मथुरा: '' अहो मधुपुरी धन्या ''

(“तीन लोक सो न्यारी प्यारी मथुरा वेदन गार्ई है ।' भगवान श्रीकृष्ण की परम पावन जन्मभूमि विश्वविख्यात धर्मधुरी मधुरा मंडल की कीर्ति को दियू-दियन्त में परिव्याप्त करने में धर्मगुरूओं एवं विभिन्‍न सम्प्रदाय आचार्यो और महापुरूषों सहित माधुर मुनीशों का विशेष योगदान है।) भगवान श्रीकृष्णचन्द्र की पावन जन्मभूमि महापुरी मथुरा संसार की प्राचीनतम नगरियों में से एक है। अपनी ऐतिहासिक-धार्मिक एवं सांस्कृतिक विशिष्टताओं के कारण यह पवित्र धर्मस्थली सदैव विश्वविख्यात रही है। 'अयोध्या मथुरा माया काशी काज्ची अवंतिका। पुरी द्वारावतीएचैव सप्तैता मोक्षदायिका । ' उक्ति प्रचलित है। 'तीन लोक सों न्यारी प्यारी मथुरा वेदन गाई है। भूतेश्वर कोतवाल यहाँ के केशव की ठकुराई हैं।' वाली बात भी जन मानस में रची-बसी है। वैदिक काल से अद्यतन के इतिहास में सिद्ध साधकों की साधना स्थली इस पुण्य क्षेत्र की प्रचुर मात्रा में महत्वपूर्ण चर्चा उपलब्ध है। प्राचीन इतिहास में सूरसेन जनपद अपने सांस्कृतिक वैभव और भौतिक समृद्धि दोनों के लिए दूर-दूर तक जाना जाता रहा है। 'इत वरहद उत सोनहद सूरसेन को गाम ' के रूप में इसकी सीमाएऐं वर्णित हैं। वेदों-उपनिषदों-संहिताओं में ' ब्रज ' शब्द से रूपायित मथुरा के लिए अन्यत्र मथुरा, मधुरा, मधुवन, ब्रह्मपुरी, गोपालपुरी आदि शब्द प्रयुक्त हैं। पुराणों में प्राय: ब्रजस्थान, ब्रजभूमि आदि प्रयोग मिलते हैं। वराह पुराण मथुरा माहात्म-खंड में मथुरा और माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों का उल्लेख है :- धन्य॑ वृन्दावन धाम धन्या श्री मथुरापुरी । केशवो न समो देव: माथुरो न समोद्धिज !' भी मथुरा माहात्म्य ही है। हरिवंश पुराण के 'हरिपर्वमें - 'तस्मिन मधुवन स्थाने मथुरा नाम सा पुरी। शत्रुघ्नेन पुरा सृष्टा हत्वां त॑ दानवं रणे ' के रूप में शत्रुघ्न जी द्वारा दानव वध के उपरान्त इसे पुन: बसाने की चर्चा है। महापुराण महाभारत एवं श्रीमद्भागवत में यमुना तट पर बसी पुण्य भूमि मथुरा में भगवान के नित्य सानिध्य का उल्लेख है। उपनिषदों में मथुरा के मेरू श्रृंग पर बसावट का महत्वपूर्ण उल्लेख है।' मथुरा भगवान्यत्र नित्यं सन्निहितो हरि: ' हमारे दृढ़ विश्वास का द्योतक है।       मथुरा मंडल की कीर्ति को दिगू-दिगन्त में परिव्याप्त करने में धर्म गुरूओं एवं विभिन्‍न सम्प्रदाय आचार्यो और महापुरूषों का विशेष योगदान रहा। पुराणेतिहास और बौद्ध जैन ग्रन्थों में इसे बारह योजन दीर्घ और सौ योजन विस्तीर्ण बताया गया है, प्राय: इन सभी ने ब्रजयात्रा की और जनपद में अपने उपासना केन्द्र स्थापित किए। इन सभी के परम्परा वद्ध हस्तलेख माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों की बहियों में उपलब्ध हैं। ब्राह्मण वर्चस्व और वैदिक उपासना पद्धति का गढ़ मथुरा कालान्तर में बौद्ध एवं जैन यतियों एवं तीर्थंकरों की सिद्ध पीठ रहा। पुरातात्विक अनुसंधान में यहाँ अनेक संघाराम एवं बौद्ध विहारों को स्थिति स्पष्ट हुई। यहाँ उपलब्ध शिल्प एवं मूर्तियाँ देश-विदेश के संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं, मूर्ति कला का प्रादुर्भाव भी सर्वप्रथम यहीं हुआ।       प्राचीन काल से ही अनेक विदेशी यायावरों ने समय-समय पर मथुरा (व्रजमंडल) को यात्रा की। उनके यात्रा वृतान्तों में इस जनपद का व्यापक वृतान्त मिलता है। प्रसिद्ध यूनानी विद्वान हालमी के अनुसार ' मोदूरा' (मथुरा) देवताओं का नगर है। एक अन्य यूनानी यात्री मेगस्थनीज, ईसा पूर्व चौथी सदी के अन्तिम दशक में भारत (पाटलिपुत्र) सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के राजदरबार में आया था। उसके विवरणानुसार “शौरसेनाइ (शूरसेन जनपद-मथुरा) लोग हेराक्लीज ( भगवान हरि- श्रीकृष्ण) का बहुत आदर करते हैं।” ईस्वीं सन 400 में प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्मान मथुरा आया था। उसने लिखा है, “मोटुलो (मथुरा) के आसपास चूना नदी (यमुना) के दोनों किनारों पर बीस संघाराम (वौद्ध विहार) हैं, जहाँ लगभग तीन हजार भिक्षु रहते हैं।' यहाँ छह बौद्ध स्तूप हैं, सारिपुत्र की स्मृति में बना स्तृप सबसे अधिक प्रसिद्ध है। दूसरा प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्ेन सांग भी मथुरा आया था। सन 640 ई. के लगभग यह सम्राट हर्ष का शासनकाल था। उसने लिखा है, “मथुरा के लोगों का स्वभाव कोमल है, वे गुप्तरूप से तत्व ज्ञान का अध्ययन करते हैं ' इनके मन में विद्या ज्ञान के प्रति बड़ा सम्मान है, ये लोग परोपकारी है।” इसी क्रम में कुख्यात आक्रान्ता महमूद गजनवी के मुंशी अलउल्वीकी ई. 1017 में लिखी किताब ' तारीखे यमिनी ' मथुरा की बावत कहती है, इस शहर में सुल्तान ने एक निहायत उमदा तरीके की बनी इमारत देखी जिसे यहाँ के वाशिन्दे फरिश्तों की कायनात बताया करते थे।' इसी तरह अलबेरूनी, अलबदाउनी व मुहम्मद कासिम ने अपने इतिवतों में मथुरा के मंदिरों के विपुल वैभव व गजनवी और सिकन्दर लोदी के हमलों की व्यापक जानकारी दी है।       मुगल काल में योरोपीय यात्री जान-द-लाइट कोसी के निकट दौताना गाँव में आया था उसने लिखा है कि वहाँ एक पीरकीमजार है जिसकी जियारत को बहुत से यात्री आते हैं। तदन्तर ई. 1650 के आसपास फ्रांसीसी यात्री टेवर्नियर मथुरा आया था उसने केशवदेव मंदिर के विषय में लिखा है कि यह अति विशाल मंदिर नीची भूमि में स्थित होने पर भी 5 कोस दूर से दिखाई देता है। इटली के यात्री मनूची ने भी केशवदेव मंदिर की चर्चाकी है। जोसेफ दी. थैतर 1743 ई. ने मथुरा-गोकुल की महिलाओं की शादी अन्यत्र न होने की बात कही है। सन 1825 में मथुरा आए विशप्‌ हैवर ने भी अपने विवरण में यहाँ का वखान किया है! 1862-1882 की ए. कनिंघम की मथुरा यात्रा और उनकी आरकेलॉजिकल सर्वे एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसी क्रम में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है एफ.एस. ग्राउस का मथुरा मैमोअर्स ' । ब्रज सम्बन्धी खोजपूर्ण जानकारियों से परिपूर्ण किसी गहन शोध जैसा यह ग्रंथ आज भी प्रासंगिकहै, इसमें मथुरा निवासियों की बोलचाल भाषा, जीवन शैली के साथ-साथ श्रीकृष्ण चरित चर्चा और विदेशियों के आक्रमणों की चर्चा, ब्रजयात्रा, होली, ब्रज की जाट शक्ति, वुद्धकालीन मथुरा का महत्वपूर्ण विवेचन है। प्रामाणिकता को हद यह ** एक परदेशी जिला कलक्टर का विवरण आज भी अक्सर उद्धरित होता है।       मथुरा नगर जनपद का मुख्यालय है। उत्तर प्रदेश के महानगरों में शामिल होने की ओर . तेजी से अग्रसर मथुरा आगरा मंडल का प्रमुख शहर है जो मध्य, पश्चिमी एवं पूर्वोत्तर रेलवे - का प्रमुख जंक्शन स्टेशन होने के कारण रेल मार्ग द्वारा इस महादेश के सुदूर स्थानों से . भलीभाँति जुड़ा है। 'सड़क मार्ग द्वारा भी यह उत्तर भारत के सभी स्थानों से जुड़ा और राष्ट्रीय राजमार्गपर स्थित है। अनेक तीर्थों जैसे हरिद्वार-अयोध्या-काशी हेतु डेली बस सर्विस उपलब्ध है। देश की राजधानी का निकटस्थ यह नगर शीघ्र ही हवाई मार्ग द्वारा जुड़ने वाला है। वृन्दावन-दिल्ली हैलीकॉप्टर सेवा का ट्रायल हो चुका है। निकट भविष्य में हवाई अड्डा निर्माण की भी प्रक्रिया चल रही है।       नगर में अनेक स्नातकोत्त महाविद्यालय, औध्योगिक-व्यावसायिक शिक्षण-प्रशिक्षण स्थान, लॉ एवं प्रौष्योगिकी के अनेक कॉलेजों सहित डीम्ड यूनीवर्सिटी बैटरिनरी विश्वविद्यालय एवं संस्कृत महाविद्यालय, शिक्षा शास्त्री प्रभति, शिक्षा मंदिर इसे एक एजूकेशनल हव ' की शक्ल प्रदान करते हैं। मथुरा अपनी रामलीला व रासलीला के लिए भी प्रसिद्ध है। वैसे यहाँ के आदि निवासी माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों की सभी चारित्रिक विशेषताओं के लिए भी मथुरा विश्वविख्यात है। दिल्‍ली रोड पर कोटवन वार्डर पर यह जनपद की सीमा है जो हरियाणा का स्पर्श करती है। आगरा रोड़ पर जिला आगरा और भरतपुर व गोवर्धन रोड़ पर डीग (राजस्थान) का सीमा स्पर्श है तो यमुना पार के रोड़ हाथरस (अलीगढ़) जनपद की सीमा का स्पर्श करते हैं।       यहाँ तेलशोधक कारखाने के अतिरिक्त अनेक छोटे-उद्योग, कुटीर उद्योग एवं गृह उ्योग है। कंठी-माला, ठाकुर जी की पोशाक एवं श्रृंगार, मूर्तियां, हस्तशिल्प, छपाई, चूरन-चटनी, पेड़ा एवं अन्य मिठाईयों, चांदी का सामान, रामलीला-रासलीला के श्रृंगार-पोशाक पर्दे आदि का कार्य बड़े पैमाने पर होता है। यहाँ की आबादी और बसावट निरन्तर बढ़ रही है। नगर के चारों ओर खास तौर पर नेशनल हाईवे के इर्द-गिर्द अनेक उपनगर जैसी कालोनियाँ सर्वत्र अस्तित्व में आ रही हैं। नगरपालिका परिषद महापालिका बनने जा रही है। दुर्लभ मूर्तियों का आगार मथुरा पुरातत्व संग्रहालय संसार प्रसिद्ध है।       भगवान श्रीकृष्ण की लीला भूमि होने के कारण जनपद में दर्शनीय स्थलों की दीर्घ श्रृंखला है। श्री यमुना जी के सुरम्य तट पर बने पक्के घाटों की शोभा दर्शनीय है। अपने दाँये-बाँये बारह-बारह घाटों के मध्य सुशोभित पुण्यतीर्थ विश्रामघाट यमुना तट का एकमात्र तीर्थ है। यहाँ सुबह-शाम माँ यमुना जी की अवलोकनीय महा आरती होती है। निकट ही श्री धर्मराज मंदिर, आदि विष्णु गतश्रम नारायण एवं ट्वारिकाधीश के प्रसिद्ध मंदिर हैं। होलीगेट से प्रवेश करते ही मंदिरों की झांकी प्रारम्भ हो जाती है। विश्वविख्यात श्रीकृष्ण-जन्म स्थान प्रमुख दर्शनीय स्थल है। इसी मंदिर के सौन्दर्य-समृद्धि की वैभवशाली ख्याति ने इतिहास में अनेक बार विदेशी आक्रान्ताओं को व्यापक लूट-पाट और नर-सहार हेतु प्रेरित किया है। पुराना नाम कटरा केशवदेव है। मूलरूप में श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज़ञनाम ने बनाया। ई. ४०० में सम्राट विक्रमादिव्य द्वारा, 1150 विजय पाल के शासन में जज्ज नामक धनी ने, 25 वर्ष बाद जहांगीर के शासन में ओरछा के वीरसिंहजूदेव, अंतिम विघ्वंश औरगंजेब के शासन में , तभी पास में मस्जिद बनी। मदनमोहन मालवीय जुगलकिशोर बिरला के प्रयास में सन्‌ 1951 में वर्तमान निर्माण की बात सर्वज्ञात है। मुंशी मदनमोहन चौबे का अविस्मरणीय सहयोग था। नगर पुन:-पुन: बसा और उजाड़ा गया | यही बात यहाँ सभी प्राचीन मंदिरोंके विषय में कही जा सकती है। कूल देवी महाविद्या-चर्चिका मथुरादेवी सहित ककाली-काली-सरस्वती मुख्य शक्ति पीठ और पिप्लेश्वर, रंगेश्वर, भूतेश्वर एवं गोकर्णनाथ प्रमुख शैव उपासना पीठ हैं। नगर की पंचकोसी परिक्रमा प्रसिद्ध है जो विश्रामघाट से प्रारम्भ होकर विश्रामघाट पर भी सम्पूर्ण होती है। दीर्घ विष्णु मंदिर एवं आदिवराह यहाँ के केशवदेव के ही समान प्राचीन मंदिर हैं। श्रीजी पीठ, श्री गोपाल वैष्णव पीठ एवं वृन्दावनस्थ टटीया स्थान माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मण समाज के गुरू दरबार हैं। नगर में अत्याधुनिक सुविधा सम्पन्न धर्मशालाओं, गैस्ट हाऊसों एवं होटलों की व्यवस्था उपलब्ध है।

वंदावन

जनपद के दर्शनीय स्थलों में श्री धाम वृन्दावन का महत्वपूर्ण स्थान है। पुराने समय में यह आदि-मध्य और अंत भागों में विभक्त माना जाता था। आदि में गिरिराज पर्वत - चन्द्रसरोवर मध्य में, नंदगाँव-बरसाना-कोलिकावन, संकेत अंत में वर्तमान वृन्दावन। प्राचीन रास चबूतरा और वंशीवट विभूषित वर्तमान वन्दावन मथुरा नगर से सड़क मार्ग के साथ रेलमार्ग द्वारा जुड़ा है वहीं छटीकरा रोड़, द्वारा हाईवे पर आगरा दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ता है दर्शनीय स्थलों में प्रसिद्ध सप्त देवालयों के अतिरिक्त, बाँकेबिहारी, रंग मंदिर (सोने के लट्ठा वाला मंदिर) टटिया स्थान उल्लेख्य हैं। असंख्य आश्रम हैं जहाँ देव विग्रह विराजमान हैं। अभिनव आकर्षण के केन्द्र इस्कोन (अँग्रेज मंदिर) तथा वैष्णो देवी एवं प्रेम मंदिर हैं जो अपने जगमगाते शिल्प सौन्दर्य से सभी को आकर्षित करते हैं। मथुरा के ही समान यहाँ की परिक्रमा भी प्रसिद्ध है। बाँकेबिहारी, गोविन्द देव, गोपीनाथ, मदनमोहन , राधारमन, राधा दामोदर, राधाबललभ, सप्त देवालय है। यहाँ के घाटों से यमुना जी दूर चली गई हैं।

गोकुल

गोकुल के भी प्राचीन वृहद-विस्तृत रूप की चर्चा की जाती है। वर्तमान गोकुल का विकास विक्रम सोलहवी सदी के उत्तरार्ध में गोस्वामी विट्ठलनाथ जी एवं गो. गोकुलनाथ जी के समय हुआ। यमुना पार दक्षिण पूर्व में 12 कि.मी. दूर स्थित यह छोटा सा तीर्थ स्थल बालकृष्ण की क्रीड़ाभूमि के रूप में विख्यात है। आवागमन का साधन सड़क मार्ग है। यहाँ दस-बारह छोटी बड़ी धर्मशाला हैं। यमुनातट पर सुन्दर घाट हैं। बड़ा मंदिर, गोकुलनाथ के अतिरिक्त राजा ठाकुर-गोपाल लाल-मोरवाला मंदिर मुख्य दर्शन हैं। निकटस्थ महावन के चौरासी खंबा आदि के अतिरिक्त कार्ष्णि गुरू शरणानंद महाराज का रमणीक आश्रम और ठा. रमणबिहारी के रमणरेती स्थित दर्शनीय स्थल हैं। आगे बल्देव में दाऊजी का ठिख्यात मंदिर है।

गोवर्धन

ब्रज मंडल का दर्शनीय श्री गिरिराज-गोवर्धन मथुरा से पश्चिम डीग-कामां अलवर रोड़ पर 22 कि.मी. दूर स्थित है जो अपनी सप्तकोस परिक्रमा के लिए प्रसिद्ध है। मानसी गंगा, मनसा देवी, हरिदेव जी, मुखारबिन्द मंदिर प्रमुख है। दानघाटी से परिक्रमा प्रारम्भ होती है। रमणरेती आश्रम से आगे आन्यौर गाँव है जहाँ श्रीकृष्ण ने दो स्वरूप धारण कर एक स्वरूप (चतुर्भुजस्वरूप) से पूजा ग्रहण की थी। आन और-आन और (और लाओ) से ही स्थान का नाम आन्यौर बना। आगे तलहटी में छप्पन भोग का स्थान है। इन्द्रदेव द्वारा प्रभु का अभिषेक स्थल गोविन्द कुंड, पूछरी का लौठा प्रसिद्ध है। (यहाँ परिक्रमा 2 कि.मी. राजस्थान क्षेत्र में है। )

जतीपुरा

श्री वलल्‍लभ सम्प्रदाय का गढ़, श्रीनाथ जी का मंदिर, मुखारबिन्द का भव्य दर्शन, गुंसाई जी की बैठक है। कहते हैं नाथद्वारा से ठाकुर जी यहाँ आकर शयन करते हैं लक्ष्मी नारायण मंदिर-कनक भवन उल्लेख्य है। राधाकुंड के राधा एवं श्याम (कृष्ण) कुड प्रसिद्ध है। यहाँ का.क्‌.८ ( अहोई अष्टमी ) का पर्व व मेला होता है। राधाकांत मंदिर और कुसुम सरोवर का स्थापत्य दर्शनीय है।

बरसाना

मथुरा से 42 कि.मी., गोवर्धन से 21 कि.मी., नंदगाँव से ७ कि.मी. कोसी-दिल्ली रोड़ के निकट है। रोडवेज व प्राईवेट बस, जीप , कार, आटो, टैम्पो यातायात के साधन हैं। बरसाने की ब्रह्मसानु जिस पर विख्यात लाड़ली जी मंदिर स्थित है, छाता तहसील की अन्य पहाड़ियों के समान अरावली श्रृंखला ही है। मंदिर के अतिरिक्त दानगढ़-मानगढ़, मोरकूटी भी इन चोटियों के सिरे पर स्थित हैं। अनेक छोटे-बड़े दर्शनीय मंदिर है राधारानी मंदिर का निर्माण राजा वीरसिंह देव द्वारा हुआ। मंदिरों के निर्माण का श्रेय लाखा बनजारा, रूपराम कटारा एवं माधवराव सिन्धिया को भी दिया जाता है। वर्तमान भव्य मंदिर का जीर्णोद्धार सेठ हरगुलाल ने लगभग ७० साल पूर्व कराया था। यहाँ की रंगीली ( लठांभार) होली विश्वविख्यात है। प्रेम सरोवर उल्लेख्य है।

नंदगाँव

यह नंद बाबा का मूल गाँव है, बरसाना-कोसी रौड पर स्थित है। यहीं से वे गोकल आए थे। नंद भवन मुख्य मंदिर है जो रुद्रपर्वत पर है द्वार पर नंदीश्वर महादेव ग्राम के अग्रभाग में सरोवर पृष्ठ भाग में मधुसूदन कुंड। समीप ही मोहन कुंड, यशोदा कुड, ललिता कुंड, दुग्ध-दधि व दोहनी कुंड द्र॒ष्टव्य हैं। यशोदा कूप के निकट कदम्ब खण्डी _ नामकबन है। बरसाने की तरह यहाँ की होली भी संसार भर में प्रसिद्ध है ।

कामवन

इसे प्राचीन वन्दावन भी कहते हैं। ब्रज के प्रमुख वनों में गणनीय इसे पाण्डवों के अज्ञात वास के स्थलों में भी गिना जाता है। मदनमोहनजी एवं गोकुल चन्द्रमा जी दर्शनीय मंदिर, पहाड़ियों में अनेक लीला चिन्ह खिसलनी शिला, भोजन थाली एवं अनेक कुण्ड हैं जो अब लुप्त होते जा रहे हैं। धार्मिक यात्रा के अतिरिक्त पर्यटन की दृष्टि से भी मनोरम ज्जभूमि का दर्शन महत्वपूर्ण स्थान है।

       कवि व्यास के शब्दों में :-

पथरी है तऊ रसकी गगरी, कण पुरी है तऊ उजरी है।

मल्लपुरी है तऊ मधुरी, धुव धारना भावना भक्ति भरी है ॥

के व्रजबास के कारन 'व्यास' धग पै पुरी अलका उठा है।

मानों कलिंदजा के तट पै, हटरी सी धरी मथुरा नगरी है ॥

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