गर्भाधान संस्कार

Updated: Jun 13, 2020



जब स्त्री गर्भ धारण करे तब उसके 3 महीने में गौंनी की जाती है जिससे कि मां देवी गर्भ की रक्षा करें।


नियम - सुबह उठकर स्त्री को नहलाकर अच्छे वस्त्र पहनाकर पू. पश्चिम की ओर बिठाकर दीवार पर घी का या हल्दी का (सास या जो घर की बुजुर्ग सुहागिन स्त्री हो ) सीधे हाथ का थापा लगायें, थापे के नीचे पटा व चौकी विछायें। उनके नीचे हल्दी व पानी से लीप कर आटे का सतिया बनायें। पटा के चारों कौंने पर हल्दी लगायें। दीया जलायें, रोली चावल फूल से थापे की पूजा करें । 1.250 कि.ग्रा. (सवासेर) आटे की पूड़ी व हलुआ तैयार करें, उसका प्रसाद रखें, उसमें से 9 पूड़ी थोड़ा हलुआ गर्भवती स्त्री की गोदी में रखें व9 पूड़ी थोड़ा हलुआ घर की बहन बेटी के विंदी लगाकर उसे दें। हाथ जोड़कर थापे रूपी देवी की विनती करें, बचे हुए प्रसाद को घर के सदस्य खा सकते हैं। गर्भवती स्त्री को उस टिन घर से बाहर नहीं जाना चाहिए। अच्छा खाना व प्रसन्न रहना चाहिये। इसी प्रकार पाँचवे सातवें महीने में भी गौंनी की पूजा की जाती है | गर्भवती स्त्री को आठवें महीने में साद-फरेई होती है, इसे श्री मंत (सीमंत) पूजन भी कहते हैं। ये संस्कार बहुत महत्वपूर्ण है, गर्भ रक्षा के लिये भी जरूरी है। इससे बच्चे की पेट में ही शुद्धि होती है। मन्त्र व संस्कार की वस्तुओं से स्वस्थ्य विकास भी होता है | नियम - सुबह गर्भवती स्त्री को नाईन से उबटन कराके नहलायें। स्त्री के माइके से डाला आता है। घर में देहरी की पूंजा होती है जिसे दिन धराना कहते हैं। तब अर्ध्य बढ़ाया जाता है।


दिन धराने की विधि :-

पू. पश्चिम मुह के दरवाजे को देहरी होनी चाहिए। एक बिना जनेऊ वाले (वरूआ) 'लड़का ' को बुलायें, कमरे के अन्दर के भाग में लड़के को खड़ा करके उसके सिर पर टोपी रखें हाथ में 4 मिठाई के ठौर (पीस) रखें माथे पर रोली का तिलक लगवायें। ये काम घर की भाभी व देवरानी करती है। देहरी पर पानी व हल्दी डालकर लीपें व उस जगह आटे का सतीया बनायें। आटे के पाँच फर (नीबू जैसे गोले) बनाकर सतीया पर रखें। गर्भवती स्त्री से फर की पूजा करायें। लड़का यानि बरूआ से 7 बार देहरी फँलगवानी चाहिये व दरवाजे के दोनों तरफ हल्दी की गुइयां बनवानी चाहिये। दिन धरने के समय पर गाना गाकर शीतला माता को प्रसन्नच किया जाता है। इस समय सात पुश्त तक के सगोत्रीय आमंत्रित होते हैं। देहरी रखने के बाद माँय पूजा की जाती है। माँय पूजा का सामान पंडित जी के पर्चा से जो आगे उपलब्ध है व्यवस्था करें। मॉय पूजा व वसुधारा के समय गाना गाया जाता है। माँय पूजा के बाद गर्भवती स्त्री के घर से डाला आता है :-

घाट - यानी सुन्दर साड़ी व उसके साथ एक साड़ी और जिसे लिपटइया कहते हैं । लीला-ये साड़ी नीले रंगकी होती है। इस साड़ी के साथ भी एक लिपटइया होता है। ये साड़ी काका व चाचा की ओर से होती है।


झूना - ये ओड़ना व सेला होता है इसके साथ भी एक साड़ी होती है ये साड़ी नानी, मामा की ओर से होती है।


फरेईं की सामग्री :-

  • कमियाँ - ये साड़ी सफेद व हल्के रंग की होती है इस पर माँय देवता छपे होते ह। ये साड़ी भूआ व बहन को दी जाती है।

  • 20 कि. चना भीगे हुए।

  • 1 परात नाद उलीचे की

  • 50 गूजा व मट्ठे

  • 5 कि. चावल एक थाली में नारियल

  • यथा शक्ति रूपया

डाला लेकर कजैतर के भाई उसके ससुराल जाते हैं तो नाइन भौपू बजाते हुए भार. वाहकों के आगे चलती है। उसी समय घर की बहन बेटी अर्ध्य बढ़ायें। आंगन में आटे का. सतीया बनाया जाता है, पटा बिछाये जाते हैं। जितने भी भाई हों, भाई बहन को डाला देते हैं, बहन भाई को उपाहार में कपड़े रू.नारियल देती है। बहन भाई गले मिलते हैं। भाई को नाश्ता पानी कराके भेज देना चाहिए। नीले कलर की साड़ी गर्भवती स्त्री को पहनाकर सात सुहागिन औरतों को एक साथ बैठाकर खाना खिलाना चाहिये। रात को अंजरी का प्रोग्राम : होता है।


अंजरी - अंजरी के समय गर्भवती महिला अपने ससुराल की साड़ी पहनती है जिसे ससुराल की घाट कहते हैं। जब वह अपने कमरे में खिन्नक मन बैठ जाती है तब उसका मन लगाने के लिये प्रमुख औरतें कनरी के गीत गाती हैं, उसका मनोरंजन करती हैं और उस घर के पूर्वजों की विनती करके सुख शान्ति की कामना करती हैं।


सारे-वारे का चौक - आंगन में चौक लगाकर 2 आमने-सामने पटा बिछाये जाते हैं। एक पटा पर सास व दूसरे पटा पर बहू गर्भवती बैठती है। सास हाथ में सात (७) लोटे लेती है एक हाथ में तीन (३) लोटे एक हाथ में चार (४) लोटे लेकर बहू पर उसारती है ७ बार ४ लोटे वायी तरफ व ३ लोटे दायीं तरफ रखे जाते हैं। डाले में जो गेहूँ व परात आती है उस परात को बहन व बेटी परात से गेहूँ उलीचती है। यानि अपनी परात में गेहूँ भर लेती है। उसी समय कमियां भी पहन लेती है। सास आटे के ७ विलोए बनाती हैं वो जो चना भीगे होते हैं उनको व ७ आटे की बनी हुई विलोए को चारों दिशा में उसारती है। बचे चने हाथ जोड़ कर गौनी , देवता के निकाल कर सबको बाँट दिये जाते हैं।

बहू जब अपने माइके देहरी पूजने जाती है तो वह ५० विजौरे लेकर जाती है।


विजौरे - ये खोआ के बने होते हैं एक विजारा २०० ग्राम का होता है। डाले में गूजा-मठठे आते हैदेहरी पूजने में ५० विजौरे होते है।


ससुर मनावन - गीत संगीत के पश्चात ससुर के मनाने की रीति होती है। इस रीत के अनुसार ससुर बहू को लाड़ दुलार से नीचे चलने को कहते हैं, सभी अंजरी की तैयारी होती है इसमें एक झारी, झारी के ऊपर एक नारियल के ऊपर ज्वौमड़ दीया (आटे का चौकोर दीपक ) जिसमें चारो कोने दो बाती जलाया जाता है। इस दीपक को गर्भवती औरत अपने ससुर के साथ लेकर आती है, तत्पश्चात आंगन में दो पटा बिछाकर ससुर और बहू आम॑ने सामने बैठ जाती हैं बहू इसे सुसर को देती है तथा बदले में ससुर जी उसे कोई कीमती उपहार देते हैं, इसी को अंजरी कहते हैं। इसी समय बाकी सभी रिश्तेदार बहू को उपहार देते हैं जिसे पनीछा कहा जाता है | तब बहू बेटे को उनके कमरे में ले जाकर साल सलौनी की पूजा करायी जाती है साल सलौनी में पलंग की पूजा होती है बहू बेटे (गर्भवती स्त्री व पति) एक दूसरे को तिलक व बिन्दी लगाते हैं और एक दूसरे को मीठा मुँह कराते हैं। पति नारियल फोड़ता है फिर अपने पूर्वजों के हाथ जोड़कर नारियल का प्रसाद बाटा जाता है। गीत गाया जाता है।

साध खाने के बाद थापे को पूजा होती है। पंडित जी को बुलाया जाता है, सिल छिड़की जाती है सिल में पचास पूड़ी तथा मिठाई एवं यथाशक्ति दक्षिणा बहू से छिड़कवाई जाती है फिर देवर सात पुड़िया खोलता है जो पंडितजी लेकर आते हैं। ये पुड़िया गुलाब का. फूल, चावल, सावत धनिया, हल्दी, मेंहदी, रोली की होती हैं इसमें धनिया चावल, फूल लड़की होने का प्रतीक माना जाता है।


फरेई - फरेई के दिन मुहूर्त के समय आँगन में चौक पुराया जाता है। पटे पर गर्भवती स्त्री व उसका पति बैठते हैं। इस समय गर्भवती स्त्री अपने मायके की घाट पहनती है। उसे गूलर की माला पहनायी जाती है। गोदी में एक पुतला रखते है फिर देवर द्वारा उसके कान में शंख की ध्वनि की जाती है। देवरानी दूब पीसकर उसका रस जेठानी को देती है। उसके पश्चात्‌ पंडित जी द्वारा हवन यज्ञ कराया जाता है। इसमें चारी ससुर-मँइ्याँ ससुर, ददिया ससुर, ननिया ससुर, छत्र तानते हैं इनमें से किसी की अनुपस्थिति में कोई अन्य बुजुर्ग द्वारा भी कार्य कराया जा सकता है। छत्र तानने वालों को स्त्री के मायके वालों को तरफ से दुपट्टा और दक्षिणा भेंट किया जाता है। पूजा होने के पश्चात उस स्त्री का भाई आकर उसे पान खिलाता है। घर की बहन बेटी उसका आरता उतारती है फिर स्त्री माँय देवता पर अक्षत चढ़ाकर अपने मायके देहरी पूजा के लिये जाती है। देहरी पूजन में दरवाजे पर दोनो तरफ सात-सात थापे रखे जाते है तथा बरूआ से देहरी फलँगवायी जाती है फिर ससुराल में सारे वारे का चौक व नाद उलीचने की रस्म होती है।

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