देवषिं तर्पण विधि

Updated: May 3, 2020


स्नान के बाद शुद्ध वस्त्र पहन , अंगौदा लेकर आसन पर पूर्व की ओर मुख करके बैठकर तीनबार आचमन करें। ॐ केशवाय नम:। आदि ।

ॐ अपवित्र पवित्रोवा सर्वावस्थांगतोडपिवा। यः स्मरेत पुण्डरीकांक्ष स वाहयाभ्यन्तर: शुचि: ॥

दो कुश की पैती दाहिनी अनामिका में और तीन क॒श की पैंती बाईं अनामिका में पहनकर चावल, पान, सुपारी , दक्षिणा दायें हाथ में लेकर संकल्प करें |

भारत वर्ष स्थाने, नाम, संवत्सरे, ऋतौ, मासे, पक्षे, तिथौ, दिने, प्रातःकाले, गोत्र (अपना नाम) शर्मा; श्री परमेश्वर प्रीतये देवर्षि पितृतर्पण करिष्ये ।”

देव तर्पण: दाहिना घुटना पृथ्वी से लगाकर बेठें, अरघे में चावल डालें तीनों कुश पूर्व की ओर अग्रभाग कर रखे, पर्याप्त जल रखे। जल देवतीर्थ (यानी अंगूठे के बाद की चारों अंगुलियों के अग्रभाग से) दें। जल तांबे, कांसे, चांदी या सोने के बड़े कटोरे या पात्र में डाले।


ॐ ब्रह्मादयो देवा आगच्छतु ग्रहणन्त्वेतांजलीम्‌ '

प्रत्येक नाम के बाद 'तृप्यताम्‌' कहकर एक अजलि दे।


ॐ ब्रह्मा तृप्यताम। ॐ विष्णु तृप्यताम्‌। ॐ रुद्र तृप्यताम। ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम्‌। ॐ देवास्तृप्यताम्‌। ॐ छन््दांषसि तृप्यताम्‌। ॐ वेदास्तृप्यताम्‌ । ॐ ऋषयस्तृप्यताम। ॐ पुराणाचार्यास्तृप्पताम्‌। ॐ गन्धर्वास्तृप्पताम्‌। ॐ इतराचार्यस्तृप्पताम्‌। ॐ संवत्सर: सावयवस्तृप्पताम। ॐ देव्यस्तृप्वताम। ॐ संवत्सरः सावयसस्तृप्यताम्‌। ॐ देव्यस्तृप्यतामू। ॐ अप्सरसस्तृप्यताम्‌। ॐ देवानुगास्तृप्पताम्‌। ॐ नागास्तृप्यताम्‌। ॐ सागरास्तृप्यताम्‌। ॐ पर्वतास्तृप्यताम्‌ । ॐ सरितस्तृप्यताम। ॐ मनुष्यास्तृप्पाम्‌। ॐ यक्षास्तृप्पताम्‌ू। ॐ रक्षांसितृप्तताम। ॐ पिशाचास्तृप्पताम्‌। ॐ सुपर्णास्तृप्पतामू। ॐ भूतानि उप्धताम्‌। ॐ पशवस्तृष्यताम्‌। ॐ वनस्पतयस्तृप्यतामू। ॐ ओषधयस्तृप्यताम्‌। ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम्‌ ।


दिव्य मनुष्य तर्पण: जनेऊ माला की तरह पहन उत्तर मुख बैठ आवाहन कर कुश, जौ, चावल की दो-दो अंजलि सनकादिकों को दे-

ॐ सनकादयः सप्त मनुष्या आगच्छंतु ग्रहणन्त्वेतां जलांजलीम॥ ॐ सनकस्तृप्यतामू। ॐ सनंदनस्तृप्यतामू। ॐ सनातनस्तृप्यताम्‌ । ॐ कपिलस्तृप्यताम्‌। ॐ आसुरिस्तृप्यतामू। ॐ बोढुस्तृप्यताम्‌ । ॐ पंचशिखस्तृप्यताम्‌।

ऋषि तर्पण: मरीच आदि दस ऋषियों अत्रि, अंगिरा, पुलत्स्य, पुलह, क्रत, वशिष्ठ, भृगु, नारद, का पूर्व मुख आवाहन कर कुश, चावल, जल की एक-एक अंजलि दें- (शेष पूर्ववत)


दिव्य पितृ तर्पण : अपसव्य हो , यानी जनेऊ को दाहिने कंधे पर करके बायें हाथ के नीचे ले जायें, दक्षिण मुख बैठकर बायां घुटना पृथ्वी से लगा लें और तिल, चावल, कुश , जल की तीन-तीन अंजलि पितृ, तीर्थ (यानी अंगूठे के और तर्जनी के बीच मूल भाग) से आवाहन करके पूर्ववत दें -

      यम तर्पण: इसी प्रकार निम्नलिखित प्रत्येक नाम से यमराज को पितृ तीर्थ से ही दक्षिणभिमुख तीन-तीन अंजलियाँ दे –

ॐ यमाय नमः (३)। ॐ धर्मराजाय नमः (३)। ॐ मृत्यवे नमः (३)। ॐ अन्तकाय नमः (३)। ॐ वैवस्वताय नमः (३)। ॐ कालाय नम: (३)। ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः (३)। ॐ औदुम्बराय नम: (३)। ॐ दध्यनाय नम: (३)। ॐ नीलाय नमः (३) । ॐ परमेष्ठिने नम: (३)। ॐ वृकोदराय नमः (३)। ॐ चित्राय नमः (३) । ॐ चित्रगुप्ताय नमः (३) ।

मनुष्य पितृ तर्पण: हाथ जोड़कर आवाहन करे -

ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृहणन्तु जलाज्जलिम्‌ तिल के साथ तीन-तीन जलाउ्जलियाँ दें , साथ में अमुक शर्मा वसुरूपस्तृप्यतामिदं तिलोदक॑ तस्पै स्वधा नमः तस्मे स्वधा नमः , तस्मै स्वधा नम: ।अमुक गोत्र: अस्मत्पितामह: अमुक शर्मा आदित्य रूपस्तृष्पतामिदं तिलोदंक तस्मै स्वधा नमः (३)। अमुक गोत्र: अस्मन्माता अमुकी देवी वसु रूपा आदित्य रूपस्तृप्यतामिदं तिलोदक तस्मै स्वधा नम: , तस्मै स्वधा नम: , तस्मै स्वधा नम: ।


      अमुकगोत्र: अस्मत्पितामही अमुकी देवी रुद्र रूपा तृप्यतामिदं तिलोदक तस्मे स्वधा नमः (३) ।

यदि सौतेली माँ मर गयी हो तो उसको भी तीन बार जल दें-

अमुकगोत्र: अस्मत्सापलमाता अमुकी देवी तृप्यतामिदं तिलोदक तस्मै स्वधा नमः (३) ।


इसके बाद निम्नांकित नौ मंत्रों को पढ़ते हुए पितृतीर्थ से जल गिराता रहे (जिन्हें वेदमंत्र न आता हो, वो इसे ब्राह्मण द्वारा पढ़वावें ) द्वितीय गोत्र-तर्पण: द्वितीय गोत्र वाले (ननिहाल के) नाना आदि को तीन-तीन बार पढ़कर तिल सहित जल की तीन-तीन अज्जलियाँ पितृ-ती र्थ से दें -

अमुकगोत्र: अस्मन्मातामह: (नाना) अमुक: बसुरूपस्तृष्पतामिदं तिलोदक॑ तस्मे स्वधा नमः (३) ।

अमुकगोत्र: अस्मत्प्रमातामहः (परनाना) अमुकः रुद्र रूपस्तृप्यतामिदं तिलोदक॑ तस्मै स्वधा नमः (३) ।

अमुकगोत्रा अस्मन्मातामही (नानी) अमुकी देवी वसुरूपातृप्यतामिदं तिलोदक॑ तस्मै स्वथा नमः (३) ।

अमुकगेोत्रा अस्मत्प्रमातामही (परनानी) अमुकी देवी रुद्ररूपा तृप्यतामिदं तस्मै स्वधा नमः (३)।

अमुकगोत्रा अस्मदवृद्धप्रमातामही (वृद्ध परनानी) अमुकी देवी आदित्यरूपा तृप्यतामिदंतिलोदकं तस्मै स्वधा नमः (३) ।


पल्यादितर्पण - इसके आगे पली से लेकर आप्तपर्यन्त जो भी सम्बन्धी मृत हो गये हों , उनके गोत्र और नाम लेकर तीन-ततीन अज्जलि जल दें -

अमुकगोत्रा अस्मत्पत्नी (भार्या) अमुकी देवी वसु रूपा तुप्यतामिदं सतिलं जल॑ तस्थे स्वधा नमः ।


इसी प्रकार नाम और सम्बन्ध बोलकर अन्य सम्बन्धियों का तर्पण करें । इसके बाद इसी प्रकार और जल दें -

ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त देवर्षि पितृ मानवाः तृप्यन्तु पितरः सर्वे मात माता सहादद: ।

ये5बान्धवा बन्धवाएच येउनन््याजन्मनि बान्धवा: ।

ते तृप्तिमखिला यान्तु महते नाम्बुनासदा ॥



वस्त्र निष्पीड़न - अँगौछे की चार तह कर उसमें तिल तथा जल छोड़कर नीचे लिखा मंत्र पढ़कर जल को बाहर बायीं ओर पृथ्वी पर निचोड़ै -

ये के चास्मत्कूले जाता अपुत्ना गोत्रिणो मृता: ।

ते ग॒हणन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पी डनोदकम्‌ ॥


अबसव्य होकर आचमनकरें फिर भीष्म पितामह को पितृ-तीर्थ से कुशा से जल दें -

ॐ वैयाघ्रपद गोत्राय सांकृत प्रवराय च।

अपुचाय ददाम्येतज्जलं भीष्माय वर्मणे॥


अन्त में सूर्य को अर्धदें -

ॐ एहिसूर्य सहस्रांशो तेजो राशे जगत्पंते ।

अनुकम्पय मां भक्त्या ग्रहाणआं अर्घदिवाकर इति॥

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