ब्रज भाषा साहित्य की कालजयी गीत रचना

साग सभा

(रचयिता-स्व, श्री गोकुल चन्द्र जी 'चतुर्वेद चन्द्र कवि आर्य )

सब सागन के दसखत कराय लेउ, पंच जिमीकन्दे सभा कौ बनाय देउ ॥ आलू रतालू कर ठट्ठा-घुय्यनसौं नाहक लड़ैं गट्‌ठा ये रूठी है बंडा मनाय लेउ पंचजिमी ॥1॥ सेंम भिण्डी मटर सौं कहै कौला-ये करुऔ करेला करे रौला कचनारन कौ वेगहि बुलाय लेउ पंचजिमी ॥2॥ येदीखत के टिण्डे बड़े गुण्डे-पुन: तासीर केहें अधिक ठण्डे इनकौ घीया सौं जीया मिलाय देउ पंचजिमी ॥3 ॥ यों तोरई सौं भोरई कहें गलका, हरे सागन में मेरी रहे हल्का... मूरी पालक में मैंथी मिलाय देउ पंचजिमी ॥4॥ कुल्फा चौरई में रहते मगन सौया-क्या मीठे कठहर के लगें कौआ पोदीना धनिये की चटनी घुटाय देउ पंचजिमी ॥5 ॥ फूट ककड़ी सौ कहती ये ना मानै कचरा-कमरक कौ पकरै करौंदा अचरा हरी मिचें तौ इनमें झुकाय दे पंचजिमी ॥6॥ सकरकन्दिन सों चूंका रहे गोभी-कहैं सेगरी ये सेंगर बड़ौ लोभी सूम बथुआ कौ रायतौ घुराय देउ पंचजिमी ॥7॥ कोऊ पूछें ना गाछें बड़ौ ल्हाल्हरो-कहें केला लभेरा रहै लाढ़लौ ककोड़ा रचपच के परमल बनाय देउ पंचजिमी ॥8॥ यों आर्या जी कहते सुनो खीरा-विष तजते नहीं बिन लगें चीरा. कोऊ अदरक में नीबू मिलाय देउ पंचजिमी ॥9॥ योंसुनकें सभा में धंसे है भटा-इन बातन पै काऊ दिन चल जाइ लठा 'चंद' 'याककें तनकी खुजरी मिटायदेउपंचजिमी ॥10॥

फल सभा

नारंगी सारंड्री बजाबे तौ-तान नई गावे अनार नासपाती नचाती और नाच है सेब कहें जामुन ये तुकमा आमन का देउ केला भी बेला घुमाव तो तान नई गाव अनार ॥1॥ चटकोीले, गुनीले, सुरीले अंगूर अमरूदन को है गयी केसौ गरूर बर-बेर पछतावे तो तान नई गावै अनार ॥2॥ बतरावे कसेरून सौं लीची लखौट लखि लिया ये मिट॒ठा चले गये लौट सीता फल शरमाव तो तान नई गाव अनार ॥3॥ देखो आड़े अडुचे खरबूजे तरमृज जाने चकोतरन कों रह्यौ क्या सज अंजीर मंजीर बजाब तौ तान नई गावे अनार ॥4॥ ए सरसा मुसम्मी खुमानी पपीत किसी फल से विजोौरे जी रखते न प्रीत सिंगाड़े निगाड़े बजाबै तो तान नई गावे अनार ॥5॥ बड़े कोमल रसीले सुघड़ सैंसूत रहे बेल हते ज्यादा केत मजबूत श्री फल भेट चढ़ावै तौ तानन नई गावे अनार ॥6॥ कछू खिन्नीट कहें वो सुनो फालसे 'चन्द' कच्ची हैं अमिया मेरे ख्याल से रसभरी बतिया बनावै तौ तान नई गावै अनार ॥7॥

बारह-मासा

सखी श्याम द्वारिका छायौ-अजहु न आयी। सामरौ जाने किन सौतिन विर्मायौ ।। दोहा- चैत मास लाग्यौ मेरी आली-पवन चलत सुकमारी। भर वैसाख आश मिलने की छिन छिन बीतत भारी ॥ उन नहीं कुछ सन्देश पठायौ-सखी श्याम द्वारिका छायौ ॥1 ॥ जेठ तपन तन व्याकुल सजनी विरह वितावन जारी। लाग्यौ आषाढ़ मोर दादुरवा-बोलत कोयल कारी ॥ पपीहा पिठ पिउ शब्द सुनायौ-सखी श्याम द्वारिका छायी॥2 ॥ सावन में मन भामिन जुर मिल झूलें कदम को डारी। भादों गहर रहे वादरवा झुकी रैन अधियारी ॥ मानौ काम देव चढ़ आयौ-सखी श्याम द्वारिका छायी ॥3॥ क्वार मास नव दुर्गा पूजन चलें सभी नर नारी। कार्तिक राधा दामोदर की जो घर घर होय दिवारी ॥ ऋतु हेमन्तध शीत सरसायौ-सखी श्याम द्वारिका छायौ ॥4॥ बेन सुधाबत अगहैंन में नहीं श्यामें श्याम पुकारी | रैन चैन नहि परत फूस लै सोवत प्राणन प्यारी ॥ ऊधौ जोग सिखावन आयौ-सखी श्याम द्वारिका छायौ ॥5॥ माघ मिले प्रीतम प्रिय दोऊ गलवैया उर डारी। फागुन खेल मच्यौ होरी कौ तक मारी पिचकारी ॥ गालन लाल गुलाल लगायौ-सखी श्याम द्वारिका छायौ ॥6 ॥

हो रसिया!

(काव्य रचना एवं संगीत स्व. गरुड़ जी पाठक)

हो रसिया! हम न लई बसिया! हम न लईं बसिया ! तुम झूठन दोष लगाया करौ, कटि में कसिया ॥ हम0 भूल गये कहूँ और ठौर तुम हम नहिं आँखन देखी , भली भई जो गई बाँस की निशदिन मारी सेखी । अब चैन से रैन बिलाऐंगी हम, बैरिन बसिया ! !

तोरी बसिया को नेंक बजाऊं

(काव्य रचना श्री राधे लाल जी-संगीत- मोंहनबाग)

मोरे प्यारे पिया बनबारी हो ! तोरी बसिया को नेंक बजाऊँ।॥ सुर साधौं मधुर धुन सुनाऊँ ॥ प्यारे हो ! प्यारे हो ! तोरी बसिया को नेंक बजाऊँ। मोहन पहिराऔ मुकट हमें, तुम ओढ़ि लेउ चुनरी हमरी । हम तुमरी धेनु चरावन कों, कर लेंइ लकुट काँधे कमरी ॥ बन जाउ गुजरि बरसाने की | प्यारे हो! प्यारे हो ! तोरी बसिया को नेंक बजाऊँ ॥ मोरे प्यारे पिया बनवारी हो ॥

(काव्य रचना कविरत्न स्व, गोविन्द जी शास्त्री, एवंसंगीत स्व, मधुरेश दत्त वासुदेव जी)

द्रगू मूँदयौ सखी री चितचोर है। ब्रजचंदा पै मेरौ चकोर है ॥ वौ घन स्वांति पपीहा प्यासौ, मो मुख चंद उजास प्रभा सौ, अधरामृत हित मोर है ॥ द्रग मूँद्यौ सखी री चितचोर है ॥ बन बन बिहारी गोविंद मुरारी, हृदय में बसौ है वही मेरी प्यारी | छैल छबीलौ प्यारी, होत मो सों न न्यारी, प्रान-जीवन अधार ! जसुधा कौ दुलारौ | मुकट ढुरारौ, बंशी बारी, कारी कमरिया काजर कारौ॥ गिर धारन नखकोर है ॥द्रग मूँदयौी सखी री चितचोर है ॥

हो-हो-हो! मोरी प्यारी राधे !

हो-हो-हो! मोरी प्यारी राधे ! पहरी गले में सम्हार फूलन के नवहार | डारिन पै झुक झूलन हारे, कलियन के संग फलन वारे गूँथें ह कर प्यार ॥ फूलन. ॥ है बेला मतवारे निवारे चम्पक सुमन खिले सेवन्ती जुग जूँथी चमेली पंकज कदम मिले प्रेम सुई रस डोंरन पोये , नीर उसीर गुलाब भिगोंये थिरता थाक सुढ़ार ॥ फूलन. ॥ तू को ह मालिनिया बतारी गलियन फिरत फिरे तो परी मतवारी अन्यारी भँबरन भीर भिरें चंचलता की चाल चले है क्यों मुख घूँघट घाल चलै है धूम मचाबत द्वार ॥ फूलन. ॥ ना जानो चतुराई सखी री छल बल मोल कहा श्यामा जू यह धरे निहारे मम मन मोह कहा शोभा कौ संसार भरौ है सौरभ कौ संचार करी है उपबन को श्रृंगार ॥ फूलन. ॥

श्री राधे रानी जू हों चेरी हों तेरी ॥

श्री राधे रानी जू हों चेरी हों तेरी ॥ आनन चन्दा नैन चकोरी, चाह भरी चितबन चितचोरी प्रीत प्रतीत रीति रस बोरी मन मोहयों मेरी ॥ हो चेरी. ॥ अनुराग बाग में वगरी पराग औ पिक बोले कंज दलन पै मानों प्रेम मगन है आली अलि डोले मानस हंसी नेंह निभाबै मीन सदा सरबर सरसाबे मोर निहोर मेंघ झरलावै नीर छीर नेरौ ॥ हों चेरौ. ॥ तुम्हारे प्रताप सों नख पै छिनकमें, गिर धारौ अधर सुधालै प्यारी पान कियौ हो दावा नल भारौ मन्त्र मोहनी मन्द हँसी सौं, नाम जपौं निश दिन बंशी सौं तू जीवन ब्रज जीवन की सौँ दया द्रष्टि हेरौ ॥ हो चेरी. ॥ रति श्रम श्वेद सौं यमुना कलिन्द है ब्रज आई सकल रिचा हू गोपी घोष तिया है तोरे गुनगाई सिन्धु पास जिमि जात नदी है मानों लाज जहाज लदी है निजस्वरूप आनन्द वौहि री महारास केरौ ॥ हो चेरी. ॥ पट तब अंग कौ पियरौ पहैरके रंग भीनों शरद निशा में मैंने मैन महामद मारतों बस कीन्हों श्रबनन वानी लगै सुहानी बोलन को रसना ललचानी चरण पलोटत पंकज पानी तब गुविन्द हेरी ॥ हौ चेरौ. ॥

काव्य रचना बेकुण्ठनाथ चतुर्वेदी 'मधुप' (संगीत स्व. मधुरेशदत्त जी वासुदेव जी)

प्यारे नन्द दुलारे सखीरी घनश्याम हमारे प्रिय प्रान हमारे ॥ प्यारे नन्द ॥ क्यों छली छल सोंनव भामिनियाँ घन अन्तर आकल दामिनियाँ कारी कामर ओढ़न हारे कारे मन के कारे ॥ सखीरी घन. ॥ प्यारी वृषभानु लली प्रीत पगी हेर रहीं सहचरी चाँदनी बुजचन्द रथ कों घेर रहीं वारी विन मीन व्याकुल विरह बावरी रूप की चातकी राधिके रावरी ले चली अकरुर क्योंध चोर जिया है ने भौर पिया हम कजतिया जसुमत वारे वृज रखवारे इन नेनन के तारे ढ ससखीरी घनश्याम हमारे |

राधिके साधिके पट खुले हैं आज मेरे मन के ।

राधिके साधिके पट खुले हैं आज मेरे मन के । नेही निपुन निहारी गोविन्द प्रान प्यारी पेखी तन मन प्रीत तिहारी भूल्यौ गुन निरगुन के ॥ पट खुले. ॥ किशोरी हों पावों बृजवास व॒न्दा विपिन की गुल्मलता मग धूरि द्वै रहौ उर उपजी अभिलास मोहन की मुरली ले मोर पस्ख्रारे मैय्या की प्रीति नवनीत सम्बारे ऊधौ विनय हमारी कहियो दशा निहारी बेगि बरज ब्रजगाजहि लड़यो प्यासे दूग दरशन के ॥ पट गले. ॥

श्याम सुघर वर आये हो सजनी !

श्याम सुघर वर आये हो सजनी ! वे बाँके बिहारी मन भाये ॥ सिर मोर मुकट कुंडल की झलक, घूँघररी अलक लटकन को लटक ॥ आली अखियन माँहि समाये ॥ खोर केसर की तिलक आढ़ डिठोना न्यारी | मदभरी मुरली मधुर अरुन अधर राज रही, तिल कपोलन पै मनों नील जलज अलिबारी ॥ सपने में दरसन पायौ, नाँचौ-नचायौ गायौ नेह निभायी । गल बाँह दई निधि पाइ लई , सुअनंदमई हों जागि गई । प्यारी ! ' मधुप ' मिलन गुन गाये ' ॥

सैन मेरो करे प्रण प्यारौ

काव्य रचना कविरत्न गोविन्द जी शास्त्री

सैन मेरो करे प्रण प्यारौ । भोरो भारी दुलारी बारौ- मत बारौ । । कारी-कारी घटा छाये, चन्दा छिप छिप जाये। बात मानौ मधुप न गुजारी । । सैन 0 पपीहा पीऊ मत बोलो , पिकी जावौ नहीं गावौ । । पयोजन की सुरभि शीतल, पवन पावन न इतरावौ । कलिन हू को न विकसावौ । नाही नाचौ माँ ते मोर, करो जलद न सोर मोर हू जे न रजनी सिधारौ । सैन मेरी करे प्रान प्यारी । प्रि0-यह रस ना पायौ वेद थके नहिं शेष कहयौ ॥ प्रेम

ढप बाजो री ग्वालिनियां

श्री यमुना प्रसाद जी ' प्रीतम '

ढप बाजो री ग्वालिनियां होरी खेलन को आवौ री | सब साजौ री साजनियां कुंजन में सिधावी री | श्री राधे सुकुमारी , लीजो निहार बनवारी । चली हैं हिलमिल के सारी सखियाँ। चलें लजीली अन्यारी अखियाँ॥ गावौ री भामिनियाँ गोरी फगूआ मनाबौ री ॥ ढप0॥ शैर- कसी कटि फेंट है लसी बसिया, आयी है। गाम तौ रसिया गुहार लायौ है॥ पीरी सिर पाग पेंच मोर पखा न्यारौ है। छायौ है भामतौ हिय में श्रृंगार भायो है॥ मिलान-छलिया छबीलौ , रसिया रंगीलौ, नंद के अनारी को । नारी बनाबौ री, भाजि न जाबे स्याम कहीं । आबौ री कामिनियाँ याहि पकर नचाबौ री ॥ ढप0 ॥ शैर- बसि उर प्रीति है बौ पिया ठगिया | प्यारी मुख हेरि कें हंसिकें गुलाल डारी है। आईं ब्रजवाल नंदलाल घेर लीनों हैं। बोरौ है सामरौ रंग में अनंग बारौ है॥ मिलान- होरी में हारो गोरी उचारीौ प्रीतम प्यारे सो । नेहा निभावौ री रूप निहारी नेहनिया ॥ ध्यावी री गामिनिया याहि गारी सुनावी री ॥ ढप0 ॥

डाले का गीत :-

रिमझिम रिमझिम-रिमझिम बरसेगौ मेघ री बरसत आगवे मेरो भात री । वीरा मेरे हथियन पे सवार, मैंने जानी काका, बाबा आइये वीरा मेरे लहटू खेलन हार । मैंने जानी भइया भतीजे आईये वीरा मेरे अधविच तम्‌ ये खाय वीरा मेरे आइ बैठियो |

बन्नी गीत :-

माढ़े के बीच लाढ़ो ने केश सुखाये लाढ़ो बाबा चतुर बर ढूड़ौ, चतुर बर ढूड़ौ ॥ दादी लैंगी कन्यादान। लाढ़ो नें केश सुखाये | बाबुल चतुर बर ढूडी-चतुर वर ढूड़ी ॥ मइया लैइगी कन्यादान, लाढ़ो नें केश सुखाये |

पुत्र विवाह :-

चलते लोग पकरियो रे बनना भाजौई जाइ। बाबा की ले गयौ ढ़ाल तरबरिया, " दादी की लै गयौ चुँदरिया रे ! बनना भाजौई जाइ ॥ । (क्रमश: माता पिता एवं अन्य निकटस्थों के नाम) तदन्तर - | खूँटी पै टाँग दीनी ढ़ाल तरबरिया, महफिल में धर दीनी चूंदरिया रे । | बनना भाजौई जाइ॥ (यह गीत 'वर ' के भाँवरो के लिए निकलते समय गाया जाता है। यह कटष्टि एवं भद्रा निवारण हेतु प्रचलित है। )

आरतौ :-

झरि झमकेन बरसैगौ मेहुरी झमकारेन माँगर बाजैगौ, तुम बैठी लाढ़ले चौक पै तुम्हारी भैना करैगी आरतौ | अथेयाँ के पूछेंगे लोग री भेना कहा-कहा लाई आरतौ | में लाई हौ नेग हजार गोदभर लाई बाइनों ।

ललमनियाँ :-

(यह कन्या विवाह में बरात के बख्त छत पर चढ़ी कन्या पक्ष की महिलाओं द्वारा गाया जाता है। 'आवत जाउ-जेंमत जाउ' प्रथा के चलते अब यह परम्परा लुप्त प्राय: है। ) मेरी जल्दी खबर सुधि लीजो रजना ! कारी परिंगई रजना-पीरी परिगई रजना । मेरी0 बैद बुलइयो रजना-नबज दिखइयो रजना ॥ मेरी0 कोठे ऊपर कोठरी रजना ठाड़ी सुखाइ रही केश, पारु दिखाई दे गयौ कोई धरि जोगी कौ भेस ॥ कारी परिंगई रजना पीरी परि0 आगरे की गैल में परी चना की रासि, गठरी लुगैया ले गईं लोग कहैँ स्यावास ॥ मेरी0 आगरे की गैल में परयो भुजंगी स्याँप, | लोटै-पीटे फनु करै सरकि बिले में जाइ ॥ पीरी परिगई रजना ॥ आगरे की गैल में सतुआ सौठ बिकाइ चतुर-चतुर सौदा करें मूरख धक्का खाइ ॥ मेरी0 दिल्लीी शहर बजार में उलटी टेंगी कमान, खेंचन हारौ घर नहीं देवरिया नाँदान ॥ मेरी0 हरौ नगीना नग जड़यौ उँगरी में दुख देइ, ऐसे के पालें परी जो हँसे न ऊतर देइ ॥ पीरी0 हरयौ नगीना आरसी उँगरी में सुख देइ, रसिया के पालैं परी हँस-हँस ऊतर देइ ॥ पीरी परिगई रजना मेरी राजा जनक के आई है बरात, बराती आए हरे हरे0 राजा, जिमाओऔ इनकों हरे-हरे। राजा जनक के आई है बरात । सखीरी इनकों पातर देउ मँगाइ-सखीरी, इनको दौंना देठ मँगाइ-परीसौ इनकों हरे : हरे-राजा जनक के आई है बारात ॥ भला राजन ! भला राजन ! सिगरे बराती अटपटे, भोजन भवन में आजुदे | ऐ पूरी लो-कचौरी लो, ऐ खुरमा लो इमरती लो ( भला राजन) सिगरे बराती हींजरे, बैठे हैंएक पींजरे। ऐ मिलनी लो, पिरामन लो भला राजन | ऐ भैंन चुनी। हाँ भैन मुनी, ऐ बंराती जूठन गोझा में लै चले काऊ नें सुनी हाँ भेन सुनी –

मेंहदी गीत :-

( कन्या विवाह में मेंहदी लगाते समय महागौरी वंदना) मेरी गौरा जी की स्दाँ जै होइ, गौरा जी की मेंहदी राचनी । मेरी सीया जू की सदाँ जे होइ, सीया जू की मेंहदी राचनी ॥ राधारानी को सदाँ जे होइ किशोरी जू की मेंहदी राचनी ॥ अलि नेनन धालौ मेष , सुख देनी को काजर लागनो ॥ राचे-राचे सासू जी के हाथ, बहू बेटिन के हाथ अहबातिनिकी मेंहदी राचनी ॥

सीया-दोहा :-

(चौक पर बैठते समय का गीत) सीया दोआ राजो तोरन स्वम्भा आँगन-चाँदन चौरसिओ आसन मोर सिंहासन देउ। बाँह मोरियो कूम कलिस सों चौबे अमुक चंद जायौ पूत (धीअलाढ़ो हि (माँ का नाम) उर धरे। हरीअरी गोबर पीयरी सी माँटी हो घोरी मेरी माय, जसोमति आँगन लीपनों । लीपनरी सोहै गज मुतियन चौक रमानी है लौने कलश सों । बहूअरमानी लौने पूत सो |

भाँवर-गीत :-

गौरा गणेश कृपाल मंगल शुभ घड़ी । मीन मेख मृदंग बाजै, गीत मुनियर परहिं भाँवर | सबरी अजुध्या मिथलापुरी में राजै। रामचन्द्र-सीता भाँवर परें॥ मांगल गामें नारि सुमन झरि सोभा साजै ॥ (सातौ भाँवरों के समय गाया जाता है- याकी पहली भाँवर ए तौऊ बेटी बापकी | यह क्रम छठी भाँवर तक चलता है। सातई भाँवर पर याकी सातई भाँवर ऐ अब भई बेटी ससुर की )

वर का द्वार मंगल :-

(देहरी रोपने से पहले बहन यह गीत गाती है) रघनुंदन बनना आज व्याहि लाए जनक लली | सिर सोने कौ मौर विराजै,कानन कुण्डल साजैँ। गल बैजन्ती माला सोहै ॥ बनि आए बर राज व्याहि लाए जनक लली ॥ हाथन कंकन भुज बाजूबन्द मुंदरी रतन दे जड़ी ऊदेखि देखि सुरमुनि मोहे | शोभा बरनी न जाइ व्याहि लाए जनक लली ॥ मुख में पान नेन रतनारे , कजरा की छबि न्यारी, जनकपुरी की सखियाँ देखें देखें नगर की नारी, व्याहि लाए0 कटि पीरौ पीताम्बर सोहे हाथन मेंहदी लाल । पाँव में चंदन खड़ाऊ सोहें घर आए भगवान व्याहि लाए जनक लली ॥ माता कौशल्या करत आरतौ, बहन उतारे राई नोंन | हरे द्रग दरसन के प्यासे पति राखौ भगवान। व्याहि लाए जनक लली॥

वर का द्वार मंगल :-

(देहरी रोपने से पहले बहन यह गीत गाती है) रघनुंदन बनना आज व्याहि लाए जनक लली | सिर सोने कौ मौर विराजै,कानन कुण्डल साजैँ। गल बैजन्ती माला सोहै ॥ बनि आए बर राज व्याहि लाए जनक लली ॥ हाथन कंकन भुज बाजूबन्द मुंदरी रतन दे जड़ी ऊदेखि देखि सुरमुनि मोहे | शोभा बरनी न जाइ व्याहि लाए जनक लली ॥ मुख में पान नेन रतनारे , कजरा की छबि न्यारी, जनकपुरी की सखियाँ देखें देखें नगर की नारी, व्याहि लाए0 कटि पीरौ पीताम्बर सोहे हाथन मेंहदी लाल । पाँव में चंदन खड़ाऊ सोहें घर आए भगवान व्याहि लाए जनक लली ॥ माता कौशल्या करत आरतौ, बहन उतारे राई नोंन | हरे द्रग दरसन के प्यासे पति राखौ भगवान। व्याहि लाए जनक लली॥

बधायो :-

मांइ उठाने के समय का गीत बधायो मेरे आंगना बाजे सुहागौ मेरे आंगना बाजे बीज बधायौ बाजे कि, बेटा जायें बाजे । बधायो मेरे आंगना बाजे बहूए (नाम) तैने बेटा जायौ तो (पति का नाम) मन हुलसे बहूए सीता तैने बेटा जायौ तो श्री रामचन्द्र लाल कौ मन हुलसे । बधायौ मेरे आंगना ।0

शरद-पूर्णिमा ब्रत का अर्ध्य :-

सरद पूनों पुनवंती, अरघ दे धनवंती । इंदुल पूनों भईया की, करवा चौथ जमईया की | अहोई आर्ठे पूता की, दानवीर प्रसूता की अरघ दे री अरघ दै, बारे चंदा अरघ दै ॥ (हाथ में मिष्ठान्न लेकर चंदा को सात बार अर्ध्य दिया जाता है। )

करवा चौथ का अर्घ्य :-

चार घड़ी को चन्द्रमा, चौघड़िया की रात | बारे चंदा अरघ दे, करवा चौथ की रात ॥ (यह अर्घ्य भी सात बार दिया जाता है | )

अहोई अर्घ्य :-

निंहुरी-निहुरी हम फिरेँ अहोई की रात प्रकास । अहोई मईया अब जुहार-फिर जुहार पती-पूत की आस ॥ (चंदा अथवा तारों को सात बार अर्ध्य दिया जाता है। अर्धरात्रि में राधाकुंड स्नान-का माहात्य्य परंपरा से प्रचलित है। )

सकट चौथ का अर्घ्य :-

तिल-तिल दिया, तिल-तिल बाती | तिल-तिल घटे, संकट की राती ॥ बाँधे छूटे, बिछरे मिलें, रोग-दोख सब संकट हरै ॥ ( यह अर्ध्य सात बार दिया जाता है)

हरितालिका तीज के मांगलिक ब्रत का अर्घ्य :-

बेल-बिजौरौ, नारियरो , जहाँ देती गौरन दे अर्घ्य अध्य दिये, वर माँग लिये, महादेव जैसे भरतार । दे मेरी गौरा रानी औडों दे अहिबात। हारी, नीयरौ , दुख-दारिद्री, पर बुद्धियरौ पर चींतीयरी , जुआरियौ-टंटारियौ , गौरा सो मत देउ भरतार । ढुरहर-ढुरहर में बहे, जहाँ बैठी गौरन दे नहाय, माँथे केबड़ौ, रानी सिर गुर्थे, सहागिल जुवाब न दैंय | गौरनदे की पाटियाँ, जिन ऊधौ सो सिंधुरा नहिं मैली होय ॥ हाथ मेंहदुली रंग राचनी, उनके सिर रे कुसूमिल घाट, इडियाँ महावर रंग मंगो , इनके गोद जरूलो पूत। जब रे बुलाइयो सतबाह हुए, रानी सिर गूँथे सुहागिल जुवाव न दैंय । महादेव राक्णे वे नित बढ़े, उनकें धन बहुतेरौ, माल घनेरौ होय ॥ होय लीले हॉसुला, राजा वे चढ़े, सब पंचन में परधान | हॉसिये, चींतीये, कैसे हँसुला तप करिया तप करिया है, लरिया है, माँगरे, सकी डाँग डँगैली है। लकटोरा है, पाती है, शंकर सिरे चढ़ाइयो । माह मास के नहाये माधौ जाइये, जो न जायें फल होइ सो मन इंछिये। जाय जुही को फूल समुद्र को पानी है। महादेव से भरतार गौरन दे रानी है। वे राजा-वे रानी, रात आँगुर पानी । (स्त्रियाँ सौभाग्य संरक्षक इस ब्रत को निर्जल करती है। समापनोपरान्त अरुणोदय से पूर्व यह अर्घ्य दिया जाता है। यह अर्घ्य केवल एक बार दिया जाता है।)

संध्या आरती (सांझी) :-

आरती री आरती,र्सझा मैया आरती। आरती के फूल महेश की बाती | गोरौ री गोरो सांझा गोरो सांझी गोरी , गोरी री गोरौ बनना गोरी, बन्नी गोरी । लेउ री लेउ वानें बोई हैं कचरिया, लेठ री लेठसांझा सांझी की अटरिया॥ लेउरी लेउ वामें पोढ़ेंगी बहुरिया, लेउ री लेउ वाकें सात बिटरियाँ। लेउ री लेउ वाकौ म्हों बटला सौ, लेउ री लेठ वाकी नाक चना सी ॥ लेउ री ले बाकी आँख घना सी | सांझी भैना री का पहरैगी का ओडढ़ेगी सोने कौ ॥ सीसा गुथावैगी, सालु औढ़ैगी, मिसरु पहरैगी सौने को ॥ तेरे बाप ने गढ़ाई , बीरन बेटी मोल चुकाई मेरी सांझी के औरें-घौरे फूल रही फुलवारी, तू तौ पैर लै मेरी सांझी मैया सोलह गज की सारी तेरी प्रीत ने बुलाई-मैं तो संझ्मा पूजन आईं। सोलह कनागत पितरन के-पितरन के माई पिरतन के ॥ उठ भाई-उठ भाई खोल किवार, में आई तेरे पूजन द्वार ॥ पुजें-पुजाएँ का फल होइ, मैया भतीजे सम्पत होई । मैया चइयें नौ दस बीस, भतीजे चइयें मैया पूरे पच्चीस- सांझी मैया अहिवात असीस ॥ सुख समृद्धि को बर वख्शीस ॥

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मांगलिक गीत माला

हमारा समाज पूर्व वैदिक काल से ही वाचिक परम्परा का समाज रहा है। माथुरी संस्कृति की लोक मंगल भावना का विपुल साहित्य दीर्घकाल तक इस वाचिक परम्परा मे कण्ठों में ही संचित और सुरक्षित रहा। प्राचीन काल से ही