माला

Updated: Jul 8, 2020



( अपने समाज में मंत्र जाप के लिए "भजन ' ज़ब्द प्रचलित है। जप की गणना माला के मनकों की सहायता से होती है। आहिक में माला का अपरिहार्य स्थान है।अंगरिग स्पृति के अनुसार बिना कुशा धर्मानुष्ठान, बिना माला जप निष्फल होते हैं। वैदिक विज्ञान विवेचन में अंगुष्ठ एवं मध्यमा अंगुलि के संघर्ष से उत्पन्न विलक्षण विद्यत को धयनी के तार द्वारा सीधे हृदय चक्र को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया बताया है।)



संस्कृति-सिंचन का प्रवल पुरोधा मथुरास्थ माथुर चतुर्वेदी विप्र समाज सदैव से ही परम धार्मिक, यजन-याजन, जप-तप प्रवीण, भगवद्‌-भक्ति परायण रहा है। अपने यहाँ मंत्र जाप के लिए भजन' शब्द प्रचलित है। जप की गणना माला के मनकों की सहायता से होती है। आहिक में माला का अपरिहार्य स्थान है। अंगिरा स्मृति के अनुसार, बिना जलस्पर्श (संकल्प) के दान बिना कुशा धर्मानुष्ठान, बिना माला जप निष्फल होते हैं। अन्य धर्म या मतालम्बियों में भी प्रकारान्तर से माला का प्रयोग होता है।


देवार्पण हेतु पुष्पमाला के ही समान जपमाला भी प्राय: शुद्ध-पवित्र वस्तुओं से बनाई जाती है, अत: कुशा के ही समान सब लाभ प्राप्त होते हैं। माला से जप की सुनिश्चित संख्या ज्ञात होती है। अपने नित्य नियमानुसार , समय सापेक्षता में भी माला ही नियन्त्रण सूत्र है। वैदिक विज्ञान विवेचन में अंगुष्ठ और मध्यमा अंगुलि के संघर्ष से उत्पन्न विलक्षण विद्युत्‌ को धमनी के तार द्वारा सीधे हृदय चक्र को प्रभावित करनेवाली प्रक्रिया बताया है। यह मन को प्रयोग में स्थिर चित्त और निश्चल बनाती है। इसी कारण बीच की अंगुलि विहित है, तर्जनी का निषेध है। तुलसी माला की सार्वभौमिकता सर्वज्ञात है। बैसे श्री वैष्णव समाज में तुलसी-शंख-कमलाक्ष, शैव एवं शाक्‍्त सम्प्रदाय में रूद्राक्ष, गणपति उपासना में हरिद्रा की माला का शास्त्रोक उपयोग होता है। मंत्र विशेष के उद्देश्य विशेष से जाप में विद्रुमादिमाला निर्षिदष्ट हैं। पूर्वोक्त विद्युत विशिष्ट की सात्विक प्रवृति हेतु भक्तों की भाव भरी तुलसी माला अनुपम है। माला को खुली रखने अर्थात्‌ दिखने की स्थिति होने का निषेध है। इसे सदैव जपस्थली में रखते हैं। अपने वहाँ गोमुखी जपस्थली प्रचलन में है। झोली माला विरक्तों की कही जाती है।


शास्त्र में गले में कण्ठी-माला धारण की भी व्यवस्था उल्लिखित है। यह धार्मिक दृष्टि से शिखासूत्र के ही समान हिन्दुत्व का अनिवार्य चिन्ह है। यह उपाशु जपकर्ता की गले - को धमनियों के अधिक थकने से कण्ठमाला जैसे रोगों की आशंका-सम्भावना को समाप्त _ करता है। कौड़ी-शंख-तुलसी-रूद्राक्ष की कण्ठी बच्चों के दनन्‍्तोद्गम काल में कष्ट : निवारण करती है। बालकों की कण्ठी में सुवर्ण, रजत एव व्याप्र-नख का सन्निवेश उन्हें कृद्रष्टि एवं संक्रामक रोगों से बचाती है।


जप माला के विविध रूपों में स्वल्प सुमिरनी, सत्ताईस दाने व एक सुमेरू की नक्षत्र माला व हजारा भी उल्लेख्य हैं किन्तु सर्वकार्य में नित्य प्रयुक्त माला 108 दाने की होती है जिसमें शीर्ष पर एक सुमेरू पृथक होता है। प्राचीन महर्षियों ने ब्रह्माण्ड एवं प्रकति सापेक्ष नक्षत्रों के चतुर्दिक भ्रमण की वैज्ञानिक वत्ति के संदर्भ में (27):4) 108 दाने की माला का निर्माण किया। 108 दाने का एक अन्य कारण प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण (चू चे चो ला अश्विनी) होने के कारण 108 चरण की यह जप माला परिकल्पित की गई है। एक अन्य कारण अहोरात्रि में मानव की स्वाभाविक श्वास संख्या का आधा भाग (10800) परमार्थ साधना हेतु विहित होना है। अत: न्यूनतम एक माला भी सौगुनी हो जाती है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार एक संवत्सर के (10800) मुहूर्त, इतने ही वेदत्रयी के पंक्ति युग्म सौवर्ष की मनुष्य आयु से विभक्त होने पर 108 होते है। अत: यह एक माला का जाप भी जीवन को सार्थक बनाता है। आज के अति व्यस्त जीवन में भी चतुर्वेदी ब्राह्मण को न्यूनतम एक माला ( गायत्री एवं गुरूमंत्र) नित्य नियम होना चाहिए। यह हमें सुनिश्चित ब्रह्मवर्चस्व, प्रतिष्ठा एवं सफलता प्रदान करता है।

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