अंत्येष्टि संस्कार

Updated: May 3, 2020



अपने नाम के अनुरूप यह अंतिम संस्कार है |

जिस समय प्राणी स्वर्गवास जाने में हो और हमको डाक्टर-वैद्य या अन्दाज लग रहा हो कि घंटे-आधा घंटे में प्राण निकलने वाले हैं उसी समय जमीन में घर की बह गाय के गोबर से जगह लीप ले, जगह पर काले तिल जौ कुश का आसन बिछा दें। प्राणी के मुख में गंगाजल, दही सोने का अंशमात्र टुकड़ा डाल दें। जमीन पर दक्षिण पैर करके लेटा दें और भगवान का कीर्तन भजन करें। प्राण निकल जायें निश्चित रूप से तब लड़का ' धा' लगाता है व रोना-पीटना चालू हो जाता है औरत के माइक से धोती व लोटा-लगोट का कपड़ा आता है उसे मृतक शरीर को पहनाया जाता है। पुरुष के ननिहाल से धोती आती है उसे पहनाई जाती है। मृतक शरीर के उठ जाने के बाद विस्तरों को बाहर फैंक दें व बहू तकिया लेकर नहाने जाती है।

सीधा :-

सीधा बेटी , जमाई , सास , ससुर, भानजा , ससुर समधी :- समधी के देहान्त के बाद लड़के-लड़कों के ससुराल से सीधा व एक यातिया जाता है। सीधे में निम्नलिखित वस्तु होती हैं :- सीधा 1 मन अनाज का होता है, 20 किलो आटा, 10 किलो दाल , 5 किलो अरहर की , 5 किलो मंग छिलका उसमें उड़द की दाल भी 8 किलो. चावल, 1 कि. घी, 1 कि. नमक सीधा भानजे का :- भानजे की मृत्यु के समय उसके मामा के घर से धोती आती है उसे पहन कर ही वह _ अर्थी पर जाता है। इसके सीधे में भी 1 मन का हिसाब होता है 20 कि. आटा, 8 किलो चावल, 5 किलो दाल अरहर, 5 किलो मूंग छिलका व उड़द की दाल मिलाकर, 1 कि. नमक 1 कि. घी। नोट :- जमाई की मत्यु के बाद लड़की का भाई लड़की पर बुरा-भला डालने आता है। उसे हा टिया फोड़ना भी कहते है। सीधा बेटी का :- 16 कि. आटा, 8 किलो चावल, 8 किलो दाल, एक साड़ी, जिसे पहन कर अथा 77 जाती है। नहाने - खाने :- नहाने-खाने का मतलब कि लड़की के सास-ससुर दोनों को जाते हैं। यह खाना 3 दिन, 7 दिन, 9 दिन, 10 दिन की क्रिया के समय पर पिण्ड होने पर खाले में गया जाता है। वह खाना मृत स्त्री-पुरुष को पिण्ड के साथ मिलता है । नहाने - खाने निम्न लोगों क॑ होते हैं। सास-ससुर के 3 दिन के 10वें दिन के लड़ आ 13वें दिन की व्यारु जमाई की अगर लड़की का ससुर मरे तो 1 साल की। व्यारु के रुपये सास के रुपये नहीं होते कंबल 13वें दिन जमाई का खाना जाता है। जिसे व्यारु कहते है । नहाना खाना व सी धा निम्नलिखित ग्श्तिदारे का जाता है - काकी सास, काका समर, मार्मी सास, मामा, ससुर और घर के सगे देवर - जेठी इन लोगों के सीधे के रुपये समयानुसार जाते है २ दिन का नहाना -खाना जाता है ।

मृत्यु का पहला दिन :- अन्तिम क्रिया करके श्मशान से जब लौटते हैं तो उस समय लड़के की बहू को पनारे ( मोरी पर) एक कलशा पानी व एक लोटा लेकर बैठाते है कहते है कि मरे हुए व्यक्ति की आत्मा पनारे (मोरी) में आकर बैठती है उस समय बहू पानी डालती है तो उसकी आत्मा को शान्ति मिलती है। अगर सूर्य अस्त नहीं हुआ हो तो नाइन को बुलवाकर 'गालावाती ' व क्रिया की जाती है। पंडया जी को बुलवाकर सभी काम किया जाता है। एक कनस्तर व एक कटटी में तेल व कनस्तर में 10 दिन की क्रिया का सामान रखा जाता है। दीया रखने के बाद रोज 13वीं शांति तक सुबह 4 बजे धरम धा लगती है उससे मरी हुई आत्मा को शान्ति मिलती है। 'धरमधा' का मतलब सुबह 4 बजे कुछ औरते बैठ कर मरे हुए को रोती हैं। इसे सुबह का स्यापा कहते हैं। (अब यह प्रथा समापत प्राय: है) । 10 दिन का अखण्ड दिया रखा जाता है।दिया ऐसी जगह रखें जहाँ किसी गर्भवती व रजस्वला स्त्री की परछाई न पड़े। एक कठौता व एक लोढ़ी रखी जाती है। एक तपेली भात बनाने के लिये। पहले दिन के खाने में खिचड़ी व खीर सकरा साग (मूली पालक ) का साग व रोटी बनाई जाती है। रोज पहले गाय को ठंडा करके खाना निकाला जाता है। गाय के खाने में 8 रोटी, खिचड़ी व सब्जी रखी जाती है। क्रिया करने वाले की पत्तल पर एक बार ही खाना रखा जाता है। खाने की मात्रा ज्यादा होती है। क्रिया करने वाले की पत्तल पर 12 रोटी बड़ा सरबा भरके सब्जी व किसी बर्तन में खिचड़ी रखनी चाहिए। खाना इतना हो कि वो खाले जो बचे उसे वह अपने हाथ से भंगिन को दे। अगर क्रिया करने वाले का पिता मृत्यु को प्राप्त हो तो माताजी की भी पत्तल साथ रखी जानी चाहिए व उस पर भी उतना ही खाना रखा जाना चाहिए। पानी भी क्रिया करने वाले के पास जो लोटा होता एक बार में ही भरकर बैठना चाहिए। जमीन में कम्बल बिछाकर सोना चाहिए दिये के आस-पास ही कम्बल बिछाना चाहिए । मृत्यु का दूसरा दिन :- दूसरे दिन के खाने में दाल चावल, रोटी सब्जी कुछ साधारण ऋतु मिठाई होनी चाहिए । राशी अपने कूटुम्ब के साथ बैठकर भोजन करना चाहिए। दूसरे दिन रात को मूंग की दाल उर्द की दाल भिगोनी चाहिए जिससे तीसरे दिन बड़ा गलरी-गलरा बन सके । तीसरे दिन का भोजन :- दाल चावल मिलौनी की कढ़ी, गलरी, गलरा, गलरी यानी मूंग की दाल की ऊगली के निशान की पकौड़ी बनाई जाती है, हलुआ बनता है, दही बड़ा बनाये जाते है, क्रिया करने वाले के ससुराल से नहाने-खाने आते है.........खाले पर रखते व सबको खाने के साथ देते हैं | चौथे दिन का भोजन , पांचवे दिन का भोजन , छठवे दिन का भोजन :- कुछ भी बना सकते हैं । 3, 7, 9 दिनका भोजन एक जैसा होता है। 10 वें दिन का भोजन :- 10 वे दिन दाल बाटी वरोटी बनती है। 4 दाल मिलाकर बनाते हैं। दालवाटी लड्डू समधी के घर से आते हे कम होतो घर पर भी बनवा लेते हैं। रोज की तरह पहले गाय को फिर क्रिया करने वाले की पत्तल लगती है। 11 वें दिन का कार्य व खाना :- 11 वें दिन सुबह दीया जो 10 दिन से जल रहा है उसे यमुना, गंगा, नदी में प्रवाहित किया जाता है। दीया सुबह 4 से 5 बजे तक के समय पर ले जाया जाता है। साथ में 4 आदमी होने चाहिए एक हाथ में लालटेन, दूसरे के हाथ में लकड़ी (लठ्ठ) , तीसरे के हाथ में माचिस, टॉर्च, चौथे के हाथ में दिया होता है जो कि क्रिया करने वाला ले जाता है। दीया विदा होता उसके उपरान्त रोना-पीटना होता है। अगर दीया किसी स्त्री के पति का हो तो उस स्त्री को नहला-धुलाकर एक कोने में बैठा देते हैं, उसके माइके से उसको 2 सफेद साड़ी आती हैं व रुपया व दागीना आता है वह गिफ्ट उसके पैरों में डाल दिया जाता है उसे बुरे-भले का गिफ्ट कहते हैं । क्रिया करने वाला जब दीये को प्रवाहित करके आता है उसे घर में नहीं आना चाहिए। घर के बाहर किसी अथाई पर या मंदिर में बैठगा चाहिए। उसी दिन एकादशा होता है उसमें सेज्जा का सारा सामान नाइन की डला में रखकर कम्बल से बांधकर लेकर ध्रुवघ्राट पहुँचती हैं। वहीं 11वें दिन की क्रिया होती है। क्रिया करने वाला व्यक्ति भी वहीं पहुंचता है। डला में निम्मलिखित तैयारी होती है :- मृतक प्राणी के 5 कपड़े (ठंड में पहनने के कपड़े ) से शैयादान, सोना , चांदी , रुपया, गाय, नाज व मृतक के पसन्द की वस्तु टॉर्च, छत्री 5 बर्तन (बर्तन में कलछी व तवेली _ अनिवार्य है।) पानी का लोटा और जितनी नित्य-प्रति काम में आने वाली अनिवार्य वस्तुऐं रखनी चाहिए। मृतक प्राणी के घर पर लंघन होता है ये 4, 8, 12 होने चाहिए ये प्रथा है। 4 दिन यानि मृत्यु वाले दिन 11वें दिन (वर्षी समधनी) एक दिन चौबर्सी ) चौथे दिन घर पर बूँदी के लड्डू, पूड़ी, साग का खाना होता है। पहले यमुना जी की पत्तल रबड़ी, पड़ी, कचौड़ी की होती है। पहले क्रिया करनेवाले की पत्तल और सब बहन- भानजों की पत्तल लगनी चाहिए। किसी बुजुर्ग की मृत्यु का ग्यारहवां का भोजन हो तो क्रिया करने वाले की पत्तल का बचा हुआ खाना प्रसाद रुप में बीमार व सबको थोड़ा-थोड़ा लेना चाहिए ऐसा नियम है। लंघन में समधिनों से कहलाया जाता है (उनको 4 पान, 4 सुपारी , बगैरह दी जाती है।) 12वां दिन :- इस दिन केवल ब्राह्मण भोजन होता है। बाँटना चौंटना होता है। यह आपकी श्रद्धा के हिसाब से होता है। 13वां दिन :- इस दिन 13वीं शान्ति होती है। पंडित जी आते हैं, शान्ति कराते हैं। अपना पर्चा देते है उसी प्रकार सामान आता है। औरत की 13वीं के दिन 13 औरतों को पहले खाने बैठाते हैं औरत सुहागिन हो तो सुहागिन औरतों को बैठाते हैं विधवा हो तो घर की सभी बहन बेटी बैठ सकती है। 13वें दिन अछूता-मांसी वाले का नाम रखा जाता है व उसके हाथ पर संकल्प छोड़ा जाता है। सामर्थ्य के हिसाब से अन्न-वस्त्र-बर्तन दान दिया जाता है। इसी दिन 13 पद भी होते हैं राह चबैनी, सुहार-लड्‌डू मर्द के घट के लड्डू 365 अवश्य बनते हैं। इसके बाद रिश्तेदारी के ऊपर निर्भर करता ह। इसी दिन मृतक प्राणी के नाम पर गाय दान, नाव घाट, जम चबैनी यमुना जी धर्मराज की बाल्टी-डोर-कम्बल, छत्री इत्यादि दान किया जाता है। अगर गरुण-पुराण बचे तो पंडित जी को भी दान दिया जाता है।   दूसरे दिन जब 13वे के हवन की वस्तुओं को यमुना में प्रवाहित करने लड़का जाता है वहाँ से लौटकर हरी-सब्जी व फल लेकर आये और जहाँ दीया रखा गया था वहाँ पर लाकर डाल दे। समदनी-वर्षी :- समदनी वर्षी के ऊपर मांसी जो बैठता है उसकी विदा होती है। औरत की समधनी हो तो 1 बड़ा बर्तन, एक चांदी का लोटा-गिलाश यथाशक्ति 5 कपडे, सोने की अंगूठी , गले की जंजीर, सुपारी व रुपया रखे जाते हैं। यह 11वें महीने में होती है। इस दिन 'पिण्ड होते हैं पंडित जी पर्चा देते हैं। सूर्य साक्षी मांसी बैठने वाले को खिलाकर सब वस्तुओं के साथ विदा करते हैं। पुरुष की समदनी होती है तो इसमें सेज्जा जाती है व कपड़े , बड़ी कोठी, जूते, 20 पूड़ी, कचौड़ी का परोसा, बेंत छत्री व प्रतिदिन के उपयोग में आने वाली वस्तु होती है। सोना, चांदी यथाशक्ति अवश्य होता है। ‘अछूता’ मर्द के अछूते में 20 पूड़ी-कचौड़ी , 16 पराठे , पूड़ी, मिठाई, दूध, फल यथाशक्ति स्त्री के अछते में 15 पूड़ी-कचौड़ी, 12 पराठे, दाल-चावल पर 10 रोटी पराठे, मिठाई-दूध, रखे जाते हैं। वर्षी :- ये मृत्यु के 12वे महीने में होती है इस दिन अछते वाले की विदा होती है, उसको भी पाचो कपड़े , यथाशक्ति सोना-चांदी, 5 बर्तन खाने के , चप्पल व मनचाही वस्तु देते है पिण्ड भी भरे जाते हैं। 20 पूड़ी कचौड़ी व मिठाई के साथ परोसा होता है। नोटी :- अधिक मास पड़ जाने पर 12वें महीने में ही समधनी-वर्षी होती है। 13वें महीने में घर से बाहर किसी पुण्य स्थल पर खोआ के णिण्ड होते हैं।  जिस दिन मनुष्य शरीर छोड़ता है 10 महीने तक मांसी होती है इसमें मांसी--अछूते वालो की पत्तल पर 20 पूड़ी-कचौड़ी व भरपूर मिठाई रखी जाती है मिठाई के नग हीं तो 8, 8 रखे जाते हैं। दो बार श्राद्ध होते हैं जिस दिन पुण्य तिथि व पितर पक्ष की तिथि को श्राद्ध होते हैं। चौवर्षी :- मृतक प्राणी को चार साल पूरे होने पर जो इन्सान मांसी बैठता है उसकी विदा होती है उसमें भी समद तेयार की जाती है। 1 बर्तन बड़ा, 5 कपड़े, सोना-चांदी , यथाशक्ति, 20 पद कचीड़ी का परोसा बंटवारा- बायना -

  • बरात की चरूई

  • 600 पड़ी कचोड़ी, 500 मिठाई (सासके)

  • 400 पृड़ी कचोड़ी, 300 मिठाई (ननिया सासके)

  • 50 दही बड़ा (सासके)

  • 30 दही बड़ा (ननिया सासके) साथ में सभी वस्तु खाने की जो भी बनी हों- भेजी जाती है। वायना मरियत का :- बेटी नातनी 300 पूड़ी सासरे, 150 मीठे, 100 पूड़ी (ननियां सासरे ) , 50 मीठे, दोयती के वहां :- 150 सासरे, 100 मिठाई, 50 ननिया सासुरे, 30 मिठाई


21 views0 comments

Recent Posts

See All