष्टता के रक्षक भी है।


गोत्र वरू की प्रशस्ति

माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों की विरुदावली (यह विरुदावली शञांखोच्चार के उपरान्त वरुओं द्वारा कीर्ति गायन के रूप में पढ़ी जाती है।

दन्त वदन सुख सदन मदन वाहन प्रिय नन्दन | गवरि नन्द आनन्द कन्द सन्तत जग वन्दन ॥ परसु धरन दुख हरन नरन को सब सुख दायक । लम्बोदर उन्दर अरूढ़ सुन्देर सब लायक ॥ सिन्दूर भाल अरु ससिकला जनकिशोर वन्दत चरन | बुधि देहु एहु सित सुत बरनों वर माथुर वरन ॥ धरि वराह अवतार मारि हिरनाक्ष आनि धर । करि विश्राम विश्रान्त सप्त थापे जहँ मुनिवर ॥ भारद्वाज भारगव धौम्य वशिष्ठ बखानिय । श्रौश्रवस अरु दक्ष कुत्स्य कौरति जग जानिय ॥ ऋगवेद साख कर कौस्तुभी आश्वलायन साख थ्रुव। मथुरानिवास माथुर विदित जवसि जज्ञ वाराह हुब ॥ आंगरिस बार्हस्पत्य भारद्वाज सित होय । तीन प्रबर भारद्वाज के सामवेद पढ़ सोय ॥ पाँडे अरु पाठक रावत नसबारे कारे । नाग पिलहौली बीसा चौपीली बखानिये ॥ मामले अश्जुमियां कोहरे तिवारी । दिया चाट सड॒ भेंसरे गुनार चहुंचक मानिये ॥ सिकरौरासरस विविध वेद कण्ठ पाठ माथुर मयंक सो किशोर जग जानिये । भारद्वाज गोत्र राते सामवेद पढ़ें । तेते मथुरा नगर ऐते बैंक पहचानिये ॥ इक भार्गव च्यवन ऋषि आप्नुवान । और्व मुनि जामदग्न्य युत पंच प्रवर ये जान ॥ दीखत दीखित गहरवार दरर गुगोलियाडरु । गोंहजे कनेरे दोऊ एक जात कीजिये ॥ तरेरे धेहरिया सकना चतुरमई । आमरे मकनियाँ सोजु समाग मेर दीजिये ॥ कहत किशोर ऐते भारगव गोत्र मांही महिमा समुद्र बैक बेदन के रीझिये | दान सन्‍्मान सुख पूरन सकल ज्ञानी गर्ग मुनि के समान महि मण्डल में जीजिये ॥ वशिष्ठ शक्ति पाराशर ये तीनों कर न्यास । ये वशिष्ठ के प्रबर हैं विबिधरूप धर व्यास ॥ निनावली काहौ जौनमाने और बटिठया है। डाहरू परम शुचितन जग पायी है॥ डुंडवार पेठवार माथुर डटौलिया हैं। | जिनकी सुयश तीन लौकन में गायौ है ॥ मथुरा में बसे केशोंराय के निकट नित्य, करन बिहार नन्द नन्दन बनायों है॥ ऐते बंक महि पै महीन से बिराजत है| कहत किशोर गोत्र वसिष्ठ सुहायौ है ॥ सौश्रवस के प्रवर हैं, विस्वामित्र सुजान । देवरात और औदले तीनों ब्रह्म समान ॥ पुरोहित छिरोंरा धौरमई मिश्र माने जात । चकेरी बुदौआ तोपजाने रस रीति है॥ चन्द से उजारे चन्दपुरिया वेसान्दर । सुमावली अनूप अति वेदन सों प्रीति है॥ माथुर उजागर जप यज्ञ करन हारे । जग में निहारे सब साधुता पुनीत है ॥ पूजत जगत पद पंकज प्रणाम कर | सब सुखधाम नन्द-नन्दन के मीत है ॥ कश्यप अवतार युत, ये ध्रुव प्रवरहि रीति। मुनि सवश्र मर्य्याद में, धौम्य गोत्र सों प्रीति ॥ लापसे भरतवार तिलमने तिहुलोक । मौरे घरवाली सो उजारे, चन्द पेखिये ॥ जीजले, शुक्ल ब्रह्मपुरिया, सोती सुझाव | चाय चौपरे लाख लाखन में देखिये ॥ कहत किशोर एते धर्मरत माथुर हैं। जझिन जगत मांहि दमक विशेखिये ॥ धरणी से कहत बराह सुन वसुमति | मेरे रूप माथुर सो मोहि सम देखिये ॥ आत्रेय गाविष्टर विमल, पौव॑तिथि शुभजान | ऐसे प्रवर विचार के दक्ष गोत्र परमान ॥ जगत प्रसिद्ध हैं ककोर दक्ष फेचरे औ पुरबेऊ सज्जन जुनालिये बखानिये | बाराहपुराण वर विद्या सु अपार रहे हर शीर्ष श्वेत बिन्दु उपजे सुगानिये ॥ कहत किशोर गुन जपत है रैन दिन सुरन सहित दक्ष गोत्र के प्रमानिये ॥ सुमति पुरानन को ऋगवेद मानन को जज्ञ विधि जानन को प्रगट सुजानिये ॥ आऑगरिस यौवनाश्व पुनि कौत्स सहित सौ गाइ । कृत्स गोत्र के प्रवर ये ध्रुव सो अटल सुभाइ॥ शाडिल्य मिहारी खिल हरे और मरौठिया है सुन्दर सलौने सब ही के सरदार हैं। सुवरन सरस वरण अशरण जग शरण सुहात ऋषि विद्या के अगार है॥ कहत किशोर क्त्स्य गोत्र के बखानत हैं। केहि विधि गाऊ इन कीरत अपार है॥ कुल उजियारे वेद धर्म के रखन बारे प्यारे हरि ही के ये माथुर अवतार हैं॥ सम्व॒त अठारह शतक अरु इक सत्तर जान । चेत्र सुदी की प्रतिपदा सुर गुरुवार बखान ॥ चौवे गोकुल चन्द जी कुल गुरु वामन भूप गाथा चौसठ अल्ल की रचिके कही अनूप ॥ कवि किशोर मम नाम है वरू जो माथुर देव । बसत मधुपुरी मंझ में रचि कविता कर सेब ॥


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