ब्राह्मण वर्चस्व प्रतिनिधि

Updated: May 3, 2020



यस्थारुयेन सदाएनन्ति हव्यानि त्रिदिवौकस: ।

कव्यानिचेव पितर: कि भूतमधिकम्‌ तत: ॥

ब्राह्मणा: प्रथम प्रादुर्भूता:। ब्राह्मणेभ्यश्च शेषावर्ण

प्रादुर्भूता: (महाभारत, शान्ति पर्व (34-1-21)


'तस्माद ब्राह्मण्रो3ग्नि दैवत्यो (वृहदारण्यक- -उप-१) यथार्थ है कि लोक-वेद मर्यादा और चारों आश्रमों की सरंक्षणा हेतु ब्राह्मणों की सृष्टि हुई। स्थान विशेष के महत्व ने इन्हें स्थानीय विशिष्टता से विभूषित किया। उदाहरणार्थ मथुरा काशी प्रभूति के वेदमूर्ति विद्वोत्तमों को इंगित किया जाता रहा है।


आनन्दकन्द भगवान श्रीकृष्णचन्द्र की पावन जन्मभूमि, सप्तपुरी शिरोमणि धर्मपुरी, महापुरी मथुरा इस महाप्राण महा देश की प्राण स्वरूपा, सुदर्शन-चक्र संरक्षिता ' बैकुण्ठ अग्रे रची ' मेदिनी की महामूल है। इसी पवित्र भूमि में माथुरों के आदि सम्मान-प्रदाता भगवान आदि वाराह ने बसुन्धरा से कहा था कि ' न बिश्रान्त के समान कोई तीर्थ है न केशव के समान कोई देव और न माथुरों जैसा अन्य कोई ब्राह्मण। आदि शंकराचार्य श्री की विवेक तटस्थ समीक्षा ' माथुरो मागधो बिना ' इसी विशिष्ट ब्रह्म वर्चस्व की प्रशस्ति है ' 'मंथु ' विशेषण से सम्बोधित माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों को यज्ञों का प्रवर्तक कहा गया है। लोक प्रचलित उक्ति है 'सतयुग यज्ञ करावत रहे, त्रेता में मुनि मस्तक भये, द्वापर में हरि माँग्यौ भात, कलियुग में चौबे विख्यात/समाज का ऐतिहासिक इतिवृत (बि.पू. ५०००) स्वायम्भुव मनु काल से अद्यतन तक सप्रमाण उपलब्ध है। वंश गौरव और कल की प्राचीनता के प्रमाण हमारे भोत्र-प्रवर-शाख््राऐं हैं। इनके प्रवर्तक मनु के सप्तर्षियों में माथुर ब्राह्मण थे । समाज के नर पुंगवों ने संसार को नेतृत्व प्रदान किया। गौरवृत्ति-तीर्थ पुरोहित रुप में चतुर्वेदी समाज ने गौरवपूर्ण सम्मान प्राप्त किया। धर्मार्जन के साथ यशार्जन किया। सर्वत्र अपने चरित्र बल, बिद्वता, धार्मिक सदाशयता की परम विश्वास पात्र पदवी पाई और धाक जमाई। मंत्र-द्रष्टा महर्षियों की सन्तान माथुरों ने ही सर्वप्रथम अक्षर ब्रह्म से साक्षात्कार किया और शेष समाज के सभी अंगों को यथायोग्य शिक्षा प्रदान कर जीवन की सार्थकता से | परेचय कराया। यजन-याजन द्वारा जग मंगल का मार्ग प्रशस्त किया। श्री जयशंकर


प्रसाद के ऐतहासिक नाटक “चन्द्रगुप्त' में आचार्य चाणक्य के सुप्रसिद्ध कथन “ब्राह्मण न किसी के राज्य में रहता है न किसी के अन्न से पलता है, स्वराज्य में विचरता है और अमृत _. होकर जीता है' को हमारे पूर्वजों ने अपने जीवन में चरितार्थ किया। फलत: समाज से उन्हें गौरवशाली सम्मान मिला। यह वैदिक शिक्षा प्रणाली का, श्रेष्ठ वंशानुक्रम व वातावरण प्रत्त्त सुफल है।


अतीत के इस महाप्रतापी और परम प्रभावशाली आलोक में पिछली सदी से आजतक को सामाजिक गतिविधि का, आत्मश्लाघा रुप में नहीं'-आत्म निरीक्षण रुप में सूक्ष्मावलोकन करें तो कुछ सार्थक-सकारात्मक, रचनात्मक प्रवृत्तियाँ रेखाँकित करने योग्य लगती हैं, जो प्राय: सर्वसम्मत रुप में सभी में पाई जाती हैं, सर्वमान्य हैं। यह हमारी स्वजातिगत विशिष्ट (सामान्य) प्रवत्तियाँ है, यद्यपि अपवाद सर्वत्र होते है फिर भी अपनी परम्परा प्राप्त संस्कार शीलता के आधुनिक शिक्षा के साथ सामझस्य और समन्वय से समाज को अनुपम-अभूतपूर्व उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त किया, परिणामस्वरूप आधुनिक जीवन के प्रगतिपूर्ण मार्ग में प्राथमिकता प्राप्त की। जीवन के हर क्षेत्र में उल्लेखनीय, श्लाघनीय , सराहनीय उपलब्धियाँ हासिल कर समाज को विशेष रुप से गौरवान्वित किया। जिस स्वनामधन्य पीढ़ी ने इस समाजोन्नति का सूत्रपात किया था उन यशस्वी पुरुषों की आज तीसरी-चौथी पीढ़ी कार्यरत हैं।


पहले अपनी मूलवृत्ति तीर्थ-पुराहित (गौर वृत्ति) की बात करें। इसी ने हमें जीवन के नये-नये क्षेत्रों में प्रवेश हेतु सम्पक सूत्र का कार्य किया। पूर्वजों ने इसे जो ऊँचाई दी, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमने इसे नये-नये समयानुकूल आयाम प्रदान किए, पूर्ववत सम्मान पात्रता प्राप्त्की। आधुनिक शिक्षा के साथ प्राच्य विद्या के विद्वानों ने भी अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त . की। आज उस मूल वृत्ति पर शत-प्रति-शत निर्भरता का निरन्तर क्षरण हो रहा है। फिर भी _ प्रतिनिधि रुप में हमारी वयोवद्ध पीढ़ी अभी है।


आज के इस घोर भौतिकतावादी, आत्म केन्द्रित, नाना विधि प्रदूषण और संक्रमण ग्रस्त समय की पतनशीलता हमें छूतक नहीं पा रही। धर्म-निरपेक्ष सरकार तले हमारी जाति या रामाज धर्म सापेक्ष-आस्तिक समाज है। हमारी आस्था ही तो मूलाधार है। हम समाज सापेक्ष भी हैं। परम संवेदनशील-संस्कारशील उत्तरदायी नागरिक । समाज-सेवा के हर क्षेत्र में हमारी परोपकार परायणता-पर दुख कातरता प्रसिद्ध है। समाज के सेवा-प्रकोष्ठों का इस दिशा में उल्लेखनीय योगदान है।


जमींदारी उन्मूलन से आहत लोगों ने हताश-निराश, कुंठित न होकर अपनी चारित्रिक-शै क्षिक श्रेष्ठता प्रमाणित कर उत्कर्ष हासिल किया। प्राय: उनका सामाजिक सम्मान और नेतृत्व पूर्ववत बना रहा ।


दुनियाँ खाद्य-अखाद्य का भेद भूल चुकी है। किन्तु हम आज भी गर्वपूर्वक कह सकते हैं कि हम विशुद्ध शाकाहारी हैं। मद्यपान एवं धूम्रपान-निषेध हमारी जाति-गत विशेषता है। हमारे विषय में प्रसिद्ध है कि हम चरित्र-हाथ-बात के पक्के और धर्मप्रिय हैं। जीवन के हरक्षेत्र में मेधावी, कर्त्तव्य के प्रति निष्ठापूर्वक. समर्पित और वफादार। सदाई-ईशणनदारी के हामी |


बालिकाओं में व्यापक स्तर पर शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ है। घर-घर में स्नातक लड़कियाँ, परा स्नातक बहू-बेटियाँ हैं जिन्होंने विख्यात स्कूलों से उच्चतम शिक्षा प्राप्त की है। महिला साक्षरता शत-प्रतिशत है। सभी क्षेत्रों में महिलाओं का योगदान तीब्रगति से बढ़ा है। 'बाल-विवाह और बदले की प्रथा समाप्त हो चुकी है। महिलाओं की जागरूकता और हर क्षेत्र में भागीदारी का निरन्तर बढ़ते जाना स्वाभाविक है। हमारा समाज उत्सव धर्मी है। हमारी उत्सव-प्रियता 'सात वार नौ त्यौहार' के रुप में अभिव्यक्त है। पर्वोत्सव-त्यौहारों की धूम का ऐसा दिव्य दर्शन आज के जमाने में अन्यत्र अति दुर्लभ है। यह हमारा सांस्कृतिक वैभव है।


स्वजाति पंचदेवोपासक है। घर-घर में ठाकुर सेवा तुलसी चौरा एवं गोसेवा चिरकाल से हमारी पहचान रही है। अति व्यस्तता, स्थानाभाव और उग्र मँहगाईवश गोपालन निरन्तर अट रहा है। हमारे गुरु द्वारे आज भी प्राचीन परम्परा के प्रतीक हैं। श्री जी पीठ- श्री गोपाल वैष्णव पीठ और टटिया स्थान आदर्श गुरु पीठ हैं। श्री यमुना उपासी माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मण समाज हमेशा से पर्यावरण-संरक्षक एवं प्रदूषण निवारण हेतु सजग-सतर्क और सक्रिय रहा है। आज़ भी हम इस दिशा में सतत्‌ प्रयत्नशील हैं ।


हम सर्दोँ से वैदिक विवाह पद्धति ( ब्राह्म बिवाह) के अनुगामी और रक्त शुद्धि के हामी रहे हैं। स्वगोत्र में विवाह निषेध को मान्यता प्राप्त रही है। जातेतर विवाह के विषय में कूछ कहने की आवश्यकता ही नहीं। दहेज-प्रथा में बेतहासा बढ़ोतरी और प्रदर्शन प्रियता दूसरों को देखा-देखी निरन्तर बढ़ रही है। अपने घरों-गलियों से हम बाहर निकल आए हैं। धर्मशाला-गैस्ट हाउसों से आगे अब हमारी प्राथमिकता पैलेसों और स्टार होटलों तक पहुँच गईं है। अपनी मुखामेल परीसगारी को भूलकर हम ' अपना हाथ जगन्नाथ का भात' को चरितार्थ कर रहे हैं। मेरी प्लेट में से आपकी पोशाक पर कुछगिर जाए तो क्षमा करना |


'रोटला घणा ओटला नथी ' जैसी जगहों में आज स्वजाति के लोग अमूल्य भूमि भवनों व शानदार कोठी बँगलों के स्वामी हैं। विदेशों में भी हमारी समुन्नति की यश-पताका फहरा रही है और पूर्वजों की अक्षय कीर्ति को प्रस्तारित कर रही है। औद्योगिक व्यावसायिक प्रगति सर्वज्ञात है।


समाज में सक्षम नेतृत्व निरन्तर विकसित हो रहा है जो राजनीति के चरम तक विस्तारित है। मथुरास्थ और मथुरान्तों में सार्थक सम्पर्क एवं निकटता निरन्तर बढ़ रही है जो अतिशुभ संकेत है। इसके सूत्रधार विरादरी की ओर से धन्यवाद के पात्र हैं। यद्यपि मल्ल विद्या के लिए जग विख्यात समाज में, इस विषय में अभिरुचि निरन्तर घट रही है, तथापि प्रसन्नता का विषय है कि आज भी हमारे यहाँ राष्ट्रीय स्तर के पहलवान हैं । गेम्स-स्पोर्टस के क्षेत्र में हमारे खिलाड़ी अखिल भारतीय स्तर के है।


महानगरों की (विदेशों की भी) भौतिक चकाचौंध से आक्रमण ग्रस्त, महाव्यस्त और आपाधापी जैसी अत्याधुनिक जीवन शैली, मल्टीचैनल इलैक्ट्रो मीड़िया की बदौलत “ग्लोबल विलेज", जैसी दुनिया के “कल्चरल इन्फैक्शन” वाले एनवायर्नमेंट में भी हमारे लोग अभी तक अप्रभावित हैं। “महाजनोयेनगत: स पन््था " का अनुगमन करते हुए अपनी सांस्कृतिक-धार्मिक परम्पराओं मर्यादाओं की मर्यादा में सारी शानो-शौकत और ठाटबाट को ठाटबाट से जी रहे है। “जैसें उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पै आबै ।" यह सद्‌-असद्‌ विवेक हंस के नीर-क्षीर विवेक जैसा है। विशेष रूप से हमारे युवक इस दिशा में आशीर्वाद के पात्र हैं।


“में हो भूसुर मातृभूमिको मन यह मती भुलइयो।

कंठी माला तिलक जनेऊ दृढ़ उर आनें रहियो ॥

गायत्री-संध्या उपासना कीर्तन गुन गन गईयो ।

यत्र-तत्र-सर्वत्र बंधु तुम सौरभ सुयश कमईयो ॥

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